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क्या आप जानते हैं महादेव ने गणेश जी को क्यों लगाया हाथी का सिर?

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 14 Sep, 2026 01:46 PM
क्या आप जानते हैं महादेव ने गणेश जी को क्यों लगाया हाथी का सिर?

नारी डेस्कः भगवान गणेश को हिंदू धर्म में प्रथम पूजनीय देवता माना जाता है। किसी भी शुभ काम, पूजा या मांगलिक कार्य की शुरुआत सबसे पहले गणेश जी की पूजा से करने की परंपरा है। मान्यता है कि बप्पा की पूजा करने से काम में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और कार्य सफल होता है। भगवान गणेश को गजानन भी कहा जाता है, क्योंकि उनका मुख हाथी का है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गणेश जी का सिर हाथी का ही क्यों है? इसके पीछे पौराणिक कथाओं में दो अलग-अलग प्रसंग बताए गए हैं। आइए जानते हैं गणेश जी के हाथी मुख से जुड़ी पूरी कथा।

गजासुर से जुड़ी है हाथी के सिर की एक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, गजासुर नाम का एक शक्तिशाली राक्षस था। वह भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। महादेव को प्रसन्न करने के लिए उसने कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए और उसे वरदान मांगने को कहा। गजासुर ने महादेव से ऐसा वरदान मांगा कि भगवान शिव स्वयं उसके पेट में निवास करें। भगवान शिव ने अपने भक्त की इच्छा पूरी की और उसके पेट में रहने लगे। महादेव के कैलाश से चले जाने के बाद माता पार्वती काफी चिंतित हो गईं। उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता मांगी और महादेव को वापस लाने का उपाय पूछा।

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विष्णु जी ने बनाई गजासुर को प्रसन्न करने की योजना

भगवान विष्णु ने गजासुर को प्रसन्न करने के लिए एक योजना बनाई। कथा के अनुसार, उन्होंने सितार वादक का रूप धारण किया, जबकि ब्रह्मा जी तबला वादक बने। वहीं, नंदी ने नृत्य करने वाले बैल का रूप ले लिया। इसके बाद सभी गजासुर के पास पहुंचे। नंदी का नृत्य देखकर गजासुर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने नंदी से कोई भी वरदान मांगने को कहा। तब नंदी ने भगवान शिव को उसके बंधन से मुक्त करने का वरदान मांगा। गजासुर ने उनकी बात मान ली और भगवान शिव को मुक्त कर दिया।

इसके बाद भगवान विष्णु गजासुर की भक्ति और सत्यनिष्ठा से प्रसन्न हुए और उससे एक और वरदान मांगने को कहा। तब गजासुर ने इच्छा जताई कि उसका मस्तक सभी देवताओं द्वारा सम्मानित और पूजित हो। भगवान विष्णु ने उसकी इच्छा पूरी होने का आशीर्वाद दिया। इसी कथा के आधार पर भगवान गणेश के गजमुख से गजासुर की कथा को जोड़ा जाता है।

फिर भगवान गणेश का सिर क्यों काटा गया

गणेश जी के हाथी मुख से जुड़ी दूसरी और सबसे प्रसिद्ध कथा माता पार्वती और भगवान शिव से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने पुत्र गणेश को द्वार पर पहरा देने के लिए कहा और आदेश दिया कि उनकी अनुमति के बिना किसी को अंदर न आने दें। उसी समय भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेश जी ने उन्हें पहचानने के बावजूद माता के आदेश का पालन किया और शिव जी को अंदर जाने से रोक दिया। इस बात पर भगवान शिव क्रोधित हो गए। दोनों के बीच विवाद बढ़ गया और क्रोध में आकर महादेव ने गणेश जी का सिर उनके धड़ से अलग कर दिया।

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माता पार्वती के क्रोध से मच गया हाहाकार

जब माता पार्वती को इस घटना के बारे में पता चला तो वह बेहद क्रोधित हो गईं। उन्होंने भगवान शिव से गणेश जी को दोबारा जीवित करने के लिए कहा। माता पार्वती के क्रोध को देखकर देवताओं ने भी महादेव से गणेश जी को पुनर्जीवित करने का आग्रह किया। इसके बाद भगवान शिव ने गणेश जी को फिर से जीवन देने का वचन दिया। कथा के एक प्रसिद्ध रूप के अनुसार, उन्होंने सबसे पहले मिलने वाले जीव के सिर को लाने का निर्देश दिया। इसके बाद हाथी का सिर लाकर गणेश जी के धड़ पर लगाया गया और उन्हें पुनः जीवित किया गया। कुछ परंपराओं में इस हाथी को इंद्रदेव के हाथी ऐरावत से जोड़ा जाता है, जबकि अलग-अलग पुराणों और कथा-परंपराओं में इस प्रसंग के विवरण में अंतर मिलता है।

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तभी से कहलाए गजानन

गणेश जी को हाथी का मुख मिलने के बाद उन्हें गजानन, गजमुख और एकदंत जैसे नामों से भी जाना जाने लगा। हिंदू धार्मिक परंपरा में हाथी को बुद्धि, शक्ति और विवेक का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि गणेश जी का स्वरूप केवल एक पौराणिक कथा से जुड़ा नहीं है, बल्कि उनके स्वरूप के हर अंग का अपना धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। गणेश जी के हाथी मुख की कथा हमें यह भी संदेश देती है कि बाहरी रूप से ज्यादा महत्व ज्ञान, विवेक, धैर्य और सही निर्णय लेने की क्षमता का है। यही कारण है कि किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश का स्मरण करने की परंपरा आज भी कायम है।

नोट: भगवान गणेश के हाथी मुख और उनके पुनर्जीवन से जुड़ी कथाओं के अलग-अलग पुराणों और लोक-परंपराओं में कुछ विवरण अलग मिलते हैं। ऊपर दी गई कथा धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथा-परंपराओं पर आधारित है।

 
 
 

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