नारी डेस्क: आज चंडीगढ़ का रॉक गार्डन देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे अनोखे पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। हर साल लाखों पर्यटक इसकी खूबसूरती और अनोखी कलाकृतियों को देखने आते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस अद्भुत जगह की शुरुआत किसी बड़े कलाकार या सरकारी परियोजना ने नहीं, बल्कि लोक निर्माण विभाग (PWD) में सड़क निरीक्षक के रूप में काम करने वाले नेक चंद ने अकेले अपने जुनून और कल्पनाशक्ति के दम पर की थी। बेकार और फेंकी हुई चीजों को कला का रूप देकर उन्होंने एक ऐसी दुनिया बसाई, जो आज भारत की रचनात्मकता का प्रतीक बन चुकी है।
1957 में चुपचाप रखी थी रॉक गार्डन की नींव
साल 1957 में नेक चंद ने चंडीगढ़ के एक सुनसान इलाके में गुप्त रूप से रॉक गार्डन का निर्माण शुरू किया। दिनभर सरकारी नौकरी करने के बाद वह रात के समय इस जगह पर काम करते थे। उस समय किसी को भी उनके इस अनोखे प्रोजेक्ट की जानकारी नहीं थी। उन्होंने करीब दो दशक तक बिना किसी सरकारी अनुमति या प्रचार के इस स्थान को अपनी मेहनत और कल्पना से आकार दिया।
बेकार सामान से गढ़ी कला की अनोखी दुनिया
रॉक गार्डन की सबसे खास बात यह है कि इसकी लगभग हर कलाकृति बेकार और फेंकी हुई वस्तुओं से बनाई गई है। नेक चंद निर्माण स्थलों से बचा हुआ मलबा, टूटी हुई चूड़ियां, सिरेमिक के बर्तन, कांच की बोतलें, पुरानी टाइल्स, बिजली के कबाड़ और अन्य अनुपयोगी सामान अपनी साइकिल पर लादकर लाते थे। इन्हीं चीजों को उन्होंने अलग-अलग आकृतियों, मूर्तियों और सजावटी संरचनाओं का रूप दिया। उनकी कल्पनाशक्ति ने कचरे को कला के ऐसे नमूने में बदल दिया, जिसकी आज पूरी दुनिया सराहना करती है।

करीब 18 साल तक छिपा रहा यह अनोखा निर्माण
नेक चंद का यह काम लगभग 18 वर्षों तक लोगों और प्रशासन की नजरों से दूर रहा। उन्होंने पूरे समर्पण के साथ धीरे-धीरे इस जगह को विकसित किया। साल 1975-76 के दौरान जब प्रशासन को इस निर्माण की जानकारी मिली, तो शुरुआत में इसे अवैध निर्माण माना गया। लेकिन जब अधिकारियों ने इसकी भव्यता, कलात्मकता और अनोखे स्वरूप को देखा, तो वे भी प्रभावित हुए। रॉक गार्डन को हटाने की चर्चा के बीच लोगों ने इसका खुलकर समर्थन किया। जनता और कला प्रेमियों की सकारात्मक प्रतिक्रिया को देखते हुए सरकार ने इसे संरक्षित करने का फैसला किया। इसके बाद नेक चंद को इस परियोजना का आधिकारिक जिम्मा सौंपा गया। उन्हें वेतन, कर्मचारी और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए गए ताकि वे अपने इस अनोखे सपने को और आगे बढ़ा सकें।
1976 में आम लोगों के लिए खोला गया रॉक गार्डन
सरकारी मान्यता मिलने के बाद 1976 में रॉक गार्डन को पहली बार आम जनता के लिए खोल दिया गया। इसके बाद इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई और यह चंडीगढ़ की सबसे पहचान वाली जगहों में शामिल हो गया। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक यहां की अनोखी मूर्तियां, झरने, गलियारे, खुले प्रांगण और रचनात्मक डिजाइन देखने के लिए पहुंचने लगे।

आज 40 एकड़ में फैली है कला की यह दुनिया
समय के साथ रॉक गार्डन का विस्तार होता गया और आज यह लगभग 40 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। यहां हजारों कलाकृतियां, मानव और पशु आकृतियां, झरने, संकरे रास्ते और खुले एम्फीथिएटर जैसे कई आकर्षण मौजूद हैं। यह सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि यह इस बात का शानदार उदाहरण भी है कि रचनात्मक सोच और दृढ़ संकल्प के बल पर बेकार समझी जाने वाली चीजों से भी विश्वस्तरीय धरोहर तैयार की जा सकती है।
नेक चंद की विरासत आज भी देती है प्रेरणा
नेक चंद ने यह साबित कर दिया कि कला केवल महंगे संसाधनों से नहीं, बल्कि कल्पनाशक्ति, मेहनत और समर्पण से भी जन्म लेती है। उनका बनाया रॉक गार्डन आज पर्यावरण संरक्षण, पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) और रचनात्मक सोच का प्रेरणादायक प्रतीक बन चुका है। उनकी यह अनोखी विरासत न सिर्फ भारत की सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध करती है, बल्कि दुनिया भर के कलाकारों और पर्यावरण प्रेमियों को भी यह संदेश देती है कि हर बेकार चीज में एक नई शुरुआत की संभावना छिपी होती है।
