
नारी डेस्क: उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित पूजनीय श्री मदमहेश्वर मंदिर के कपाट वीरवार को शुभ 'कर्क लग्न' में, विस्तृत वैदिक रीति-रिवाजों, मंत्रोच्चार और पारंपरिक धार्मिक समारोहों के बीच भक्तों के लिए खोल दिए गए। पवित्र 'पंच केदार' मंदिरों में 'द्वितीय केदार' के रूप में विख्यात इस मंदिर को फूलों से बेहद खूबसूरती से सजाया गया था, जबकि पूरा मंदिर परिसर भक्ति और आध्यात्मिकता के वातावरण में डूबा हुआ था।

दूर- दूर से आए भक्त
मंदिर के औपचारिक उद्घाटन को देखने के लिए बड़ी संख्या में भक्त मंदिर परिसर में एकत्रित हुए और भगवान मदमहेश्वर की पूजा-अर्चना कर सुख, शांति और समृद्धि के लिए आशीर्वाद मांगा। मंदिर के कपाट खुलने से पहले, भगवान मदमहेश्वर की उत्सव-मूर्ति (चल-विग्रह) को ले जाने वाली पालकी, उखीमठ स्थित अपने शीतकालीन निवास 'श्री ओंकारेश्वर मंदिर' से विभिन्न पड़ावों से होते हुए मंदिर परिसर में पहुंची। भक्तों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों और धार्मिक उत्साह के साथ पालकी का स्वागत किया। समारोह के दौरान, मंदिर के भीतर विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान किए गए। भगवान मदमहेश्वर के स्वयंभू शिवलिंग को उनकी ध्यानस्थ 'समाधि मुद्रा' से निकालकर, उनकी औपचारिक 'श्रृंगार मुद्रा' में सुसज्जित किया गया।
6 महीने तक खुला रहेगा मंदिर
मंदिर के कपाट खुलने के साथ ही, वार्षिक 'श्री मदमहेश्वर यात्रा' का आधिकारिक रूप से शुभारंभ हो गया है, जिससे पूरे देश भर के तीर्थयात्रियों और भक्तों में भारी उत्साह का संचार हुआ है। अब यह मंदिर ग्रीष्मकालीन तीर्थयात्रा के मौसम के दौरान छह महीने तक भक्तों के दर्शनार्थ खुला रहेगा। 'पंच केदार' परिपथ में मदमहेश्वर मंदिर का अत्यंत धार्मिक महत्व है। भक्तों की ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने से अलौकिक आशीर्वाद, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। 'पंच केदार' से तात्पर्य भगवान शिव को समर्पित पांच पवित्र मंदिरों से है, जो उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय क्षेत्र में स्थित हैं। 'पंच केदार' के अंतर्गत आने वाले पांच मंदिर हैं: केदारनाथ मंदिर, तुंगनाथ मंदिर, रुद्रनाथ मंदिर, मदमहेश्वर मंदिर और कल्पेश्वर मंदिर।

पंचकेदार की कहानी
पंचकेदार की कथानुसार महाभारत युद्ध में पांडवों द्वारा भ्रातृहत्या पाप से मुक्ति हेतु भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु शिव के पीछे हिमालय (उत्तराखंड) पहुंचे। भगवान शिव अंतर्ध्यान होकर केदारनाथ में बस गये। पांडव भी उनके पीछे-पीछे केदारनाथ पहुंच गए। उनको आते देख भगवान शिव ने बैल का रूप धारण कर पशुओं के बीच चले गए। युधिष्ठिर के कहने पर भीम ने विराट रूप धारण कर दो पहाड़ों पर अपना पैर रखकर खड़े हो गए। सभी पशु भीम के नीचे से निकल गए किन्तु तभी भीम ने बैल रूपी भगवान शिव की पीठ पकड़ ली, पांडवों की श्रद्धा को जान भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देकर पापमुक्त किया। पांडवों ने यहां पर मंदिर का निर्माण किया, जिसमें आज भी बैल के पीठ की आकृति-पिंड के रूप में पूजित है।