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काला पीलिया क्यों होता है, जानें इसके कारण और लक्षण

  • Edited By Monika,
  • Updated: 17 Oct, 2026 12:56 PM
काला पीलिया क्यों होता है, जानें इसके कारण और लक्षण

नारी डेस्क : लिवर हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है। यह भोजन को पचाने, पोषक तत्वों को संसाधित करने और शरीर से हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाता है। जब लिवर में किसी तरह की समस्या होती है, तो इसका असर शरीर पर दिखाई देने लगता है। त्वचा और आंखों का पीला पड़ना, पेशाब का रंग गहरा होना और लगातार थकान महसूस होना लिवर से जुड़ी बीमारी के संकेत हो सकते हैं। आम बोलचाल में कुछ लोग गंभीर पीलिया या लिवर की बीमारी को ‘काला पीलिया’ कहते हैं। लेकिन आखिर यह क्या है, इसके कारण क्या हैं और इससे बचाव कैसे किया जा सकता है? आइए विस्तार से जानते हैं।

क्या होता है काला पीलिया?

‘काला पीलिया’ कोई स्पष्ट चिकित्सकीय बीमारी का नाम नहीं है। आमतौर पर पीलिया तब होता है, जब शरीर में बिलीरुबिन नामक पदार्थ का स्तर बढ़ जाता है। इसकी वजह से त्वचा और आंखों के सफेद हिस्से में पीलापन दिखाई देने लगता है। इसके साथ पेशाब का रंग गहरा और मल का रंग हल्का भी हो सकता है। हेपेटाइटिस बी और सी ऐसे वायरल संक्रमण हैं, जो लिवर को प्रभावित कर सकते हैं। यदि संक्रमण लंबे समय तक बना रहे, तो कुछ लोगों में लिवर पर गंभीर असर पड़ सकता है। इससे लिवर में घाव, सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, हर मरीज में ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है। 

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काला पीलिया होने के संभावित कारण

हेपेटाइटिस बी का संक्रमण: हेपेटाइटिस बी वायरस लिवर में सूजन पैदा कर सकता है। यह संक्रमित व्यक्ति के खून और कुछ शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क में आने से फैल सकता है। संक्रमित मां से बच्चे में भी इसका संक्रमण हो सकता है। इससे बचाव के लिए टीका उपलब्ध है। 

पेटाइटिस सी का संक्रमण: हेपेटाइटिस सी मुख्य रूप से संक्रमित खून के संपर्क में आने से फैलता है। दूषित सुई या सिरिंज का इस्तेमाल, ठीक से साफ न किए गए उपकरण और बिना उचित जांच के संक्रमित खून चढ़ाना इसके संक्रमण के प्रमुख कारण हो सकते हैं। समय पर जांच और उपचार से लिवर को होने वाले नुकसान का जोखिम कम किया जा सकता है।

शराब का अधिक सेवन: लंबे समय तक अधिक मात्रा में शराब पीने से लिवर को नुकसान पहुंच सकता है। इससे लिवर में सूजन, फैटी लिवर और गंभीर मामलों में सिरोसिस जैसी समस्याएं हो सकती हैं। 

पित्त की नली में रुकावट: पित्त की नली में पथरी या दूसरी समस्याओं के कारण रुकावट आने पर भी बिलीरुबिन का स्तर बढ़ सकता है और पीलिया हो सकता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर से जांच करवाना जरूरी है। 

कुछ दवाओं का दुष्प्रभाव: कुछ दवाएं लिवर को नुकसान पहुंचा सकती हैं, खासकर जब उनका गलत तरीके से या जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया जाए। इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना दवाओं की खुराक न बढ़ाएं और न ही बिना परामर्श के कोई दवा लंबे समय तक लें।

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काला पीलिया के लक्षण क्या हैं?

