नारी डेस्क : गणेश उत्सव पूरे देश में बड़े ही धूमधाम से मनाया जा रहा है। जगह-जगह बप्पा के जयकारे गूंज रहे हैं और हर भक्त की जुबान पर एक ही नाम है, “गणपति बप्पा मोरया!” लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान गणेश के जयकारे में ‘मोरया’ शब्द आखिर आया कहां से? इस एक शब्द के पीछे महाराष्ट्र के महान गणेश भक्त संत मोरया गोसावी की ऐसी भक्ति की कहानी जुड़ी है, जिसने भगवान गणेश के इस जयकारे को एक खास पहचान दे दी। पुणे के पास स्थित मोरगांव का मयूरेश्वर मंदिर और चिंचवड़ में मोरया गोसावी की गणेश साधना इस परंपरा से गहराई से जुड़े माने जाते हैं।
मोरगांव से शुरू होती है कहानी
महाराष्ट्र के पुणे जिले का मोरगांव अष्टविनायक यात्रा का प्रमुख केंद्र है। यहां भगवान गणेश मयूरेश्वर या मोरेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं। महाराष्ट्र पर्यटन के अनुसार, अष्टविनायक यात्रा की शुरुआत और समापन मोरगांव से होता है। मयूरेश्वर को भगवान गणेश के उस स्वरूप से जोड़ा जाता है, जिसमें वे मोर पर सवार होकर दैत्य सिंधु का वध करते हैं। इसी पवित्र स्थान से संत मोरया गोसावी की गणेश भक्ति की परंपरा भी जुड़ी हुई है। मराठी विश्वकोश के अनुसार, मोरया गोसावी को महाराष्ट्र के प्रसिद्ध गणेश भक्त संतों में गिना जाता है। उनके पिता वामनभट्ट शालीग्राम और माता पार्वतीबाई मूल रूप से कर्नाटक के शाली गांव से थे और बाद में मोरगांव में आकर बस गए। मान्यता है कि मयूरेश्वर की कृपा से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई, इसलिए बच्चे का नाम मोरया रखा गया।

मोरगांव से शुरू होती है कहानी
यह कहानी महाराष्ट्र के पुणे के पास स्थित मोरगांव से जुड़ी है, जो भगवान गणेश के पवित्र अष्टविनायक मंदिरों में से एक श्री मोरेश्वर (मयूरेश्वर) मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। परंपरा के अनुसार, मोरया गोसावी का जन्म एक धार्मिक देशस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बताया जाता है कि उनके माता-पिता बीदर से आकर मोरगांव में बस गए थे और उनके जन्म से पहले से ही भगवान गणेश की भक्ति करते थे। बचपन से ही मोरया गोसावी का मन गणपति भक्ति में रमा रहता था। बड़े होने पर वे चिंचवाड़ में रहने लगे, लेकिन मोरगांव के मोरेश्वर गणपति के प्रति उनकी श्रद्धा कम नहीं हुई।
हर महीने पैदल जाते थे मोरगांव
मान्यता है कि मोरया गोसावी हर महीने भगवान मोरेश्वर के दर्शन करने के लिए चिंचवाड़ से मोरगांव तक पैदल यात्रा करते थे। उम्र बढ़ने के साथ यह लंबा सफर उनके लिए मुश्किल होने लगा, लेकिन गणपति के प्रति उनकी भक्ति और दर्शन की इच्छा वैसी ही रही। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक रात जब मोरया गोसावी मोरगांव के मोरेश्वर मंदिर पहुंचे, तब तक मंदिर के कपाट बंद हो चुके थे। कहा जाता है कि उनकी अटूट भक्ति देखकर मंदिर के द्वार चमत्कारिक रूप से खुल गए और उन्हें अपने आराध्य भगवान गणेश के दर्शन प्राप्त हुए।

गणपति ने दिया चिंचवाड़ में रहने का संकेत
समय बीतने के साथ जब मोरया गोसावी के लिए मोरगांव की यात्रा करना कठिन होने लगा, तब धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान गणेश ने उन्हें दर्शन दिए। कहा जाता है कि गणपति ने उन्हें चिंचवाड़ में ही अपनी पूजा का स्थान बनाने का निर्देश दिया। इसके बाद मोरया गोसावी को एक दिव्य अनुभव हुआ कि भगवान गणेश स्वयं उनके साथ चिंचवाड़ में रहने आएंगे। इसी दौरान एक दिन नदी में स्नान करते समय उन्हें गणेश की एक मूर्ति मिली। मान्यता है कि यह मूर्ति उसी पवित्र रूप से मिलती-जुलती थी, जिसकी मोरगांव में पूजा की जाती थी। मोरया गोसावी उस मूर्ति को अपने साथ चिंचवाड़ ले आए और वहां उसकी स्थापना की। बाद में यह स्थान मंगलमूर्ति वाडा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
‘गणपति बप्पा मोरया’ में कैसे जुड़ा ‘मोरया’?
मोरया गोसावी भगवान गणेश के महान भक्तों में गिने जाते हैं और गणपत्य परंपरा में उनका विशेष सम्मान है। उनकी गणपति भक्ति इतनी प्रसिद्ध हुई कि समय के साथ उनके नाम को भगवान गणेश के जयघोष से जोड़कर देखा जाने लगा। इसी वजह से भक्त जब कहते हैं ‘गणपति बप्पा मोरया’, तो धार्मिक परंपरा में ‘मोरया’ को भगवान गणेश के परम भक्त मोरया गोसावी के प्रति श्रद्धा और प्रेम की अभिव्यक्ति माना जाता है। वहीं गणपति विसर्जन के समय बोला जाने वाला जयघोष, ‘गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या’, का भाव है, ‘हे गणपति बप्पा, अगले वर्ष जल्दी वापस आइए।’ इस तरह इस छोटे-से जयघोष में भगवान गणेश के प्रति भक्ति के साथ उनके अनन्य भक्त मोरया गोसावी की स्मृति भी जुड़ी हुई मानी जाती है। यही वजह है कि सदियों से गणपति उत्सव के दौरान ‘गणपति बप्पा मोरया’ का जयघोष भक्तों के उत्साह और श्रद्धा का प्रतीक बना हुआ है।