23 AUGSUNDAY2026 7:07:03 PM
Nari

Nag Panchami 2026: जानें कैसे हुआ नागों का जन्म, शेषनाग-वासुकि से जुड़ी है ये कथा पढ़ें

  • Edited By Monika,
  • Updated: 17 Aug, 2026 04:14 PM
Nag Panchami 2026: जानें कैसे हुआ नागों का जन्म, शेषनाग-वासुकि से जुड़ी है ये कथा पढ़ें

नारी डेस्क : नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने की परंपरा सदियों पुरानी है। सनातन धर्म में नागों का संबंध भगवान शिव, भगवान विष्णु और कई महत्वपूर्ण पौराणिक कथाओं से जुड़ा है। भगवान शिव के गले में नाग विराजमान हैं, जबकि शेषनाग भगवान विष्णु की शय्या माने जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शेषनाग, वासुकि, तक्षक और कर्कोटक जैसे प्रसिद्ध नागों की उत्पत्ति कैसे हुई? नागों के जन्म की एक प्रमुख कथा महाभारत के आदिपर्व में मिलती है। इस कथा के अनुसार नागों की उत्पत्ति महर्षि कश्यप की पत्नी कद्रू से हुई थी। वहीं उनकी दूसरी पत्नी विनता से अरुण और गरुड़ का जन्म हुआ। आइए जानते हैं नागों के जन्म और कद्रू-विनता से जुड़ी पूरी पौराणिक कथा।

कद्रू ने मांगे थे एक हजार नाग पुत्र

पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि कश्यप की कई पत्नियां थीं, जिनमें कद्रू और विनता प्रमुख थीं। दोनों बहनों ने महर्षि कश्यप की तपस्या और सेवा करके उन्हें प्रसन्न किया। जब कश्यप ऋषि ने दोनों को वरदान मांगने के लिए कहा, तो कद्रू ने एक हजार पुत्रों की इच्छा जताई। वह चाहती थीं कि उनके पुत्र शक्तिशाली और पराक्रमी हों। वहीं विनता ने केवल दो पुत्रों का वरदान मांगा, लेकिन उनकी इच्छा थी कि उनके दोनों पुत्र कद्रू के एक हजार पुत्रों से भी अधिक शक्तिशाली और तेजस्वी हों। महर्षि कश्यप ने दोनों को उनकी इच्छा के अनुसार वरदान दे दिया।

PunjabKesari

कद्रू ने दिए एक हजार अंडे

समय आने पर कद्रू ने एक हजार अंडे दिए, जबकि विनता ने दो अंडे दिए। दोनों ने अपने-अपने अंडों को सुरक्षित रख दिया और उनके विकसित होने की प्रतीक्षा करने लगीं। कथा के अनुसार, लंबे समय बाद कद्रू के अंडों से नाग पुत्रों का जन्म होने लगा। दूसरी ओर विनता के दोनों अंडे काफी समय तक नहीं फूटे। यहीं से दोनों बहनों की कहानी में एक महत्वपूर्ण मोड़ आता है। विनता अपने अंडों के न फूटने से परेशान और अधीर हो गईं। उन्होंने जल्दबाजी में एक अंडा फोड़ दिया। अंडे से अरुण का जन्म हुआ, लेकिन वह पूरी तरह विकसित नहीं हुए थे। अपनी मां की जल्दबाजी से अरुण नाराज हुए और उन्होंने विनता को श्राप दिया कि उन्हें कुछ समय तक कद्रू की दासी बनकर रहना पड़ेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उनका दूसरा पुत्र ही आगे चलकर उन्हें इस दासता से मुक्त कराएगा। बाद में अरुण को सूर्यदेव का सारथी माना गया। समय पूरा होने पर विनता के दूसरे अंडे से गरुड़ का जन्म हुआ।

यें भी पढ़ें : नाग पंचमी वाले दिन भूलकर भी न करें ये 3 गलतियां, वरना बढ़ सकती हैं आपकी मुश्किलें!

उच्चैःश्रवा को लेकर हुआ कद्रू-विनता में विवाद

कथा में आगे समुद्र मंथन से प्राप्त दिव्य अश्व उच्चैःश्रवा का प्रसंग आता है। एक दिन कद्रू और विनता के बीच इस घोड़े की पूंछ के रंग को लेकर शर्त लग गई। विनता का कहना था कि उच्चैःश्रवा पूरी तरह सफेद है, जबकि कद्रू ने उसकी पूंछ काली होने की बात कही। कद्रू ने अपने नाग पुत्रों से कहा कि वे उच्चैःश्रवा की पूंछ से लिपट जाएं, जिससे वह काली दिखाई दे। इस छल के कारण विनता शर्त हार गईं और उन्हें कद्रू की दासी बनना पड़ा।

PunjabKesari

गरुड़ ने मां विनता को कैसे कराया मुक्त?

जब गरुड़ को अपनी मां के दासत्व के बारे में पता चला तो उन्होंने उन्हें मुक्त कराने का संकल्प लिया। पौराणिक कथा के अनुसार, गरुड़ ने देवताओं से अमृत प्राप्त किया और उसे नागों के सामने रख दिया। इसके बदले उन्होंने अपनी मां विनता को दासता से मुक्त कराया। आगे चलकर भगवान विष्णु ने गरुड़ को अपना वाहन बनने का वरदान दिया। इस तरह गरुड़ का संबंध भगवान विष्णु से जुड़ गया।

यें भी पढ़ें : साल में सिर्फ एक दिन खुलता है ये मंदिर, दर्शन मात्र से दूर होता है कालसर्प दोष!

शेषनाग, वासुकि और तक्षक का क्या है संबंध?

कद्रू की संतान के रूप में पौराणिक परंपरा में कई प्रसिद्ध नागों का उल्लेख मिलता है। इनमें शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और कालिया जैसे नाम प्रमुख हैं। शेषनाग को भगवान विष्णु की शय्या के रूप में जाना जाता है, जबकि वासुकि का उल्लेख समुद्र मंथन की कथा में मिलता है। वहीं तक्षक का संबंध महाभारत की प्रसिद्ध कथाओं से जुड़ा हुआ है। इन नागों से जुड़ी अलग-अलग कथाएं पुराणों और महाकाव्यों में मिलती हैं।

PunjabKesari

नाग पंचमी पर क्यों होती है नाग देवता की पूजा?

नाग पंचमी सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन नाग देवता की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में नागों को केवल सर्प के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उन्हें दैवीय और पौराणिक महत्व भी दिया गया है। भगवान शिव के गले में नाग का विराजमान होना और भगवान विष्णु का शेषनाग पर शयन करना नागों के धार्मिक महत्व को दर्शाता है। इसी श्रद्धा के कारण नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा, दूध अर्पित करने और उनकी कथा सुनने जैसी परंपराएं कई क्षेत्रों में प्रचलित हैं। हालांकि, पूजा-पद्धति और स्थानीय परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं।

यें भी पढ़ें : सोने की कलम से लिखी होती है इस मूलांक वालों की किस्मत, धन-वैभव खुद आता है इनके पास

नाग पंचमी की कथा देती है खास संदेश

कद्रू, विनता, गरुड़ और नागों से जुड़ी यह कथा केवल नागों की उत्पत्ति की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें लोभ, जल्दबाजी, छल, कर्म और उसके परिणाम जैसे कई महत्वपूर्ण संदेश भी मिलते हैं। नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा इसी पौराणिक परंपरा और श्रद्धा से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि सावन की नाग पंचमी आज भी हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में शामिल है।

Related News