लिवर से जुड़ी बीमारी के लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। कई बार हेपेटाइटिस बी और सी का संक्रमण लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के भी रह सकता है।
संभावित लक्षणों में शामिल हैं
आंखों और त्वचा में पीलापन: यह पीलिया का प्रमुख संकेत है।
पेशाब का रंग गहरा होना: पेशाब सामान्य से अधिक गहरा दिखाई दे सकता है।
लगातार थकान और कमजोरी: पर्याप्त आराम के बाद भी थकान महसूस हो सकती है।
भूख कम लगना: खाने की इच्छा कम हो सकती है।
जी मिचलाना या उल्टी: कुछ लोगों को मतली और उल्टी की शिकायत हो सकती है।
पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द: खासकर दाईं ओर पसलियों के नीचे असहजता हो सकती है।
त्वचा में खुजली: बिलीरुबिन या पित्त से जुड़ी समस्याओं के कारण खुजली हो सकती है।
जोड़ों में दर्द या बुखार: कुछ वायरल संक्रमणों में ये लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।
मल का रंग हल्का होना: पित्त के प्रवाह में रुकावट होने पर मल का रंग सामान्य से हल्का हो सकता है।
ध्यान रखें कि त्वचा का काला पड़ना, नाखूनों का पीला होना या दस्त होना अपने आप में ‘काला पीलिया’ की पुष्टि नहीं करते। सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

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काला पीलिया से बचाव कैसे करें?

हेपेटाइटिस बी का टीका लगवाएं: हेपेटाइटिस बी से बचाव के लिए सुरक्षित और प्रभावी टीका उपलब्ध है। अपनी टीकाकरण स्थिति के बारे में डॉक्टर से सलाह लें। फिलहाल हेपेटाइटिस सी से बचाव के लिए कोई प्रभावी टीका उपलब्ध नहीं है। 

साफ और सुरक्षित उपकरणों का इस्तेमाल करें: इंजेक्शन, टैटू, पियर्सिंग और अन्य प्रक्रियाओं में नई या उचित तरीके से स्टरलाइज की गई सुई और उपकरणों का इस्तेमाल होना चाहिए। रेजर या सुई जैसी चीजें दूसरों के साथ साझा न करें।

खून चढ़ाने से पहले जांच सुनिश्चित करें: खून चढ़ाने की जरूरत पड़ने पर अधिकृत स्वास्थ्य केंद्र में जांच किए गए सुरक्षित रक्त का ही इस्तेमाल होना चाहिए।

शराब से दूरी बनाएं: शराब लिवर को नुकसान पहुंचा सकती है। लिवर की बीमारी होने पर शराब से पूरी तरह दूर रहने की सलाह दी जाती है। किसी भी दवा या सप्लीमेंट का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर से परामर्श लें।

सुरक्षित यौन संबंध अपनाएं: हेपेटाइटिस बी यौन संपर्क से फैल सकता है। कंडोम का सही इस्तेमाल और टीकाकरण संक्रमण के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं।

लक्षण दिखने पर जांच करवाएं: आंखों या त्वचा में पीलापन, गहरे रंग का पेशाब या लगातार कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से जल्द संपर्क करें। केवल घरेलू नुस्खों के भरोसे इलाज न करें।

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काला पीलिया का इलाज कैसे होता है?

इलाज बीमारी के वास्तविक कारण पर निर्भर करता है। डॉक्टर खून की जांच, लिवर फंक्शन टेस्ट और जरूरत पड़ने पर अन्य जांचों की मदद से समस्या का पता लगा सकते हैं। हेपेटाइटिस बी के कुछ मामलों में निगरानी और कुछ में एंटीवायरल दवाओं की जरूरत होती है। वहीं, हेपेटाइटिस सी का इलाज आधुनिक एंटीवायरल दवाओं से किया जा सकता है और अधिकतर मरीजों में संक्रमण ठीक हो सकता है। यदि पीलिया पित्त की नली में रुकावट या किसी दूसरी बीमारी के कारण हुआ है, तो उसी के अनुसार उपचार किया जाता है।

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नोट : यदि पीलिया के साथ भ्रम, अत्यधिक नींद, खून की उल्टी, पेट में तेज दर्द या लगातार उल्टियां हो रही हों, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लें।

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