
नारी डेस्क: ओडिशा के पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर में सोमवार को देवस्नान पूर्णिमा का भव्य आयोजन किया गया। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को गर्भगृह से बाहर लाकर विशेष मंच पर 108 कलश पवित्र जल से स्नान कराया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अनुष्ठान के बाद भगवान ‘अनवसर’ में चले जाते हैं, यानी उन्हें अस्वस्थ माना जाता है और वे अगले 15 दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देते।
108 कलश जल से हुआ पवित्र स्नान
सुबह से ही पुरी में श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ पड़ा। मंदिर परिसर में स्थित ‘सुनार कुआं’ से लाए गए जल से यह विशेष स्नान कराया गया। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को मंदिर के ऊंचे मंच पर लाकर विधिवत अनुष्ठान किए गए। पूरा वातावरण जयकारों और भक्ति भाव से गूंज उठा।

केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने किए दर्शन
इस धार्मिक आयोजन में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान भी शामिल हुए। उन्होंने मंदिर में साष्टांग दंडवत कर भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद लिया और इस पावन अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं के साथ अनुष्ठान में भाग लिया।
मान्यता: स्नान के बाद भगवान हो जाते हैं ‘बीमार’
पौराणिक मान्यता के अनुसार, अत्यधिक स्नान के बाद भगवान जगन्नाथ को ‘ज्वर’ यानी बुखार आ जाता है। इसी कारण उन्हें मंदिर के भीतर स्थित ‘अनवसर गृह’ में विश्राम के लिए ले जाया जाता है। इस दौरान उन्हें औषधीय उपचार और विशेष देखभाल में रखा जाता है। भक्त इस अवधि में उनके दर्शन नहीं कर पाते। 15 दिन बाद होगा नेत्रोत्सव भगवान जगन्नाथ का अगला प्रमुख अनुष्ठान 14 जुलाई 2026 को ‘नेत्रोत्सव’ के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन भगवान एक बार फिर भक्तों को नए रूप में दर्शन देंगे। इसके अगले दिन 15 जुलाई को ‘उभा यात्रा’ निकाली जाएगी, जिसमें रथों की विशेष पूजा की जाएगी और रथयात्रा की औपचारिक शुरुआत मानी जाएगी।

रथयात्रा की भव्य तैयारियां शुरू
पुरी में विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा की तैयारियां अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। इस आयोजन को देखने के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से पहुंचते हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीनों भव्य रथों का निर्माण परंपरा के अनुसार किया गया है।तीनों रथों की खासियत भगवान जगन्नाथ का रथ ‘नंदीघोष’ लगभग 45 फीट ऊंचा होता है, जिसमें 16 पहिए लगे होते हैं। इस पर लाल और पीले रंग का ध्वज फहराया जाता है। बलभद्र जी का रथ ‘तालध्वज’ करीब 45.6 फीट ऊंचा होता है और इसमें 14 पहिए होते हैं। वहीं देवी सुभद्रा का रथ ‘दर्पदलन’ 44.6 फीट ऊंचा होता है, जिसमें 12 पहिए लगाए जाते हैं और इस पर लाल-काले रंग का ध्वज होता है।
गुंडिचा यात्रा से लेकर बहुड़ा तक की परंपरा
16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे। यह यात्रा रथयात्रा का सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इसके बाद नौ दिनों तक भगवान वहीं विश्राम करेंगे। 24 जुलाई को ‘बहुड़ा यात्रा’ के जरिए वापसी होगी और 25 जुलाई को ‘सुना बेषा’ का आयोजन किया जाएगा, जिसमें भगवान स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित होकर भक्तों को दर्शन देंगे।

आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम
पुरी की रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और जनभागीदारी का अद्भुत संगम है। हर साल यह आयोजन करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनता है और भगवान जगन्नाथ के प्रति भक्ति भाव को और गहरा करता है।