नारी डेस्क: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए साल 2026 काफी महंगा साबित हुआ है। मार्च से लेकर अब तक, यूट्यूब और मेटा (इंस्टाग्राम और फेसबुक की पैरेंट कंपनी) को कई मुकदमों में 17 अरब अमेरिकी डॉलर से ज्यादा की रकम चुकानी पड़ी है या समझौता करना पड़ा है। इन पर आरोप है कि इन्होंने लापरवाही बरती, अपने प्लेटफॉर्म्स को जानबूझकर इस तरह डिजाइन किया कि बच्चे इनकी लत लगा बैठें, और सुरक्षा तथा प्राइवेसी के मामले में जनता को गुमराह किया। अगर इन मुकदमों से यह संकेत मिलता है कि सरकारें और आम जनता सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को किस नजरिए से देख रही हैं, तो आने वाले समय में ऐसे और भी मामले सामने आ सकते हैं।

बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन
इन मुकदमों के अलावा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अपने कारोबार में भी नुकसान उठाना पड़ रहा है, क्योंकि दुनिया भर में नाबालिगों के लिए प्रतिबंध लगाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। ऑस्ट्रेलिया उन शुरुआती देशों में से एक है, जिसने दिसंबर 2025 से सोशल मीडिया पर 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध लागू किया है। 20 से ज्यादा ऐसे देश हैं जो इन प्लेटफॉर्म्स पर नाबालिगों के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने पर विचार कर रहे हैं या ऐसा कर चुके हैं। अलग-अलग देश अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगाने की सोच रहे हैं, लेकिन इनमें मुख्य रूप से स्नैपचैट, यूट्यूब, टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक और 'एक्स' (X) शामिल हैं। सवाल यह है कि क्या ये प्रतिबंध उन मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान हैं, जिनका सामना आज के युवा कर रहे हैं?
मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं
जोनाथन हैड्ट की 2024 में आई किताब "द एंग्जियस जनरेशन" (The Anxious Generation) के बाद से, सोशल मीडिया की आलोचना करने वालों ने युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर काफी ध्यान देना शुरू कर दिया है। हैड्ट का तर्क है कि सोशल मीडिया बच्चों के सामाजिक और न्यूरोलॉजिकल (दिमागी) विकास में बाधा डालता है। इससे नींद की कमी, ध्यान भटकना, लत लगना, अकेलापन, दूसरों से तुलना करना और हर चीज़ में पूर्णता (परफेक्शन) की चाह जैसी समस्याएं पैदा होती हैं, जो आगे चलकर एंग्जायटी (चिंता) और डिप्रेशन (अवसाद) को बढ़ाती हैं। 2026 के एक अध्ययन में पाया गया कि आज के 14 से 20 साल के युवाओं में मानसिक बीमारी होने की संभावना, 50 साल पहले के इसी उम्र के युवाओं की तुलना में 100 प्रतिशत से भी अधिक है।
युवाओं में दिख रहे एंग्जायटी के गंभीर लक्षण
सोशल मीडिया और स्क्रीन टाइम का बढ़ता इस्तेमाल, बच्चों और किशोरों के लिए पहले से ही मुश्किल चल रहे इस दौर को और भी कठिन बना रहा है। 2021 के एक अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में 20.5 प्रतिशत युवाओं में एंग्जायटी के गंभीर लक्षण देखे गए, जबकि 25.2 प्रतिशत युवाओं ने डिप्रेशन के गंभीर लक्षणों की बात कही। इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की बेहतर पहचान और उनके प्रति बढ़ती जागरूकता, साथ ही COVID-19 महामारी के कारण समाज में आए बड़े बदलाव। जब दुनिया भर के लोग अपने घरों में सिमट गए और काम, पढ़ाई या सामाजिक मेलजोल के लिए पूरी तरह से ऑनलाइन हो गए, तो लोगों के बीच अलगाव और अकेलापन काफी बढ़ गया।

सब कुछ बुरा नहीं है
इन चिंताओं को देखते हुए, कुछ शोधकर्ताओं का तर्क है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाना, शराब या सिगरेट खरीदने पर उम्र की पाबंदी लगाने जैसा ही है। लेकिन, शराब या सिगरेट जैसी लत लगाने वाली और नुकसानदेह चीज़ों के उलट, सोशल मीडिया के कुछ फायदे भी हैं। खासकर उन किशोरों के लिए जो अपने आस-पास के समुदाय से कटा हुआ महसूस करते हैं और ऐसे लोगों के साथ रिश्ते बनाना चाहते हैं जो उनकी तरह ही सोचते-महसूस करते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म दुनिया भर के लोगों से जुड़ने और समान सोच वाले समूहों के साथ समुदाय बनाने का मौका देते हैं। ये खुद को व्यक्त करने (self-expression) और सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए भी एक मंच प्रदान करते हैं। अमेरिका के किशोरों पर किए गए 'प्यू' (Pew) सर्वे में, 80 प्रतिशत किशोरों ने कहा कि सोशल मीडिया उन्हें अपने दोस्तों की ज़िंदगी में क्या चल रहा है, इससे जुड़े रहने में मदद करता है।
क्या यह मुमकिन भी है?
ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध के शुरुआती सबूत बताते हैं कि बच्चे इससे बचने के तरीके निकाल रहे हैं: 12-15 साल की उम्र के लगभग 61 प्रतिशत बच्चे फर्जी आईडी, अपना रूप बदलकर, या वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) का इस्तेमाल करके इन प्लेटफॉर्म्स का उपयोग कर रहे हैं, जबकि लाखों अकाउंट्स को बंद कर दिया गया है। ऑस्ट्रेलिया जैसे कुछ देशों में, प्लेटफॉर्म्स को खुद ही यह तरीका खोजना होता है कि वे यूज़र की उम्र की पुष्टि कैसे करें। कुछ नाबालिगों ने बायोमेट्रिक तकनीक (जो उम्र का अंदाज़ा लगाती है) को चकमा देने के लिए कई तरीके अपनाए हैं जैसे फोटो में हेरफेर करना, मशहूर हस्तियों की फोटो लगाना, होशियारी से मेकअप करना, या यहां तक कि अपने बड़े दोस्तों और माता-पिता की मदद से "सेल्फी टेस्ट" पास कर लेना। कुछ बच्चे रजिस्ट्रेशन के समय अपनी जन्मतिथि बदल देते हैं, या फिर परिवार के किसी सदस्य के ऐसे अकाउंट का इस्तेमाल करते हैं जो पहले से ही किसी वयस्क के नाम पर वेरिफाइड है।
माता-पिता को भी समझना होगा
माता-पिता और बच्चों की देखभाल करने वालों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि सोशल प्लेटफ़ॉर्म और स्क्रीन की लत लगने पर बच्चों के व्यवहार में क्या बदलाव आते हैं। जब बड़ों को लगे कि कोई समस्या है, तो उनके पास अपने बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य सहायता से जोड़ने के लिए आसान और किफायती तरीके होने चाहिए। फिलहाल, ज़्यादातर जगहों पर ऐसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। अंत में, संयुक्त राष्ट्र का सुझाव है कि ऑनलाइन दुनिया में बच्चों के लिए क्या बेहतर है, इस पर होने वाली बातचीत में उन्हें भी शामिल किया जाना चाहिए। ज़ाहिर है, इसका मतलब यह नहीं है कि 12 साल के बच्चों को नियामक संस्थाओं (regulatory agencies) की ज़िम्मेदारी सौंप दी जाए। लेकिन, युवा क्या सोचते हैं, ऑनलाइन रहने से उन्हें क्या मिलता है और किन वजहों से वे स्क्रीन से नज़रें नहीं हटा पाते—इन बातों पर उनका फ़ीडबैक बहुत काम आ सकता है। इससे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और शिक्षा कार्यक्रमों में ऐसे बदलाव किए जा सकते हैं, जिससे युवा ज़्यादा सुरक्षित तरीके से ऑनलाइन रह सकें और एक स्वस्थ संतुलन बनाए रख सकें।