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पैरेंटिंग की ये 9 गलतियां बच्चों से छीन सकती हैं बचपन की खुशी,हर माता-पिता जा लें...

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 18 Jan, 2026 05:02 PM
पैरेंटिंग की ये 9 गलतियां बच्चों से छीन सकती हैं बचपन की खुशी,हर माता-पिता जा लें...

नारी डेस्क:  हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा खुश रहे, आत्मविश्वास से भरा हो और मानसिक रूप से मजबूत बने। लेकिन कई बार अच्छे इरादों के बावजूद माता-पिता की कुछ आदतें बच्चों के मन और भावनाओं को नुकसान पहुँचा देती हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, परवरिश के कुछ तरीके धीरे-धीरे बच्चों के अंदर डर, उदासी और असुरक्षा भर सकते हैं। आइए जानते हैं ऐसी 9 पैरेंटिंग गलतियां, जो बच्चों की मासूम खुशी छीन सकती हैं।

बच्चों की भावनाओं को नज़रअंदाज़ करना

जब बच्चा दुखी, डरा हुआ या गुस्से में होता है और उसे कहा जाता है  “कुछ नहीं हुआ”, “रोना बंद करो”, “इतनी सी बात पर क्यों रो रहे हो”, तो बच्चा अपनी भावनाओं को दबाना सीख जाता है। आगे चलकर वह न अपनी फीलिंग्स समझ पाता है और न ही उन्हें सही तरीके से व्यक्त कर पाता है।

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सिर्फ रिजल्ट या सफलता पर प्यार दिखाना

अगर माता-पिता बच्चे को तभी प्यार करें जब वह अच्छे नंबर लाए, जीते या सफल हो, तो बच्चा यह मानने लगता है कि बिना सफलता के वह किसी काम का नहीं है। यह सोच उसे हमेशा तनाव और डर में रखती है।

हर समय परफेक्ट बनने का दबाव

हर काम में अव्वल आना, गलती न करना और हमेशा दूसरों से बेहतर बनना यह दबाव बच्चों को अंदर से थका देता है। उन्हें लगता है कि गलती करना गुनाह है, जबकि गलती करना सीखने का हिस्सा होता है।

जरूरत से ज्यादा कंट्रोल करना

बच्चे के हर फैसले में दखल देना क्या पहनना है, किससे दोस्ती करनी है, क्या पसंद करना है इससे बच्चा खुद पर भरोसा करना नहीं सीख पाता। वह डरपोक और हमेशा उलझन में रहने लगता है।

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 दूसरों से तुलना करना

“देखो वो बच्चा कितना अच्छा है”, “उसके नंबर तुमसे ज्यादा हैं” जैसी बातें बच्चे के मन में हीन भावना भर देती हैं। वह खुद को कमतर समझने लगता है और अंदर ही अंदर टूट जाता है।

भावनात्मक रूप से मौजूद न रहना

अगर माता-पिता फोन, काम या तनाव में इतने उलझे रहें कि बच्चे की बातें न सुनें, तो बच्चा खुद को अकेला महसूस करता है। उसे लगता है कि उसकी बातें और भावनाएँ किसी के लिए मायने नहीं रखतीं।

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बिना वजह सख्ती और आदेश देना

“क्योंकि मैंने कहा है”, “ज्यादा सवाल मत पूछो” जैसी बातें बच्चों को डरा देती हैं। इससे वे खुलकर बात करना बंद कर देते हैं और अपनी राय दबाने लगते हैं।

बच्चों को समझाने की बजाय डांटना

हर गलती पर डांटना या सज़ा देना बच्चे के आत्मविश्वास को कमजोर करता है। बच्चा गलती छुपाने लगता है और सच बोलने से डरने लगता है।

मुश्किल समय में सहारा न देना

जब बच्चा परेशानी में हो और उसे समझने या दिलासा देने वाला कोई न मिले, तो वह यह मान लेता है कि उसकी तकलीफ मायने नहीं रखती। यह सोच आगे चलकर उसे भावनात्मक रूप से कमजोर और असुरक्षित बना देती है। बच्चों को परफेक्ट नहीं, समझे जाने की जरूरत होती है। थोड़ा प्यार, धैर्य और भावनात्मक सहारा बच्चों को खुश, आत्मविश्वासी और मजबूत बना सकता है।  

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