नारी डेस्क: मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव में जन्मीं सविता प्रधान का बचपन गरीबी और अभावों में बीता। आदिवासी परिवार से आने वाली सविता ने बहुत कम उम्र में ही जिंदगी की सच्चाइयों को करीब से देख लिया था। गांव में लड़कियों की पढ़ाई आम बात नहीं थी, फिर भी सविता का पढ़ाई के प्रति जुनून अलग ही था। वह अपने गांव की पहली लड़की बनीं, जिसने 10वीं की परीक्षा पास की। उस दिन उनके परिवार के लिए गर्व का पल था, लेकिन आगे का रास्ता आसान नहीं था।
16 साल की उम्र में शादी, सपनों पर लगा ब्रेक
सिर्फ 16-17 साल की उम्र में सविता की शादी कर दी गई। परिवार को लगा कि उन्हें एक अच्छे घर का रिश्ता मिला है, जहां उनकी पढ़ाई भी जारी रहेगी। लेकिन शादी के बाद सच्चाई कुछ और ही निकली। ससुराल पहुंचते ही उनके साथ नौकरों जैसा व्यवहार शुरू हो गया। उनकी इच्छाओं और सपनों की कोई अहमियत नहीं रह गई।
ससुराल में अत्याचार और अपमान की जिंदगी
शादी के कुछ ही दिनों बाद सविता की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। दिनभर उनसे मजदूरों की तरह काम करवाया जाता, लेकिन खाने तक के लिए तरसना पड़ता था। उन्हें परिवार के साथ बैठकर खाने की इजाजत नहीं थी। कई बार भूख इतनी बढ़ जाती कि वह रोटियां छुपाकर बाथरूम में जाकर खाती थीं। छोटी-छोटी बातों पर मारपीट, गाली-गलौज और अपमान उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया था। जब सविता ने अपनी तकलीफ अपने मायके वालों को बताई, तो उन्हें यही समझाया गया कि बच्चा होने के बाद सब ठीक हो जाएगा। उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी, लेकिन हालात और खराब होते गए। दो बच्चों के जन्म के बाद भी न पति का व्यवहार बदला, न ससुराल का माहौल।
एक फैसला जिसने जिंदगी बदल दी
लगातार अत्याचार और अकेलेपन ने सविता को अंदर से तोड़ दिया था। एक समय ऐसा आया जब उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला कर लिया। लेकिन आखिरी पल में उनके मन में एक सवाल आया “मैं दूसरों के लिए अपनी जान क्यों दूं?” यही सवाल उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बना। उसी पल उन्होंने तय कर लिया कि अब वह अपने लिए जिएंगी।
बच्चों के साथ छोड़ा घर, शुरू किया नया संघर्ष
सविता ने अपने दोनों बच्चों के साथ ससुराल छोड़ दिया। उनके पास न कोई सहारा था, न आर्थिक मजबूती। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने पार्लर में काम किया, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और धीरे-धीरे अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की। यह दौर बेहद मुश्किल था, लेकिन उनके इरादे अब मजबूत हो चुके थे। सविता ने इंदौर यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स किया। उन्होंने बिना किसी कोचिंग के तैयारी की और मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की परीक्षा पास कर ली। इसके बाद उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा भी पहले ही प्रयास में क्लियर कर ली। यह उनके संघर्ष और मेहनत का नतीजा था।
अफसर बनने के बाद भी खत्म नहीं हुई चुनौती
सिविल सर्विस में आने के बाद सविता की पहली पोस्टिंग चीफ म्यूनिसिपल ऑफिसर के रूप में हुई। धीरे-धीरे वह एक सख्त और ईमानदार अधिकारी के रूप में पहचान बनाने लगीं। लेकिन इसी दौरान उनका पति फिर से उनकी जिंदगी में आया और दोबारा हिंसा करने लगा। पहले सविता ने यह सब सहन किया, लेकिन फिर उन्होंने अपने सीनियर्स से बात की। उनकी मदद से जब पति ने दोबारा हाथ उठाया, तो तुरंत पुलिस कार्रवाई हुई। इस बार सविता ने चुप रहने के बजाय अपने लिए आवाज उठाई। बाद में उन्होंने अपने पति से तलाक ले लिया।

आज एक मजबूत पहचान, दूसरों के लिए मिसाल
आज सविता प्रधान मध्य प्रदेश की जानी-मानी और तेज-तर्रार आईएएस अधिकारी हैं। वह ग्वालियर संभाग में जॉइंट डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। इससे पहले वह खंडवा नगर निगम की पहली महिला कमिश्नर भी रह चुकी हैं। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने माफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की और अपनी अलग पहचान बनाई। सविता की कहानी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की नहीं है, बल्कि अपने हक के लिए खड़े होने की कहानी है। उन्होंने साबित किया कि हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर इंसान खुद पर भरोसा करे तो वह अपनी जिंदगी बदल सकता है।