
नारी डेस्क: उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में यमुना तट पर बसी ऐतिहासिक नगरी कालपी अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के लिए विख्यात है। महर्षि वेदव्यास, भगवान श्रीकृष्ण और अनेक ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी यह नगरी भगवान शिव के नौ दिव्य स्वरूपों ‘नवेश्वर महादेव' के कारण भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि इन नौ शिवालयों के श्रद्धापूर्वक दर्शन और पूजन से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा उन्हें पुण्य और आध्यात्मिक कल्याण की प्राप्ति होती है।
भगवान भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है नौ अंक
शास्त्रों में वर्णित है कि जो श्रद्धालु प्रात:काल भगवान शंकर का स्मरण करता है, उसके समस्त भय, कष्ट और बाधाएं दूर हो जाती हैं। शिव संसार रूपी रोग के नाशक हैं और इसी कारण कालपी में उनके विभिन्न स्वरूपों की आराधना की परंपरा सदियों से चली आ रही है। भगवान भोलेनाथ को नौ अंक अत्यंत प्रिय माना जाता है। अंकशास्त्र में नौ पूर्णता, सिद्धि और नवशक्ति का प्रतीक है। इसी आध्यात्मिक अवधारणा के आधार पर कालपी में भगवान शिव के नौ प्रमुख स्वरूपों को 'नवेश्वर' के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। महाभारत के अनुशासन पर्व, स्कंद पुराण, पद्मपुराण और ब्रह्माण्ड पुराण में भगवान शिव को समस्त कामनाओं के अधीश्वर तथा शिवलिंग को सृष्टि के मूल स्वरूप के रूप में वर्णित किया गया है। इन ग्रंथों के अनुसार श्रद्धा से शिव आराधना करने वाला व्यक्ति ऐश्वर्य, ज्ञान और मोक्ष का अधिकारी बनता है। नवेश्वरों में सबसे प्राचीन और पूजनीय पातालेश्वर महादेव का मंदिर कालपी किले के पश्चिमी भाग में यमुना के दक्षिणी तट पर स्थित है।
इस तरह पड़ा इस मंदिर का नाम
मान्यता है कि यह मंदिर पांच हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। द्वापर युग में यहां प्रतिष्ठित शिवलिंग मणिकेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध था। ब्रह्माण्ड पुराण के कालपी महात्म्य में उल्लेख है कि इनके दर्शन मात्र से महापाप नष्ट हो जाते हैं और साधकों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। लगभग सौ वर्ष पूर्व स्थापित लुढ़केश्वर महादेव अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध हैं। मान्यता है कि जो श्रद्धालु विशेष मनोकामना लेकर अपने घर से मंदिर तक लुढ़कते हुए पहुंचता है, उसकी इच्छा अवश्य पूरी होती है। इसी परंपरा के कारण इस मंदिर का नाम लुढ़केश्वर पड़ा। प्राचीन काल में यहां घना वन था, जहां काल्पदेव ने अग्नि से रक्षा के लिए भगवान शिव की आराधना की थी। इसी कारण इस स्थान का नाम वन के ईश्वर-बानेश्वर पड़ा। यहां शिव और विष्णु की अभिन्नता का संदेश भी दिया जाता है।
श्रद्धालुओं पर विशेष कृपा करते हैं भगवान शिव
स्थानीय मान्यता है कि संसार की तिकड़म, मोह-माया और मानसिक उलझनों से मुक्ति की कामना लेकर आने वाले श्रद्धालुओं की भगवान शिव विशेष कृपा करते हैं। रावगंज स्थित गोपेश्वर महादेव के संबंध में मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त करने के लिए गोपियों ने यहां भगवान शिव की आराधना की थी। प्रारंभ में यहां मिट्टी का शिवलिंग था, जिसे बाद में पत्थर के शिवलिंग से प्रतिस्थापित किया गया। यह मंदिर शिव और कृष्ण भक्ति के अछ्वुत समन्वय का प्रतीक माना जाता है। ब्रह्माण्ड पुराण के कालपी महात्म्य में वर्णित है कि इन नौ शिवालयों के दर्शन एवं पूजन से भक्तों को कार्यसिद्धि, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक कल्याण की प्राप्ति होती है। यमुना तट पर स्थित यह प्राचीन धार्मिक धरोहर आज भी हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। सावन, महाशिवरात्रि और अन्य प्रमुख पर्वों पर यहां दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं और नवेश्वर महादेव के दर्शन कर सुख, शांति, समृद्धि एवं शिव कृपा की कामना करते हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक द्दष्टि से कालपी के नवेश्वर महादेव बुंदेलखंड ही नहीं, बल्कि संपूर्ण उत्तर भारत की शिवभक्ति परंपरा की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं।