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"मैं प्रेमानंद से द्वेष नहीं रखता वह तो मेरे पुत्र..."  अपनी विवादित टिप्पणी पर जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने दी सफाई

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 26 Aug, 2025 12:49 PM

नारी डेस्क:  कहा जाता है कि जो इंसान सबसे ज्यादा नाम कमाता है वहीं सबसे ज्यादा लोगों के निशाने में आ जाता है। आम इंसान तो दूर लोग तो अब संतों को भी नहीं छोड़ रहे हैं। पिछले कुछ समय से संत प्रेमानंद महाराज को लेकर कई तरह की बयानबाजी की जा रही है। जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य भी इस मामले में पीछे नहीं रहे, हाल ही में उन्होंने प्रेमानंद जी काे लेकर कुछ ऐसा कह दिया जा विवाद का बढ़ा कारण बन गया। 

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 देशभर के अनेक प्रमुख संतों और धर्मगुरुओं ने जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य की बयान की आलोचना करते हुए इसे सनातन धर्म की मर्यादा के विपरीत बताया है। दरअसल उन्होंने अपने एक बयान में कहा था कि- "अगर कोई चमत्कार है, तो प्रेमानंद जी उनके सामने संस्कृत का एक अक्षर बोलकर दिखाएं या उनके द्वारा बोले गए श्लोकों का अर्थ बताएं।" उन्होंने यह भी कहा कि "वो मेरे लिए बालक के समान हैं, उनकी किडनी की डायलिसिस होती रहती है, उसी से वह जीवित हैं, जीने दीजिए।" इस बयान ने प्रेमानंद जी के भक्तों को काफी नाराज कर दिया  है।

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सिद्धपीठ हनुमानगढ़ी के आचार्य देवेशाचार्य महाराज ने कहा कि इस प्रकार की भाषा स्वामी रामभद्राचार्य जैसे पूजनीय संत के लिए शोभा नहीं देती। उन्होंने यह भी कहा कि संत समाज से लोग संयमित व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। महंत विशाल दास ने इस विवाद को संतों का आंतरिक मामला बताते हुए कहा कि दोनों संत आपस में बैठकर संवाद करें और इसे सौहार्दपूर्वक समाप्त करें।

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विवाद गहराने के बाद रामभद्राचार्य महाराज ने अपनी सफाई देते हुए कहा कि  प्रेमानंद महाराज पर उन्होंने कोई अभद्र टिप्पणी नहीं की है। आचार्य होने के नाते वह सभी को कहते हैं कि संस्कृत पढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि वो तो मेरे सामने बालक समान हैं, शास्त्र जिसको आए वहीं चमत्कार है। मैं प्रेमानंद से द्वेष नहीं रखता हूं, फिर कह रहा हूं वो मेरे बालक जैसे हैं. मैं उन्हें ना तो विद्वान कह रहा हूं, ना साधक ना चमत्कारी।
 

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