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ऐसा आखिर कब तक...?

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Views:- Sunday, June 14, 2015-3:20 PM

इंसान की दुनिया में जीवन के मधुर रंग भर कर उसे सुंदर बनाने वाली नारी हर रिश्ते की संजीदगी से देखभाल करती है और परिवार की उन्नति में योगदान देती है । तभी तो उसे भगवान का दिया अनमोल तोहफा कहा जाता है । जब जीवन का हर रिश्ता उससे जुड़ा है और वह जननी, बेटी, बहन, पत्नी और एक दोस्त के रूप में हमारे ही जीवन को बखूबी संवारती है तो फिर वह क्यों अन्याय सहती है? क्यों अन्याय का शिकार हो कर निरपराध होते हुए भी चुपचाप उसका दंड भुगतती है । कभी अजनबी तो कभी रक्षक ही उसका भक्षक बन कर जब उसकी अस्मिता को तार-तार कर देता है तो उस पर क्या बीतती है इसका अंदाजा कोई  नहीं लगा सकता । ऐसे में देवी के रूप में पूजी जाने वाली नारी समाज में उपेक्षित जीवन गुजारने पर मजबूर हो जाती है ।

दोहरापन क्यों
दोहरेपन की मानसिकता का शिकार हमारा समाज एक तरफ तो नारी को देवी और शक्ति का रूप मानता है और दूसरी तरफ  बलात्कार, एसिड अटैक, अपहरण, छेड़छाड़ एवं कन्या भ्रूण-हत्या जैसे जघन्य अपराधों में भी निरंतर बढ़ौतरी होती जा रही है। इसके लिए नारी की खामोशी, भी काफी हद तक जिम्मेदार है । 

रक्षक ही भक्षक
एक सर्वे के अनुसार ज्यादातर मामलों में रक्षक ही भक्षक के रूप में नजर आए हैं । नारी ने कभी आवाज उठाने की कोशिश भी की तो उसे परिवार की इज्जत, बच्चों का भविष्य, करियर के खत्म हो जाने की धमकी तथा कानून की अनेक अड़चनों का डर दिखाते हुए चुप करा दिया जाता है । उसकी खामोशी को ही उसकी कमजोरी मान लिया जाता है परंतु जब भी नारी ने अपनी भीतरी शक्ति को जगाया है उसने इतिहास बदला है ।

सहना क्यों
बलात्कार केवल नारी के शरीर का ही नहीं बल्कि उसके मन और आत्मा, संपूर्ण ख्वाहिशों और सपनों का भी होता है । मानवता की सभी हदों को पार कर होने वाले ऐसे घिनौने अपराध करने के बाद भी अपराधी खुलेआम समाज में घूमते हैं और पकड़े जाने पर जमानत पर छूट जाते हैं । हालांकि फास्ट ट्रैक अदालतों से एक उम्मीद तो बंधी है परंतु अभी भी कई अपने फैसले का वर्षों से इंतजार कर रहे हैं । सालों बाद मिले फैसले में भी ज्यादातर मामलों में अपराधी को उतनी कड़ी सजा नहीं मिलती और सारी जिल्लत सहती नारी स्वयं को ठगा हुआ-सा महसूस करने लगती है । 

आज नारी में स्वतंत्रता तथा साक्षरता के कारण काफी बदलाव आया है । वे पहले की अपेक्षा अधिक आत्मनिर्भर और शिक्षित हैं । इसके बावजूद कहीं मां के गर्भ में ही मारी जाती हैं कन्याएं, तो कहीं बाबुल की दहलीज से विदा हो दहेज की बलि चढ़ा दी जाती हैं । कहीं घर से बाहर निकल वह वहशी दरिंदों का शिकार बनती हैं तो कहीं घरेलू हिंसा की शिकार हैं । ज्यादातर महिलाओं को तो कानून की भी जानकारी नहीं है । 

कड़े कानून से सुरक्षित समाज
हैवानियत का जाति, धर्म या समाज से कोई लेना-देना नहीं होता । उसकी एक ही निर्लज्ज, कुटिल एवं पापी सोच होती है । वास्तव में महिलाओं के विरुद्ध अपराध करने वाले अपराधी को कम समय चले केस में इतनी कड़ी सजा मिलनी चाहिए कि लोग अपराध करने से पहले दस बार सोचें, तभी तो बनेगा एक सुरक्षित समाज । भारत में ही नहीं बल्कि अन्य देशों में बलात्कार और घरेलू हिंसा जैसे अपराध आम हैं । जिन देशों में कानून सख्त हैं तथा अपराधी को जल्द से जल्द कड़ी सजा सुनाई जाती है, वहां ऐसे अपराधों की संख्या कम है तथा नारी अधिक सुरक्षित है। 

अमेरिका जैसे देश में किसी के साथ किसी भी तरह का शारीरिक, मानसिक अपराध करने वाले अपराधी को सजा की अवधि पूरी हो जाने के बाद भी पुलिस के पास अपना नाम, पता, सोशल सिक्योरिटी नंबर रजिस्टर करवा कर रखना पड़ता है । उसे समय-समय पर पुलिस स्टेशन जाकर हाजिरी लगानी पड़ती है और यदि ऐसे अपराधी एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं, तो उसकी भी सूचना देकर जाते हैं। 

यहां तक कि ऐसे लोग बच्चों के स्कूल, पार्क या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर बच्चों के करीब नहीं जा सकते । इन नियमों का पालन नहीं करने पर उन्हें फिर से जेल हो जाती है । इस तरह के सख्त कानून और समय पर न्याय मिलने की वजह से आम नागरिक का सिस्टम पर विश्वास  बना रहता है । इससे अपराधों पर नियंत्रण रहता है तथा महिलाएं एवं बच्चे अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं ।

नाम की आजादी 
यहां बात स्वतंत्रता की नहीं बल्कि समझदारी की है, सही और गलत की नहीं बल्कि मानसिक बदलाव की है । मानसिकता बदलेगी तो बदलाव भी आएगा क्योंकि नारी की इस दिखावटी स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता से सशक्तिकरण तब तक संभव नहीं, जब तक उसे अपने निर्णय स्वयं लेने की आजादी नहीं मिल जाती। 

खुद को पहचानो
नारी तुम हो अर्धनारीश्वर का रूप, तुम हो जन्म का आधार, धरती सा है स्नेह स्वरूप, नदिया की हो निर्मल धारा, वायु सी तुम जीवन दाता, फूलों सी हो कोमल सुगंधित, शक्ति का तुम में भंडार... खुद की शक्ति को पहचान कर रचो तुम एक नया संसार...।

- हेमा शर्मा, चंडीगढ़