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“पत्नी-बच्चों का खर्च नहीं उठा सकते तो शादी का फैसला क्यों?”, हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 21 Apr, 2026 11:50 AM
“पत्नी-बच्चों का खर्च नहीं उठा सकते तो शादी का फैसला क्यों?”, हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

नारी डेस्क: परिवार में पिता की भूमिका केवल आर्थिक जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह पूरे परिवार की स्थिरता और सुरक्षा का आधार मानी जाती है। ऐसे में अगर शादी के बाद कोई पति अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटता है तो यह न सिर्फ रिश्तों पर असर डालता है बल्कि सामाजिक और कानूनी सवाल भी खड़े करता है। इसी तरह के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने एक पति ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। उसका तर्क था कि उसकी आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि वह भरण-पोषण भत्ता दे सके। अब इस मामले ने जिम्मेदारी, अधिकार और कानून के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। ऐसे में आइए जानते हैं क्या यह पूरा मामला। 

पति की याचिका खारिज, फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार

यह मामला उस समय सामने आया जब एक पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए भरण-पोषण के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। फैमिली कोर्ट ने उसे अपनी पत्नी और बच्चों के लिए हर महीने 4 हजार रुपये देने का निर्देश दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट की खंडपीठ न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन ने पति की याचिका को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया।

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आर्थिक तंगी का हवाला, लेकिन कोर्ट नहीं हुआ सहमत

याचिका में पति ने खुद को एक श्रमिक बताते हुए कहा कि उसकी आय इतनी नहीं है कि वह हर महीने 4 हजार रुपये दे सके। उसने अपनी पत्नी पर अवैध संबंध के आरोप भी लगाए और हलफनामा पेश किया। लेकिन अदालत ने इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना और स्पष्ट किया कि जिम्मेदारी से बचने के लिए ऐसे तर्क स्वीकार नहीं किए जा सकते।

पत्नी से धोखे से करवाए गए हस्ताक्षर पर भी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पत्नी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है और पति ने कथित तौर पर धोखे से उसके हस्ताक्षर हलफनामे पर करवा लिए थे। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इस तरह के तरीकों से सच्चाई को नहीं बदला जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि मौजूदा महंगाई के दौर में 4 हजार रुपये की राशि किसी भी लिहाज से ज्यादा नहीं मानी जा सकती।

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पत्नी की दलील: आय का कोई साधन नहीं

पत्नी की ओर से कहा गया कि उसके पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है और वह बच्चों के पालन-पोषण की पूरी जिम्मेदारी अकेले उठा रही है। पति ने भले ही यह दावा किया कि दोनों के बीच आपसी सहमति से अलगाव हो चुका है और पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ रह रही है, लेकिन अदालत ने इन दावों को पर्याप्त सबूतों के अभाव में स्वीकार नहीं किया।

Ought Not To Get Married If You Can't Maintain Wife, Children: #AllahabadHC Rejects Husband's Plea Citing Poor Finances | @ISparshUpadhyay https://t.co/Aivne7MXlX

— Live Law (@LiveLawIndia) April 20, 2026

 

शादी के बाद जिम्मेदारी से पीछे हटना मंजूर नहीं

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने साफ कहा कि शादी केवल एक सामाजिक रिश्ता नहीं, बल्कि कानूनी जिम्मेदारी भी है। एक बार शादी करने के बाद पति अपनी पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण के लिए बाध्य होता है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अगर किसी को लगता है कि वह भविष्य में इन जिम्मेदारियों को निभा नहीं पाएगा, तो उसे शादी जैसे फैसले से बचना चाहिए।

यह फैसला सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के लिए भी एक अहम संदेश देता है। यह बताता है कि शादी के बाद जिम्मेदारियों से भागना आसान नहीं है और कानून ऐसे मामलों में सख्ती से हस्तक्षेप करता है, ताकि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो सके।  

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