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क्या हर कोई खींच सकता है भगवान जगन्नाथ का रथ? जानिए रथ यात्रा के नियम और तीनों रथों के नाम

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 13 Jul, 2026 02:24 PM
क्या हर कोई खींच सकता है भगवान जगन्नाथ का रथ? जानिए रथ यात्रा के नियम और तीनों रथों के नाम

नारी डेस्क: जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इसे हर साल बहुत धूमधाम से मनाया जाता है और दुनिया भर से लोग इस शुभ त्योहार में शामिल होने के लिए ओडिशा के पवित्र शहर पुरी आते हैं।  इस उत्सव को 'रथ यात्रा' (Chariot Festival) भी कहा जाता है, जो भगवान विष्णु के एक अद्भुत रूप, भगवान जगन्नाथ के सम्मान में आयोजित की जाती है। भक्त भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद मांगते हैं। हिंदू धर्म में, यह उत्सव आध्यात्मिक और धार्मिक दोनों ही दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। प्रसिद्ध जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा 16 जुलाई, 2026 को आयोजित की जाएगी।  

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जगन्नाथ रथ यात्रा 2026: तिथि और समय

द्वितीया तिथि प्रारम्भ - 15 जुलाई 2026 - प्रातः 11:50 बजे
द्वितीया तिथि समाप्त - 16 जुलाई, 2026 - 08:52 पूर्वाह्न


जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, जगन्नाथ रथ यात्रा हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह त्योहार हर साल बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। जगन्नाथ रथ यात्रा का त्योहार हिंदू महीने आषाढ़ में होता है और हज़ारों भक्त भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियों को पुरी की सड़कों पर एक शानदार जुलूस में खींचते हैं। माना जाता है कि जगन्नाथ पुरी वह जगह है जहां लोग भगवान कृष्ण की मौजूदगी महसूस कर सकते हैं क्योंकि भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के अंदर श्री हरि का दिल धड़कता है। जगन्नाथ रथ यात्रा एक शानदार उत्सव है जो हर साल देश भर से बड़ी संख्या में भक्तों को आकर्षित करता है।

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रथ खींचने का क्या है नियम?

भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचने के लिए कोई जाति, धर्म, प्रांत या देश का बंधन नहीं होता। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह भारत का हो या विदेश का, इस रथ को खींच सकता है। भगवान के दरबार में सभी भक्त समान माने जाते हैं। इसलिए यह रथ यात्रा एकता और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है। ऐसी मान्यता है कि रथ खींचने वाला व्यक्ति जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। यह एक ऐसा आध्यात्मिक अनुभव होता है, जिसे श्रद्धालु जीवनभर याद रखते हैं। भक्तों की भारी संख्या को देखते हुए हर व्यक्ति को केवल कुछ कदम तक ही रथ खींचने की अनुमति मिलती है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इस पुण्य कार्य में शामिल हो सकें।


रीति-रिवाज और परंपराएं

हर साल, देवताओं - भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के लिए तीन विशाल रथ बनाए जाते हैं। रथों का आकार और बनावट प्राचीन परंपराओं के अनुसार होती है। भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को रत्न जड़ित सिंहासन से उतारकर 22 सीढ़ियों (बैसी पहाचा) के माध्यम से सिंह द्वार से होकर एक विस्तृत शाही अनुष्ठान ‘पहांडी' के जरिये मंदिर से बाहर लाया जाता है। इस दौरान गाना-बजाना, नृत्य और मंत्रोच्चार होता है। जब भक्त पुरी की सड़कों पर रथ खींचते हैं, तो वे भजन गाते हैं और स्तुति-मंत्रों का पाठ करते हैं। इसे बहुत ही सौभाग्यशाली कार्य माना जाता है।  मंदिर के गर्भगृह से मुख्य देवताओं को बाहर लाने से पहले ‘मंगला आरती' और ‘मैलम' जैसे कई पारंपरिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।


तीनों रथों के नाम और विशेषताएं

इस रथ यात्रा में तीन रथ होते हैं, जिनमें भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलराम जी और बहन सुभद्रा जी विराजमान होते हैं।

-भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘नंदीघोष’ कहा जाता है। यह लगभग 45 फीट ऊंचा होता है । इसके 16 पहिए होते हैं , इसका रंग लाल और पीला रथ के आगे गरुड़ ध्वज और श्री हनुमान की आकृति होती है।

-बलराम जी के रथ  को ‘तालध्वज’ कहा जाता है। यह लगभग 45 फीट ऊंचा होता है ।  इसके 16 पहिए होते हैं , इसका रंग हरा और लाल होता है। रथ पर हनुमान जी की झलक मिलती है।

-देवी सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’ कहा जाता है। यह लगभग 42 फीट ऊंचा होता है ।  इसके  12 पहिए होते हैं , इसका रंग  काला और लाल होता है। इस रथ पर पद्म (कमल) की आकृति बनी होती है।

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