
नारी डेस्क: मशहूर कॉमेडियन भारती सिंह ने हाल ही में नेहा धूपिया और अंगद बेदी द्वारा होस्ट किए जाने वाले शो 'डबल डेट' में अपनी बॉडी शेमिंग से जुड़े अनुभवों के बारे में खुलकर बात की। एक ईमानदार और भावुक बातचीत में, भारती ने बताया कि जिस माहौल में वह पली-बढ़ीं, वहां बॉडी शेमिंग को कितनी आम बात माना जाता था। उन्होंने बताया कि कि बड़े होते समय उनकी अपनी मां भी अक्सर उनसे मज़ाक में कह देती थीं, "बस कर, कितना खाएगी? मोटी हो जाएगी।"

अपने बचपन की यादें साझा करते हुए भारती ने बताया कि उनके गृहनगर में लोग किसी ऐसे व्यक्ति को खुलेआम "मोटा" कह देते थे जिसका वज़न ज़्यादा होता था, और "काला" कह देते थे जिसका रंग सांवला होता था। ऐसा करते समय वे इस बात का ज़रा भी ध्यान नहीं रखते थे कि उनके इन शब्दों का दूसरे व्यक्ति पर क्या भावनात्मक असर पड़ेगा। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक उन्हें यह एहसास ही नहीं हुआ कि ऐसी टिप्पणियां किसी व्यक्ति के आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान को कितनी गहराई तक प्रभावित कर सकती हैं। जब उन्होंने मनोरंजन जगत में कदम रखा, तो उन्होंने देखा कि अक्सर लोगों के शारीरिक बनावट (body image) से जुड़े मज़ाक का इस्तेमाल हंसी-मज़ाक के लिए किया जाता था।

समय बीतने और समझदारी आने के साथ, उन्होंने सोच-समझकर यह फ़ैसला किया कि वह दूसरों का मज़ाक उड़ाने के लिए कभी भी ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करेंगी। भारती ने बताया कि इस एहसास ने उनके नज़रिए को पूरी तरह से बदल दिया। किसी और की शारीरिक बनावट का मज़ाक उड़ाने के बजाय उन्होंने अपने ही ऊपर मज़ाक करना शुरू कर दिया और इस बात का पूरा ध्यान रखा कि उनकी कॉमेडी से किसी दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को ठेस न पहुंचे। दिलचस्प बात यह है कि इस चर्चा के दौरान शो की होस्ट नेहा धूपिया ने भी कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किए।

भारती और नेहा, जो दोनों ही दो-दो बच्चों की मां हैं, ने बातचीत को आगे बढ़ाते हुए इस बात पर चर्चा की कि मां बनने के बाद शारीरिक बनावट, खुद से प्यार करने (self-love), और आने वाली पीढ़ी के लिए एक बेहतर माहौल बनाने के महत्व को लेकर उनका नज़रिया किस तरह और भी ज़्यादा बदल गया। उनकी इस बातचीत से यह बात साफ़ तौर पर उभरकर सामने आई कि हमारे रोज़मर्रा के जीवन और संस्कृति में बॉडी शेमिंग कितनी गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुकी है, और अक्सर यह मज़ाक या आम टिप्पणियों के रूप में छिपी रहती है। साथ ही, यह बातचीत हमें इस बात की भी याद दिलाती है कि जागरूकता, सहानुभूति और सोच-समझकर इस्तेमाल की गई भाषा से हम समाज में एक बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।