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सती प्रथा के सख्त खिलाफ थे गुरु नानक देव जी, जानिए उनसे जुड़ी कुछ खास बातें

  • Edited By Harpreet,
  • Updated: 30 Nov, 2020 11:43 AM
सती प्रथा के सख्त खिलाफ थे गुरु नानक देव जी, जानिए उनसे जुड़ी कुछ खास बातें

सिक्खों के पहले गुरु साहिब श्री गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1469 को रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी गांव में हुआ। असल में गुरु साहिब का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था, यही वजह है कि आज सिक्खों के साथ-साथ हिंदू धर्म के लोग भी गुरु नानक देव जी को अपना इष्ट मानते हैं। जैसा कि आप जानते हैं इस वर्ष गुरु साहिब का 550 वां गुरपूर्व पूरी दुनिया में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। ऐसे में आज हम भी गुरु साहिब के जीवन पर एक नजर चाहेंगे.. तो चलिए जानते हैं सिक्ख पंथ की शुरुआत करने वाले सिक्खों के पहले गुरु साहिब श्री गुरु नानक देव जी के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें...

माता-पिता और परिवार

असल में सिक्ख पंथ की शुरुआत करने वाले गुरु नानक देव जी का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था। पिता मेहता कालू और मां तृप्ता जी की कोख से जन्म लेने वाले गुरु साहिब बचपन से ही रुढ़ीवादी सोच के मालिक थे। जिस वक्त गुरु साहिब ने इस धऱती पर जन्म लिया तो सती प्रथा और अन्य कर्म-कांड जैसी कई बातें दुनिया भर में प्रचलित थी। जिनका उन्होंने डटकर विरोध किया और सती-प्रथा जैसी गलत प्रथाओं को होने से रोका।

क्या थी सती प्रथा ?

गुरु नानक देव जी जब उम्र में कुछ बड़े हुए तो उन्होंने देखा कि सती प्रथा की आग सब तरफ फैली हुई है। सती प्रथा यानि पति की मृत्यु के बाद पत्नि को जिंदा अपने पति की चिता में फेंक दिया जाता था। ऐसा होता देख गुरु साहिब ने न केवल इस चीज का विरोध किया बल्कि इस प्रथा का अंत भी किया। यहां तक उन्होंने विधवा औरत के पुर्नविवाह की भी रीत चलाई।

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गुरु साहिब के अनुसार हर व्यक्ति ईश्वर से अपनी सांसे लिखवाकर आया है। उस ईश्वर के अलावा और कोई भी किसी की मृत्यु तय नहीं कर सकता। ऐसे में यदि पति की मृत्यु हो जाती है तो स्त्री अपनी मर्जी से अपना जीवन व्यतीत करने का पूरा हक रखती है। 

पढ़ने-लिखने में कम रुचि...

जब गुरु साहिब 4-5 साल के हुए तो पिता जी ने पढ़ाई करने के लिए उन्हें पाठशाला भेजा। मगर जब अध्यापक ने गुरु साहिब जी को 1 लिखने के लिए बोला तो उन्होंने उस एक का 'इक ओंकार' शब्द बना दिया। गुरु साहिब इसके आगे कभी कुछ न सीखते और न ही लिखते। धीरे-धीरे पिता मेहता कालू जी को पता चल गया कि इनकी रुचि पढ़ने लिखने में नहीं है। कुछ और बड़े हुए तो पिता जी ने 20 रुपए देकर व्यापार करने के लिए घर से भेजा। मगर उन 20 रुपयों से भी गुरु साहिब नें साधू-संतों को भोजन करवा दिया।

बहन नानकी से लगाव

गुरु साहिब जी अपनी बहन नानकी से बहुत प्रेम करते थे। गुरु साहिब ने अपना ज्यादा जीवन उदासी करने में ही बिताया। जब भी गुरु साहिब उदासी से घर लौटते तो सबसे पहले अपनी बहन नानकी से ही मिलने जाया करते थे। जब भी गुरु साहिब समाज में हो रही बुराईयों के खिलाफ बोलते तो बहन नानकी हमेशा उनका साथ देती। यहां तक कि गुरु साहिब जब बेईं नदी में स्नान करने के लिए गए तो वहां पूरे 14 दिन तक लुप्त रहे। सभी लोगों ने समझा कि गुरु साहिब पानी में डूब चुके हैं। मगर बहन नानकी का विश्वास था कि नानक डूबे नहीं बल्कि वो तो इस दुनिया को तारने के लिए आए हैं, और हुआ भी वही गुरु साहिब पूरे 14 दिन बाद बेईं नदी से प्रकट हुए। उस दिन के बाद बहन नानकी के साथ-साथ सभी लोगों ने मान लिया कि गुरु साहिब सच में कोई आम इंसान नहीं बल्कि कोई महान् अवतार हैं।

शादी

गुरु नानक देव जी की पत्नी का नाम सुलक्षिनी था, वह बटाला की रहने वाली थीं। उनके दो बेटे थे, एक बेटे का नाम श्रीचंद और दूसरे बेटे का नाम लक्ष्मीदास था। गुरु साहिब के जन्म दिवस के साथ-साथ उनके विवाह पर्व को भी बटाला में बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है। इस विवाह पर्व को सितंबर महीने की शुरुआत में मनाया जाता है।

यात्राएं

गुरु साहिब ने समाज और मानवता को एक सूत्र में पिरोने के लिए कुल 5 यात्राएं की। इन यात्राओं के दौरान गुरु साहिब ने पूरी दुनिया का चक्कर लगा लिया था। गुरु साहिब जहां-जहां गए वहां उन्होंने बुराईयों का खत्म करके लोगों को धर्म-कर्म की बातें सिखाईं।

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तो ये थी साहिब श्री गुरु नानक देव जी के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें। गुरु साहिब का 550 वां जन्म दिवस बहुत ही धूम-धाम से पंजाब के शहर सुल्तानपुर लोधी में मनाया जा रहा है। आप सब भी इस महान पर्व के मौके सुल्तानपुर जाकर गुरु साहिब का आर्शीवाद पा सकते हैं।  

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