नारी डेस्क: दुनिया भर में हर 8 में से 1 महिला को प्रभावित करने वाली एक हार्मोनल स्थिति को, बेहतर इलाज की उम्मीद में अब एक नया नाम दिया गया है। इसे अब 'पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम' के बजाय 'पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम' कहा जाएगा। शोधकर्ताओं और इस बदलाव के समर्थकों का कहना है कि पुराना नाम, जिसे अक्सर छोटा करके PCOS कहा जाता है सही नहीं है। चलिए जानते हैं कि नाम बदलने से भारत में महिलाओं पर क्या असर पड़ेगा।

इसलिए बदला गया नाम
नाम में यह बदलाव जो विशेषज्ञों और मरीज़ों के बीच 14 साल के आपसी सहयोग के बाद किया गया मंगलवार को 'द लैंसेट' में प्रकाशित हुआ नाम बदलने का यह फैसला एक दशक से ज़्यादा समय तक चली चर्चा के बाद लिया गया है, जिसमें कई देशों के डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और मरीज़ों के हक़ के लिए काम करने वाले ग्रुप्स ने हिस्सा लिया। विशेषज्ञों का तर्क था कि "PCOS" शब्द मेडिकल तौर पर गुमराह करने वाला था, क्योंकि इस बीमारी से पीड़ित कई महिलाओं के अंडाशयों में असल में सिस्ट नहीं होते। इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि पुराना नाम इस सिंड्रोम के मेटाबॉलिज़्म, हार्मोन, मानसिक स्वास्थ्य और दिल की बीमारियों के जोखिम पर पड़ने वाले व्यापक असर को पूरी तरह से नहीं बता पाता था।
नए नाम का मतलब यह है
पॉलीएंडोक्राइन: कई हार्मोन सिस्टम प्रभावित होते हैं
मेटाबॉलिक: यह स्थिति इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा और डायबिटीज़ के खतरे से करीब से जुड़ी है
ओवेरियन: यह अभी भी ओव्यूलेशन, पीरियड्स और फर्टिलिटी पर असर डालता है
सिंड्रोम: यह संबंधित लक्षणों और स्वास्थ्य जोखिमों के एक समूह को दिखाता है
एंडोक्राइन सोसाइटी ने कहा कि नाम बदलने का मकसद बीमारी की पहचान को बेहतर बनाना, इससे जुड़े कलंक को कम करना और इलाज के ज़्यादा समग्र तरीकों को बढ़ावा देना है। विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि पुरानी शब्दावली की वजह से अक्सर बीमारी की पहचान में देरी होती थी, क्योंकि कई महिलाओं को लगता था कि उन्हें PCOS नहीं हो सकता, जब तक कि स्कैन में ओवेरियन सिस्ट न दिखें।
भारत की लाखों महिलाएं इस बीमारी का शिकार
इस ग्रुप में से शामिल एक डॉक्टर ने कहा- " पहली बात तो यह कि ओवरी में कोई सिस्ट नहीं होती, इसलिए यह बहुत भ्रम पैदा करने वाला है। उम्मीद यह थी कि नाम में ज़्यादा व्यापक और सटीक बदलाव से, बेहतर देखभाल को बढ़ावा मिलेगा और उसे मुमकिन बनाया जा सकेगा।" यह बदलाव भारत के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहां PCOS लाखों महिलाओं को प्रभावित करता है और इसका संबंध तेज़ी से मोटापे, मधुमेह, बांझपन और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं से जुड़ता जा रहा है। भारतीय शोधकर्ताओं ने बार-बार चेतावनी दी है कि इस स्थिति का सही निदान नहीं हो पाता है और इसे अक्सर केवल प्रजनन संबंधी समस्या मान लिया जाता है, जबकि यह वास्तव में जीवन भर चलने वाला एक मेटाबॉलिक विकार है।

PMOS के लक्षण क्या हैं?
इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, जिससे डॉक्टरों के लिए इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। यह अनियमित मासिक धर्म चक्र और 'एंड्रोजन' नामक हार्मोन के एक समूह के ज़्यादा उत्पादन से जुड़ा है, जिससे मुहासे हो सकते हैं और बालों की ग्रोथ बढ़ सकती है या वे पतले हो सकते हैं। इसकी वजह से ओवरी पर फॉलिकल्स भी बन सकते हैं, हालांकि ये असामान्य सिस्ट नहीं होते। लेकिन, बीमारी का पता लगाने के लिए इन सभी लक्षणों का होना ज़रूरी नहीं है। किशोरों में इस बीमारी का पता लगाने के लिए, मरीज़ में अनियमित पीरियड्स और हाई एंड्रोजन दोनों के लक्षण होने ज़रूरी हैं। इसमें हार्मोन का ब्लड लेवल ज़्यादा होना, या मुंह पर बहुत ज़्यादा मुहासे और सीने पर बाल उगना जैसे लक्षण शामिल हो सकते हैं।
PMOS का इलाज
इसका सबसे पहला इलाज जीवनशैली में बदलाव करना है, जैसे कि कम प्रोसेस्ड खाना खाना, व्यायाम करना और रात में अच्छी नींद लेना। दूसरे इलाजों में इंसुलिन-सेंसिटाइज़िंग दवाएं (जैसे मेटफ़ॉर्मिन), एंड्रोजन को रोकने वाली दवाएं और हार्मोनल बर्थ कंट्रोल शामिल हैं। डॉक्टर इस इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इस स्थिति का प्रबंधन हर मरीज़ के लिए अलग-अलग होना चाहिए, ताकि उसके खास लक्षणों और चिंताओं को दूर किया जा सके। उदाहरण के लिए, जो लोग गर्भवती होने की योजना बना रहे हैं, वे शायद फर्टिलिटी (प्रजनन क्षमता) से जुड़े इलाजों पर ज़्यादा ध्यान देना चाहें, जबकि दूसरे लोग शायद हार्मोनल बर्थ कंट्रोल जैसे विकल्पों में ज़्यादा दिलचस्पी रखें।