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मरीजों को प्राइवेट लैब में भेजने के बदले Commission लेते हैं डॉक्टर... राघव चड्ढा ने उठाया ये बड़ा ही खास मुद्दा

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 06 Aug, 2026 05:41 PM
मरीजों को प्राइवेट लैब में भेजने के बदले Commission लेते हैं डॉक्टर... राघव चड्ढा ने उठाया ये बड़ा ही खास मुद्दा

नारी डेस्क:  बीजेपी सांसद राघव चड्ढा ने गुरुवार को कुछ डॉक्टरों और डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच कथित "रेफरल कमीशन" और "कट मनी" के लेन-देन का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह चलन एक "पैरेलल इंसेंटिव इकॉनमी" (समानांतर प्रोत्साहन अर्थव्यवस्था) बन गया है, जिससे मरीज़ों के मेडिकल बिल बढ़ जाते हैं और बेवजह डायग्नोस्टिक टेस्ट को बढ़ावा मिलता है। राज्यसभा में चर्चा के दौरान बोलते हुए, चड्ढा ने आरोप लगाया कि यह चलन, भले ही "अनौपचारिक" हो, हेल्थकेयर सेक्टर के कुछ हिस्सों में एक पक्की व्यवस्था बन गया है।
 

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 राघव ने की कट मनी अरेंजमेंट की बात

 राघव ने कहा- "मैं कुछ डॉक्टरों और कुछ डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच चल रहे 'रेफरल इंसेंटिव' और 'कट मनी अरेंजमेंट' की बात कर रहा हूं, जो अब एक अनौपचारिक व्यवस्था बन गई है। आपका इलाज करने के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ़ आपको रेफर करने के लिए डॉक्टर की जेब में 3,000 रुपये डाले जाते हैं। इसके लिए कमीशन की एक तय दर और खास एजेंट होते हैं, यह एक पैरेलल इंसेंटिव इकॉनमी है।" बीजेपी नेता ने आरोप लगाया कि डॉक्टर और डायग्नोस्टिक सेंटर अपने रिकॉर्ड में इन पेमेंट को अलग-अलग तरह से दिखाते हैं, जबकि इसका आर्थिक बोझ आखिरकार मरीज़ों को उठाना पड़ता है।


मरीजों पर पड़ता है बोझ

 राघव ने कहा, "आसान भाषा में कहें तो, डॉक्टरों के लिए इसे 'रेफरल कमीशन' कहा जाता है और डायग्नोस्टिक सेंटरों के अकाउंट में इसे 'मार्केटिंग खर्च' के तौर पर दर्ज किया जाता है। यह कमीशन आमतौर पर प्रोसीजर की लागत के प्रतिशत के तौर पर लिया जाता है, और कुछ मामलों में तो डायग्नोस्टिक सेंटर डॉक्टरों को विदेश यात्रा पर भी भेजते हैं।" चड्ढा ने बताया कि मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया के कोड ऑफ़ एथिक्स के रेगुलेशन 6.4 में 2002 में ही इस चलन को "फीस बांटने" (fee splitting) के तौर पर बैन कर दिया गया था। उन्होंने कहा, "इस खर्च का बोझ - यानी 'कट मनी' का बोझ - डायग्नोस्टिक सेंटर नहीं उठाता; यह मरीज के इनवॉइस या बिल में पहले से ही जुड़ा होता है। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल एथिक्स के अनुसार, इससे कभी-कभी मरीज का मेडिकल या इलाज का बिल 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।"
 

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राघव चड्ढा ने मरीजों को किया सतर्क

उन्होंने सदन को बताया- "असली मुद्दा यह है कि इससे अनावश्यक मेडिकल टेस्ट और ज़रूरत से ज़्यादा रेफरल (मरीजों को दूसरी जगह भेजना) का चलन बढ़ता है।" उन्होंने कहा, "यह मांग डॉक्टरों के खिलाफ नहीं है; यह केवल 'कट मनी' रेफरल सिस्टम के खिलाफ है। हम अपने देश के डॉक्टरों को भगवान का दूसरा रूप मानते हैं।" उन्होंने आगे कहा कि ज़्यादातर डॉक्टर पूरी ईमानदारी, समर्पण और निष्ठा के साथ मरीजों की सेवा करते हैं, लेकिन कुछ लोग "इस रेफरल सिस्टम में फंस गए हैं।"  उन्होंने कहा, "मैं कहना चाहूंगा कि मरीजों को खास तौर पर 'रेड फ्लैग' पर ध्यान देना चाहिए। जब ​​कोई डॉक्टर आपको किसी खास डायग्नोस्टिक सेंटर पर जाने के लिए दबाव डाले, तो ध्यान दें। अगर वे इसलिए चिढ़ जाते हैं या नाराज़ होते हैं कि आपने उतनी ही मान्यता वाली किसी दूसरी सुविधा या पैथोलॉजी लैब में टेस्ट करवाया है, तो इसे रेड फ्लैग मानें। अगर आपको डॉक्टर के क्लिनिक में किसी डायग्नोस्टिक सेंटर के मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव या प्रचार सामग्री दिखे, तो उस पर भी पूरा ध्यान दें।"उन्होंने आग्रह किया कि हेल्थकेयर में ज़्यादा पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ऐसी प्रथाओं पर रोक लगाई जानी चाहिए। सिस्टम और मरीज़ों को अनावश्यक वित्तीय और चिकित्सीय बोझ से बचाने के लिए
 

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