नारी डेस्क: अगर गर्दन और कंधों के बीच की जगह पर असामान्य रूप से चर्बी जमा होने लगे और वहां एक उभरी हुई गांठ जैसी दिखाई दे, तो इसे मेडिकल भाषा में बफैलो हंप (Buffalo Hump) या डोर्सोसर्वाइकल फैट पैड (Dorsocervical Fat Pad) कहा जाता है। कई लोग इसे सामान्य मोटापे का हिस्सा समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा हमेशा नहीं होता। यह समस्या केवल वजन बढ़ने की वजह से नहीं होती, बल्कि कई बार हार्मोनल असंतुलन, कुछ दवाओं के लंबे समय तक सेवन या अन्य गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों का संकेत भी हो सकती है। सिर्फ मोटापा नहीं, कई स्वास्थ्य समस्याओं से हो सकता है संबंध शोधों के अनुसार बफैलो हंप के पीछे कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं। इसलिए इसकी सही वजह जानना और उसी के अनुसार इलाज कराना जरूरी होता है।
कुशिंग सिंड्रोम हो सकता है प्रमुख कारण
बफैलो हंप का सबसे प्रमुख कारण कुशिंग सिंड्रोम माना जाता है। इस स्थिति में शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन का स्तर सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। ऐसा एड्रिनल ग्लैंड में ट्यूमर, पिट्यूटरी ग्लैंड की समस्या या लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं के इस्तेमाल की वजह से हो सकता है। बढ़ा हुआ कॉर्टिसोल शरीर में फैट के असामान्य वितरण का कारण बनता है, जिससे गर्दन के पीछे चर्बी जमा होने लगती है।

लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का सेवन
अस्थमा, गठिया, त्वचा रोग और कई ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज में कॉर्टिकोस्टेरॉयड दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। अगर इन दवाओं का लंबे समय तक सेवन किया जाए, तो शरीर में फैट जमा होने का तरीका बदल सकता है और बफैलो हंप बनने की संभावना बढ़ सकती है। इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना स्टेरॉयड दवा शुरू या बंद नहीं करनी चाहिए।
HIV के इलाज से भी जुड़ी हो सकती है समस्या
कुछ मामलों में HIV के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी भी शरीर में फैट के वितरण को प्रभावित कर सकती है। इस स्थिति में चेहरे और हाथ-पैरों की चर्बी कम होने लगती है, जबकि गर्दन, पेट और सीने के आसपास फैट जमा हो सकता है। हालांकि यह समस्या सभी मरीजों में नहीं होती।
बढ़ता वजन और अनियमित जीवनशैली
अधिक वजन, शारीरिक गतिविधियों की कमी और असंतुलित खानपान भी गर्दन के पीछे चर्बी बढ़ाने में भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मोटापा ही बफैलो हंप का कारण नहीं होता। अगर इसके साथ हार्मोनल असंतुलन भी जुड़ जाए, तो समस्या अधिक स्पष्ट हो सकती है।
खराब बॉडी पोस्टर भी बढ़ा सकता है परेशानी
लंबे समय तक कंप्यूटर के सामने बैठकर काम करने या लगातार गर्दन झुकाकर मोबाइल इस्तेमाल करने से शरीर का पोश्चर प्रभावित होता है। हालांकि खराब पोश्चर अकेले बफैलो हंप का कारण नहीं माना जाता, लेकिन इससे गर्दन और कंधों की मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं, जिससे समस्या ज्यादा स्पष्ट दिखाई देने लगती है।

किन लक्षणों पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए
अगर गर्दन के पीछे लगातार चर्बी बढ़ रही हो, गांठ जैसी उभरी हुई दिखाई दे, गर्दन में दर्द बना रहे, कंधों में जकड़न महसूस हो या इसके साथ वजन बढ़ना, चेहरे पर सूजन, हाई ब्लड प्रेशर या अन्य हार्मोनल बदलाव नजर आएं, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
बफैलो हंप का इलाज कैसे किया जाता है
बफैलो हंप का कोई एक तय इलाज नहीं होता। इसका उपचार पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि इसकी वजह क्या है। अगर कारण कुशिंग सिंड्रोम है, तो हार्मोनल उपचार या जरूरत पड़ने पर सर्जरी की जा सकती है। यदि स्टेरॉयड दवाएं वजह हैं, तो डॉक्टर की निगरानी में उनकी मात्रा धीरे-धीरे कम की जाती है।

डाइट और एक्सरसाइज भी निभाते हैं अहम भूमिका
अगर समस्या मोटापे या जीवनशैली से जुड़ी है, तो संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रित करने से काफी फायदा मिल सकता है। कार्डियो एक्सरसाइज, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह के अनुसार किए गए व्यायाम गर्दन और कंधों की मांसपेशियों को मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं। यदि गर्दन के पीछे अत्यधिक फैट जमा हो गया हो और अन्य उपचारों से लाभ न मिले, तो डॉक्टर लाइपोसक्शन जैसी सर्जिकल प्रक्रिया की सलाह दे सकते हैं। हालांकि यह निर्णय मरीज की स्वास्थ्य स्थिति और जांच रिपोर्ट के आधार पर ही लिया जाता है।
योग और सही पोश्चर भी दे सकते हैं राहत
नियमित योगाभ्यास, स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज और सही बैठने-उठने की आदत अपनाने से गर्दन और कंधों पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव कम हो सकता है। हालांकि योग किसी गंभीर हार्मोनल बीमारी का इलाज नहीं है, लेकिन यह शरीर की कार्यक्षमता और पोश्चर सुधारने में मदद कर सकता है।
शरीर में दिख रहे बदलावों को नजरअंदाज न करें
गर्दन के पीछे उभरी हुई गांठ को केवल मोटापा मानकर अनदेखा करना सही नहीं है। कई बार यह शरीर के भीतर चल रही किसी गंभीर समस्या का शुरुआती संकेत हो सकता है। यदि ऐसा कोई बदलाव दिखाई दे, तो स्वयं इलाज करने की बजाय डॉक्टर से सलाह लेकर आवश्यक जांच कराना सबसे बेहतर कदम है। सही समय पर कारण की पहचान और उपचार से भविष्य में होने वाली जटिलताओं से बचा जा सकता है।