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आरती हमेशा घड़ी की दिशा में ही क्यों होती है? जानिए इसका असली कारण

  • Edited By Monika,
  • Updated: 07 Sep, 2025 05:05 PM
आरती हमेशा घड़ी की दिशा में ही क्यों होती है? जानिए इसका असली कारण

नारी डेस्क : हिंदू धर्म में पूजा-पाठ, मंत्रोच्चारण और अनुष्ठानों के हर नियम के पीछे गहरा अर्थ छिपा होता है। आरती भी उन्हीं में से एक है। मंदिरों और घरों में पूजा के अंत में दीपक या कपूर जलाकर देवता के सामने आरती की जाती है। इसमें भक्त दीपक को घड़ी की सुई की दिशा (दक्षिणावर्त दिशा) में घुमाते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है? चलिए जानते हैं इस परंपरा के पीछे छिपे धार्मिक और आध्यात्मिक कारण। 

ब्रह्मांडीय चक्र का प्रतीक

हिंदू धर्म में दक्षिणावर्त (घड़ी की सुई की दिशा) को हमेशा शुभ और प्राकृतिक माना गया है। सूर्य का उदय पूर्व से होता है और वह पश्चिम की ओर इसी दिशा में गतिशील रहता है। केवल सूर्य ही नहीं, बल्कि ग्रह-नक्षत्र और पूरा ब्रह्मांड भी इसी चक्र का अनुसरण करता है। इसी कारण आरती को दक्षिणावर्त दिशा में घुमाना यह दर्शाता है कि हमारी पूजा और भक्ति भी उसी ब्रह्मांडीय गति और ईश्वरीय व्यवस्था के साथ जुड़ी हुई है।

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देवता के प्रति सम्मान और परिक्रमा

जब हम आरती को दक्षिणावर्त दिशा में घुमाते हैं, तो यह ऐसा माना जाता है जैसे हम देवता के चारों ओर परिक्रमा कर रहे हों। मंदिरों में प्रदक्षिणा भी हमेशा इसी दिशा में की जाती है। यह परंपरा ईश्वर के प्रति गहरे सम्मान, भक्ति और समर्पण को दर्शाती है। आरती के समय यह भाव प्रकट होता है कि भगवान हमारे जीवन के केंद्र में हैं और हम उनकी आस्था के घेरे में शामिल हैं।

ऊर्जा प्रवाह और सकारात्मक कंपन

धार्मिक मान्यता है कि जब कोई वस्तु दक्षिणावर्त दिशा में घूमती है तो वह सकारात्मक ऊर्जा और शुभ कंपन उत्पन्न करती है। आरती का दीपक अग्नि तत्व का प्रतीक माना जाता है। जब इसे घड़ी की दिशा में घुमाया जाता है तो इसकी रोशनी और ऊर्जा पूरे वातावरण में फैल जाती है। इससे नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और पूजा का स्थान शांति, पवित्रता और सकारात्मकता से भर जाता है।

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पंच तत्वों का संतुलन

आरती में उपयोग किया जाने वाला दीपक अग्नि तत्व का प्रतीक है, जो पंचमहाभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में से एक है। जब इस दीपक को दक्षिणावर्त दिशा में घुमाया जाता है, तो यह सभी तत्वों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रतीक बन जाता है। माना जाता है कि इससे भक्त के चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा कवच बनता है और मन में शांति व स्थिरता का अनुभव होता है।

एकता और सामूहिक शक्ति

आरती प्रायः सभी भक्त मिलकर करते हैं। जब सभी लोग एक साथ दक्षिणावर्त दिशा में दीपक घुमाते हैं तो वहां एक विशेष सामूहिक ऊर्जा का निर्माण होता है। यह सामूहिक शक्ति न केवल भक्तों के मन को ईश्वर की ओर केंद्रित करती है, बल्कि आपसी एकता, भक्ति और आध्यात्मिक जुड़ाव को भी और मजबूत बनाती है।

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दक्षिणावर्त आरती करने के आध्यात्मिक लाभ

दक्षिणावर्त दिशा में आरती करने से वातावरण में दिव्य ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार होता है। इससे नकारात्मक शक्तियां और अशुद्धियां स्वतः ही दूर हो जाती हैं। आरती के समय मन अधिक शांत और एकाग्र रहता है, जिससे प्रार्थना का प्रभाव और गहरा होता है। भक्तों को ऐसा अनुभव होता है मानो वे ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़े हों। साथ ही, उनके चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षात्मक आभामंडल बनता है जो उन्हें नकारात्मक प्रभावों से बचाता है। 

इसलिए हिंदू धर्म में आरती को हमेशा घड़ी की सुई की दिशा (दक्षिणावर्त) में ही करने का विधान है। यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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