
नारी डेस्क: हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी का विशेष महत्व माना जाता है। हर साल भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। मान्यता है कि इसी पावन दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन भक्त गणपति बप्पा की पूजा-अर्चना करते हैं, व्रत रखते हैं और उनकी जन्म कथा भी सुनते या पढ़ते हैं। गणेश चतुर्थी का उत्सव पूरे 10 दिनों तक चलता है। इस दौरान घरों और पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है और विधि-विधान से पूजा की जाती है। माना जाता है कि गणेश जी की पूजा करने से जीवन में आने वाले विघ्न दूर होते हैं और शुभ कार्यों में सफलता मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणेश चतुर्थी के दिन व्रत और पूजा के साथ भगवान गणेश की कथा पढ़ना या सुनना भी शुभ माना जाता है। आइए जानते हैं भगवान गणेश के जन्म से जुड़ी वह पौराणिक कथा, जो गणेश चतुर्थी के अवसर पर विशेष रूप से पढ़ी जाती है।
भगवान गणेशसे जुड़ी वह पावन कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उस समय उनके द्वार पर पहरा देने वाला कोई नहीं था। माता पार्वती नहीं चाहती थीं कि उनकी अनुमति के बिना कोई उनके कक्ष में प्रवेश करे। तब उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। इस तरह उस बालक का जन्म हुआ, जिन्हें आगे चलकर भगवान गणेश के नाम से जाना गया। माता पार्वती ने बालक को अपना पुत्र मानते हुए उन्हें आदेश दिया कि जब तक वह स्नान करके वापस न आएं, तब तक किसी को भी अंदर आने की अनुमति न दी जाए। बालक गणेश अपनी माता की आज्ञा मानकर द्वार पर पहरा देने लगे। कुछ समय बाद भगवान शिव वहां पहुंचे। वह अंदर जाने लगे, लेकिन बालक गणेश ने उन्हें रोक दिया। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि वह माता पार्वती के पति हैं और उन्हें अंदर जाने से रोकना उचित नहीं है। लेकिन गणेश जी अपनी माता की आज्ञा से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने साफ कह दिया कि माता के आदेश के बिना वह किसी को भी अंदर नहीं जाने देंगे। कहते हैं कि कई देवी-देवताओं ने भी गणेश जी को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह अपने कर्तव्य से नहीं हटे। इसके बाद भगवान शिव और बालक गणेश के बीच युद्ध की स्थिति बन गई। क्रोध में आकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया।

जब माता पार्वती स्नान करके बाहर आईं और उन्होंने अपने पुत्र को मृत अवस्था में देखा, तो वह बेहद दुखी और क्रोधित हो गईं। उन्होंने पूरी सृष्टि का विनाश करने का संकल्प ले लिया। माता पार्वती के इस रूप से सभी देवी-देवता चिंतित हो गए। तब देवताओं ने माता पार्वती को शांत करने का प्रयास किया। माता को शांत करने और बालक गणेश को दोबारा जीवित करने के लिए भगवान शिव ने एक उपाय करने का फैसला किया। भगवान शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा की ओर जाएं और उन्हें जो भी ऐसी माता मिले, जो अपने बच्चे की तरफ पीठ करके सोई हो, उसके बच्चे का सिर लेकर आएं। शिव जी के आदेश के बाद गण सिर की तलाश में निकल पड़े। काफी खोजबीन के बाद उन्हें एक हथिनी मिली, जो अपने बच्चे की तरफ पीठ करके सोई हुई थी। गण उस हाथी के बच्चे का सिर लेकर भगवान शिव के पास पहुंचे। इसके बाद भगवान शिव ने हाथी का मस्तक गणेश जी के धड़ पर रखा और उन्हें फिर से जीवित कर दिया। अपने पुत्र को जीवित देखकर माता पार्वती बेहद प्रसन्न हुईं और उनका क्रोध शांत हो गया। गणेश जी के जीवित होने के बाद भगवान शिव और अन्य सभी देवी-देवताओं ने उन्हें आशीर्वाद दिया। इसी दौरान भगवान शिव ने गणेश जी को एक विशेष वरदान दिया। उन्होंने कहा कि अब किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश जी की पूजा के बिना नहीं होगी। सबसे पहले भगवान गणेश की आराधना की जाएगी और उसके बाद ही कोई दूसरा शुभ काम शुरू किया जाएगा। इसी मान्यता के कारण भगवान गणेश को 'प्रथम पूज्य' कहा जाता है। आज भी हिंदू धर्म में किसी पूजा, शुभ कार्य, गृह प्रवेश, विवाह या अन्य मांगलिक अवसर की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से करने की परंपरा है। गणेश चतुर्थी के दिन भी भक्त गणपति बप्पा की विधि-विधान से पूजा करने के साथ उनकी इस पावन कथा को पढ़ते और सुनते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ गणेश जी का स्मरण करने से भगवान भक्तों के जीवन के विघ्न दूर करते हैं और उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
