नारी डेस्क: मानसून के मौसम में बारिश और उमस के साथ कई तरह के वायरल संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। इस दौरान बुखार, खांसी, गले में खराश, सिरदर्द और शरीर में दर्द जैसी शिकायतें आम देखने को मिलती हैं। यही वजह है कि कई बार लोग इन लक्षणों को सामान्य वायरल फीवर समझकर घर पर ही इलाज शुरू कर देते हैं। लेकिन कुछ मामलों में यही लक्षण H1N1 फ्लू यानी स्वाइन फ्लू के भी हो सकते हैं। H1N1 को हर बार गंभीर बीमारी समझने की जरूरत नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं है। खासकर अगर बुखार और खांसी के साथ सांस लेने में परेशानी या बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस हो रही हो, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी हो जाता है।
H1N1 और सामान्य वायरल फीवर में फर्क समझना क्यों मुश्किल है
H1N1 फ्लू के शुरुआती लक्षण सामान्य फ्लू और दूसरे वायरल संक्रमणों से काफी मिलते-जुलते हो सकते हैं। तेज बुखार, ठंड लगना, खांसी, गले में खराश, नाक बहना, सिरदर्द और शरीर में दर्द जैसी परेशानियां दोनों ही स्थितियों में दिखाई दे सकती हैं। इसलिए केवल लक्षण देखकर यह तय करना आसान नहीं होता कि किसी व्यक्ति को सामान्य वायरल फीवर है या H1N1 संक्रमण। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर मरीज की स्थिति और लक्षणों को देखते हुए जांच की सलाह दे सकते हैं।

H1N1 में कौन-कौन से लक्षण दिखाई देते हैं
H1N1 फ्लू होने पर कई लोगों में अचानक बुखार आने के साथ बीमारी के दूसरे लक्षण शुरू हो सकते हैं। इसमें ठंड लगना, लगातार खांसी, गले में खराश, नाक बंद होना या नाक से पानी आना शामिल है। इसके अलावा सिरदर्द, मांसपेशियों और शरीर में दर्द, थकान और कमजोरी भी महसूस हो सकती है। कुछ बच्चों में फ्लू के दौरान उल्टी या दस्त जैसी शिकायतें भी हो सकती हैं। हर व्यक्ति में सभी लक्षण दिखाई दें, यह जरूरी नहीं है। कुछ लोगों में बीमारी हल्की रह सकती है, जबकि कुछ लोगों में संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है।
कब समझें कि डॉक्टर को दिखाना जरूरी है
अगर बुखार और खांसी जैसे लक्षण हल्के हैं और धीरे-धीरे ठीक हो रहे हैं, तब भी अपनी स्थिति पर नजर रखना जरूरी है। लेकिन सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, बहुत ज्यादा कमजोरी या हालत लगातार बिगड़ने जैसे संकेत दिखाई दें तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए। बच्चों में भी सांस लेने में दिक्कत, असामान्य सुस्ती, पानी की कमी के संकेत या लगातार बिगड़ती हालत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खास तौर पर उन लोगों को लक्षण आने पर जल्द चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए, जिन्हें पहले से कोई गंभीर बीमारी है या जिनमें फ्लू से जटिलताओं का खतरा अधिक हो सकता है।

इन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत
H1N1 संक्रमण किसी को भी हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों में इसके गंभीर होने का जोखिम अपेक्षाकृत अधिक रहता है। इनमें 5 साल से कम उम्र के बच्चे, 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं शामिल हैं। इसके अलावा डायबिटीज, हृदय रोग, अस्थमा, COPD या किडनी जैसी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को भी फ्लू के लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों के लिए भी संक्रमण गंभीर हो सकता है।
मानसून में क्यों बढ़ सकता है फ्लू का संक्रमण
बारिश के मौसम में तापमान और नमी में बदलाव के साथ लोगों की दिनचर्या भी बदल जाती है। कई बार लोग लंबे समय तक बंद या भीड़भाड़ वाली जगहों पर रहते हैं, जहां संक्रमित व्यक्ति के करीब रहने से श्वसन संक्रमण फैलने की संभावना बढ़ सकती है। फ्लू वायरस संक्रमित व्यक्ति की खांसी या छींक से निकलने वाली बूंदों के जरिए फैल सकता है। संक्रमित सतह को छूने के बाद मुंह, नाक या आंखों को छूने से भी संक्रमण का जोखिम हो सकता है।
H1N1 से बचने के लिए क्या करें
फ्लू और दूसरे श्वसन संक्रमणों से बचाव के लिए हाथों को नियमित रूप से साबुन और पानी से धोना जरूरी है। खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को ढकें और बीमार व्यक्ति के बहुत करीब जाने से बचें। अगर आप बीमार हैं तो दूसरों के संपर्क को कम रखना भी जरूरी है, ताकि संक्रमण आगे न फैले। भीड़भाड़ वाली जगहों पर जरूरत के मुताबिक मास्क का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके साथ पर्याप्त आराम, पानी और पौष्टिक भोजन लेना शरीर को बीमारी से उबरने में मदद कर सकता है। हालांकि, केवल घरेलू उपायों के भरोसे गंभीर लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

H1N1 को वायरल फीवर समझकर न करें लापरवाही
बुखार और खांसी होने का मतलब हर बार H1N1 नहीं होता। कई दूसरे वायरल संक्रमणों में भी ऐसे ही लक्षण हो सकते हैं। इसलिए बिना जांच के खुद से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं है कि बुखार सामान्य है या H1N1। सबसे जरूरी बात यह है कि लक्षणों की गंभीरता पर ध्यान दिया जाए। अगर बुखार, खांसी और शरीर में दर्द के साथ सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, अत्यधिक कमजोरी या हालत बिगड़ने जैसे संकेत नजर आएं, तो डॉक्टर से संपर्क करने में देरी नहीं करनी चाहिए। समय पर चिकित्सकीय सलाह लेने से संभावित जटिलताओं का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।