नारी डेस्क: 'रिजेक्शन' यानी अस्वीकृति की पीड़ा कई बार इतनी गहरी होती है कि वह किसी शारीरिक चोट जैसी महसूस होने लगती है। ऐसा लगता है मानो किसी ने पेट में जोरदार मुक्का मार दिया हो या दिल सचमुच दर्द से भर उठा हो। स्कूल के दिनों में बच्चों के सामने भी कुछ ऐसी ही चुनौतियां आती है। कोई बच्चा स्कूल नाटक में मुख्य भूमिका पाने की कोशिश करता है, कोई खेल टीम में जगह बनाने के लिए मेहनत करता है, ये सभी अवसर बच्चों के व्यक्तित्व विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन हर बार हर बच्चे का चयन संभव नहीं होता। ऐसे में उनका दिल टूट जाता है।

छोटी- छोटी बात पर टूट जाते हैं बच्चे
स्कूल के बाहर भी बच्चों और किशोरों को कई तरह की रिजेक्शनका सामना करना पड़ता है। कभी उन्हें किसी पार्टी का निमंत्रण नहीं मिलता, कभी अच्छी खासी नौकरी हाथ से निकल जाती है और कभी मनचाहे विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं मिल पाता। माता-पिता के लिए भी यह स्थिति कम तकलीफदेह नहीं होती। अपने बच्चे को निराश और टूटता हुआ देखना बेहद पीड़ादायक होता है। वे उसके दर्द को महसूस तो करते हैं, लेकिन अक्सर समझ नहीं पाते कि इस मुश्किल समय में उसकी मदद कैसे करें।
रिजेक्शन से आस- पास वालों पर भी पड़ता है असर
रिजेक्शन अक्सर व्यक्तिगत अनुभव होती है, लेकिन इसका असर केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यह उसके दोस्तों, सामाजिक संबंधों, समूह में उसकी पहचान और उपलब्धियों पर भी प्रभाव डाल सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी किशोर का खेल टीम में चयन नहीं होता, तो वह उन दोस्तों के साथ समय बिताने के अवसर भी खो सकता है, जिनका चयन हो गया है। जो बच्चे पहली बार रिजेक्शन का सामना करते हैं, उनके लिए अपनी नकारात्मक भावनाओं को पहचानना और उन्हें संभालना आसान नहीं होता। ऐसे में उनका गुस्सा, चिंता या बेचैनी कभी-कभी खुद उनके लिए भी नयी होती है और परिवार वालों के लिए भी।

बच्चे रिजेक्शन का सामना कैसे करते हैं?
सोशल मीडिया भी इस भावना को और बढ़ा सकता है। जब बच्चे और किशोर लगातार दूसरों की ''आदर्श'' जिंदगी और ''शानदार'' उपलब्धियों की तस्वीरें देखते हैं, तो उन्हें अपनी असफलताएं और भी बड़ी लगने लगती हैं। यह संवेदनशीलता केवल किशोरावस्था तक सीमित नहीं रहती। बीस वर्ष की उम्र के बाद भी युवा स्वीकार किए जाने या ठुकराए जाने के संकेतों के प्रति बेहद सजग रहते हैं। यही कारण है कि रिजेक्शन उन्हें गहरी भावनात्मक पीड़ा दे सकता है। हालांकि, ठुकराए जाने का मतलब केवल निराशा नहीं है। यह जीवन का ऐसा अनुभव भी है, जो स्वीकार करना, स्वयं के प्रति दयालु होना, नए लक्ष्य तय करना और परिस्थितियों के अनुसार समझौता करना जैसा महत्वपूर्ण जीवन-कौशल सिखाता है। माता-पिता और दूसरे बड़े लोग बच्चों को ये कौशल विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सही मार्गदर्शन मिलने पर बच्चे रिजेक्शन से उबरना सीख सकते हैं और पहले से अधिक आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकते हैं।
उनकी भावनाओं को समझें और स्वीकार करें
माता-पिता बच्चों को रिजेक्शन को नए नजरिए से देखने में भी मदद कर सकते हैं। वे अपने जीवन की ऐसी घटनाएं साझा कर सकते हैं, जब उन्हें भी असफलता या अस्वीकृति मिली हो। इसके अलावा किसी प्रसिद्ध व्यक्ति, प्रेरक पुस्तक या बच्चे की पसंदीदा फिल्म की कहानी भी उदाहरण बन सकती है। ऐसी कहानियां बच्चों को यह एहसास दिलाती हैं कि असफलता अंत नहीं होती, बल्कि आगे बढ़ने की शुरुआत भी हो सकती है। जब अ रिजेक्शन किया जाता है, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है- 'ऐसा क्यों हुआ?' कई बार माता-पिता भी कारण तलाशने लगते हैं- क्या शिक्षक ने पक्षपात किया? क्या बच्चे ने पर्याप्त मेहनत नहीं की? धीरे-धीरे यह सोच खुद को दोष देने की आदत में बदल सकती है, जिससे उदासी, गुस्सा, निराशा और आत्मसम्मान में कमी आने लगती है। बेहतर होगा कि दोष तलाशने के बजाय बच्चे का ध्यान भविष्य की ओर मोड़ा जाए। उससे बात करें कि आगे कौन-से अवसर उसका इंतजार कर रहे हैं, वह कौन-से नए लक्ष्य बना सकता है और इस अनुभव से उसने क्या सीखा। यदि आप बच्चे को यह बात समझाएंगे, तो वह अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से समझ पाएगा। जैसे किसी शारीरिक घाव को भरने में समय लगता है, वैसे ही भावनात्मक चोट को भी भरने के लिए समय चाहिए।