18 JULSATURDAY2026 2:03:43 AM
Nari

भगवान जगन्नाथ की मौसी कौन हैं, जिनसे मिलने के लिए हर साल रथ यात्रा मेंं जाते है महाप्रभु

  • Edited By Monika,
  • Updated: 16 Jul, 2026 12:38 PM
भगवान जगन्नाथ की मौसी कौन हैं, जिनसे मिलने के लिए हर साल रथ यात्रा मेंं जाते है महाप्रभु

नारी डेस्क : ओडिशा के पुरी में निकलने वाली विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ से जुड़ी कई पौराणिक कथाओं और मान्यताओं का प्रतीक भी है। हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर से भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। इस यात्रा को भगवान के अपनी मौसी के घर जाने की परंपरा माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ की मौसी कौन हैं? इसके पीछे दो प्रमुख पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।

पहली कथा: रानी गुंडिचा बनीं भगवान जगन्नाथ की मौसी

पौराणिक मान्यता के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ के भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। लेकिन मंदिर में भगवान की मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा कराने के लिए योग्य पुरोहित नहीं मिल रहे थे। तभी देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि स्वयं ब्रह्मा जी ही इस कार्य को पूरा कर सकते हैं। राजा इंद्रद्युम्न ब्रह्मलोक जाने के लिए तैयार हुए, लेकिन नारद जी ने बताया कि वहां से लौटने में कई युग बीत जाएंगे। ऐसे में रानी गुंडिचा ने अपने पति की प्रतीक्षा करते हुए तपस्या करने और समाधि में रहने का संकल्प लिया।

PunjabKesari

जब राजा इंद्रद्युम्न ब्रह्मा जी के साथ वापस लौटे, तब तक कई युग बीत चुके थे और श्रीमंदिर रेत में दब चुका था। उस समय पुरी पर राजा गालु माधव का शासन था। खुदाई के बाद मंदिर का गर्भगृह मिला और ब्रह्मा जी ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्राण-प्रतिष्ठा कराई। उधर, रानी गुंडिचा की तपस्या भी समाप्त हुई और उनका राजा से पुनर्मिलन हुआ। रानी के त्याग और प्रतीक्षा से प्रसन्न होकर भगवान जगन्नाथ ने उन्हें मां समान सम्मान देते हुए अपनी मौसी का दर्जा दिया और वचन दिया कि वे हर वर्ष उनसे मिलने अवश्य आएंगे। मान्यता है कि जिस स्थान पर रानी गुंडिचा ने तप किया था, वहीं आज का गुंडिचा मंदिर स्थित है। इसी परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ हर साल रथ यात्रा के दौरान गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं और वहां कुछ दिनों तक विराजमान रहते हैं।

यें भी पढ़ें : भगवान जगन्नाथ आज जाएंगे मौसी के घर, जानें रथ यात्रा का पूरा शेड्यूल

दूसरी कथा: पुरी की मौसी मां अर्धशोषणी

पुरी में स्थित मौसी मां मंदिर भी भगवान जगन्नाथ की मौसी से जुड़ा हुआ है। यहां देवी अर्धशोषणी (अर्धासिनी) की पूजा की जाती है। स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार समुद्र का जल स्तर इतना बढ़ गया कि श्रीमंदिर पर संकट आ गया। तब देवी अर्धशोषणी ने बाढ़ का आधा पानी पी लिया और मंदिर को डूबने से बचा लिया। इस कारण उन्हें पुरी की रक्षक देवी माना जाता है और भगवान जगन्नाथ की मौसी का सम्मान प्राप्त है।

PunjabKesari

जब मौसी ने खिलाया था पोड़ा पीठा

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार माता लक्ष्मी किसी कारणवश नाराज होकर अपने मायके चली गईं। उनके जाने के बाद श्रीमंदिर में अन्न और समृद्धि का अभाव हो गया। भगवान जगन्नाथ और बलभद्र को भोजन के लिए भिक्षा मांगनी पड़ी, जबकि देवी सुभद्रा अपनी मौसी अर्धशोषणी के घर चली गईं। मौसी अर्धशोषणी ने सुभद्रा की मां की तरह सेवा की और प्रेमपूर्वक उनका पालन किया। तभी से रथ यात्रा के दौरान जब भगवान जगन्नाथ का रथ मौसी मां मंदिर के पास पहुंचता है, तो वहां उनका रथ कुछ समय के लिए रोका जाता है और उन्हें पोड़ा पीठा (ओडिशा का पारंपरिक व्यंजन) का भोग लगाया जाता है। यह परंपरा आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

यें भी पढ़ें : भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा सबसे पहले सालबेग की मजार पर क्यों रुकती है?

क्यों खास है भगवान का मौसी के घर जाना?

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा, त्याग और वचन निभाने का संदेश भी देती है। हर साल महाप्रभु का मौसी के घर जाना इस बात का प्रतीक है कि भगवान अपने भक्तों और अपनों से किया वादा कभी नहीं भूलते। यही वजह है कि जगन्नाथ रथ यात्रा दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अधिक श्रद्धा से मनाए जाने वाले धार्मिक उत्सवों में गिनी जाती है।

Related News