नारी डेस्क: किडनी हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है। यह खून को साफ करने, शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालने और कई जरूरी शारीरिक प्रक्रियाओं को संतुलित रखने का काम करती है। लेकिन समस्या यह है कि किडनी से जुड़ी बीमारियां अक्सर धीरे-धीरे विकसित होती हैं और शुरुआती चरण में इनके लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं होते। ऐसे में कई लोग तब तक बीमारी को पहचान नहीं पाते, जब तक किडनी को काफी नुकसान नहीं पहुंच चुका होता। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर शरीर कुछ संकेत दे रहा है, जैसे बार-बार थकान महसूस होना, पैरों में सूजन आना, पेशाब से जुड़ी समस्याएं या कमर के निचले हिस्से में दर्द, तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच करवाने से बीमारी का पता जल्दी लगाया जा सकता है और इलाज शुरू कर गंभीर नुकसान से बचा जा सकता है।
किडनी की जांच के लिए क्यों जरूरी हैं ये टेस्ट
किडनी की कार्यक्षमता का सही आकलन केवल लक्षणों के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए कुछ विशेष मेडिकल टेस्ट किए जाते हैं, जो यह बताते हैं कि किडनी सही तरीके से काम कर रही है या नहीं। आइए जानते हैं ऐसे महत्वपूर्ण टेस्टों के बारे में।

क्रिएटिनिन ब्लड टेस्ट और eGFR
किडनी की स्थिति जानने के लिए सबसे आम और जरूरी टेस्ट क्रिएटिनिन ब्लड टेस्ट माना जाता है। क्रिएटिनिन शरीर में बनने वाला एक वेस्ट प्रोडक्ट है, जिसे सामान्य स्थिति में किडनी फिल्टर करके बाहर निकाल देती है। यदि खून में क्रिएटिनिन का स्तर बढ़ा हुआ मिलता है, तो यह संकेत हो सकता है कि किडनी ठीक से काम नहीं कर रही। इसके साथ डॉक्टर eGFR यानी Estimated Glomerular Filtration Rate की भी जांच करते हैं। यह टेस्ट बताता है कि किडनी खून को कितनी प्रभावी ढंग से फिल्टर कर पा रही है।
सिस्टैटिन-सी टेस्ट
सिस्टैटिन-सी एक प्रकार का प्रोटीन है, जो शरीर की कोशिकाओं द्वारा लगातार बनता रहता है। जब किडनी की कार्यक्षमता कम होने लगती है, तो इसका स्तर खून में बढ़ने लगता है। कई मामलों में यह टेस्ट शुरुआती किडनी डैमेज का पता लगाने में मददगार माना जाता है, खासकर तब जब क्रिएटिनिन रिपोर्ट सामान्य दिखाई दे रही हो लेकिन किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित हो रही हो।
यूरिन डिपस्टिक टेस्ट
यह एक सरल और तेज़ यूरिन टेस्ट है, जिसके जरिए पेशाब में प्रोटीन, खून और अन्य असामान्य तत्वों की जांच की जाती है। स्वस्थ व्यक्ति के पेशाब में आमतौर पर प्रोटीन नहीं होना चाहिए। यदि पेशाब में प्रोटीन या खून पाया जाता है, तो यह किडनी से जुड़ी किसी समस्या का शुरुआती संकेत हो सकता है।

यूरिन प्रोटीन-टू-क्रिएटिनिन रेशियो (UPCR)
अगर डिपस्टिक टेस्ट में किसी तरह की गड़बड़ी सामने आती है, तो डॉक्टर UPCR टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं। यह जांच पेशाब में प्रोटीन की मात्रा को अधिक सटीक तरीके से मापती है और यह पता लगाने में मदद करती है कि किडनी से प्रोटीन का रिसाव तो नहीं हो रहा। यह टेस्ट किडनी रोग की गंभीरता का अंदाजा लगाने में भी उपयोगी होता है।
अल्ट्रासाउंड से मिलती है किडनी की पूरी तस्वीर
कई बार खून और पेशाब की रिपोर्ट के साथ-साथ किडनी का अल्ट्रासाउंड भी कराया जाता है। इस जांच के जरिए किडनी की बनावट, आकार और संरचना को देखा जा सकता है। अल्ट्रासाउंड से यह पता चल सकता है कि किडनी में कोई रुकावट, पथरी, संक्रमण, सूजन या अन्य संरचनात्मक समस्या तो मौजूद नहीं है। इसलिए किडनी की विस्तृत जांच में यह एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
किन लोगों को जरूर करवानी चाहिए जांच
अगर आपको लगातार थकान महसूस होती है, पैरों या टखनों में सूजन रहती है, पेशाब का रंग या मात्रा बदल रही है, बार-बार पेशाब आ रहा है, पेशाब में जलन हो रही है या कमर के निचले हिस्से में दर्द बना रहता है, तो डॉक्टर से सलाह लेकर किडनी की जांच जरूर करवानी चाहिए। इसके अलावा डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा या परिवार में किडनी रोग का इतिहास रखने वाले लोगों को नियमित अंतराल पर किडनी फंक्शन टेस्ट करवाते रहना चाहिए।

समय पर जांच से बच सकती है किडनी
किडनी की बीमारी का सबसे बड़ा खतरा यही है कि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं। लेकिन सही समय पर किए गए टेस्ट बीमारी की पहचान जल्दी कर सकते हैं। यदि समस्या शुरुआती चरण में पकड़ में आ जाए, तो इलाज और जीवनशैली में बदलाव के जरिए किडनी को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या जांच से संबंधित निर्णय लेने से पहले विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह जरूर लें।