नारी डेस्क : बिहार में एक ऐसा मंदिर है, जहां देवी की कोई बड़ी प्रतिमा नहीं है। यहां सदियों से एक पवित्र पिंड को देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। इतना ही नहीं, सूर्यास्त के बाद मंदिर और आसपास के जंगल में लोगों के जाने पर भी रोक रहती है। स्थानीय मान्यता है कि रात के समय मां वन देवी स्वयं यहां भ्रमण करती हैं, इसलिए अंधेरा होने के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और पुजारी भी वहां नहीं रुकते। अब इस रहस्यमयी मंदिर की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। इसकी वजह सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म ‘The Vvaan: Force of the Forrest’ है, जिसकी कहानी बिहार के वन देवी मंदिर और इससे जुड़ी लोककथाओं से प्रेरित बताई जा रही है। आइए जानते हैं इस मंदिर की मान्यताओं, इतिहास और इससे जुड़ी दिलचस्प कहानी के बारे में।
पटना के पास कहां है मां वन देवी मंदिर?
मां वन देवी मंदिर बिहार के बिहटा इलाके के पास स्थित बताया जाता है। यह अमहारा, रघोपुर और कंचनपुर गांवों के आसपास के क्षेत्र में है और पटना से इसकी दूरी करीब 35 किलोमीटर बताई जाती है। मंदिर की सबसे खास बात यहां देवी का स्वरूप है। यहां किसी देवी की पारंपरिक मूर्ति नहीं, बल्कि एक पवित्र पिंड की पूजा की जाती है।
मंदिर में मूर्ति नहीं, पिंड की होती है पूजा
स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह इलाका कभी घने जंगल से घिरा हुआ था। जंगल के बीच एक स्थान पर पिंड स्थापित किया गया था, जिसकी पूजा धीरे-धीरे आसपास के लोगों ने शुरू कर दी। समय के साथ यह स्थान वन देवी के नाम से प्रसिद्ध हो गया। स्थानीय दावों के अनुसार, मंदिर का इतिहास करीब 400 साल पुराना माना जाता है। हालांकि, मंदिर की प्राचीनता से जुड़े दावों को लेकर अलग-अलग स्थानीय विवरण मिलते हैं।
मां विंध्यवासिनी से जुड़ी है लोककथा
वन देवी मंदिर से जुड़ी एक लोककथा का संबंध मां विंध्यवासिनी से भी बताया जाता है। कहा जाता है कि रघोपुर के रहने वाले विद्यानंद मिश्रा मां विंध्यवासिनी के भक्त थे और नियमित रूप से विंध्याचल जाकर देवी की पूजा करते थे। उम्र बढ़ने के साथ जब उनके लिए इतनी दूर जाना मुश्किल हुआ, तो लोककथा के अनुसार एक दिन देवी ने उन्हें सपने में दर्शन दिए। मान्यता है कि देवी ने उन्हें अपने पवित्र पिंड का एक हिस्सा उनके क्षेत्र में ले जाकर स्थापित करने का निर्देश दिया। इसके बाद विद्यानंद मिश्रा पिंड को अपने गांव के पास जंगल में लेकर आए और एक छोटी-सी झोपड़ी में उसे स्थापित कर पूजा शुरू की। चूंकि पिंड जंगल के बीच स्थापित किया गया था, इसलिए बाद में देवी को वन देवी यानी जंगल की देवी के नाम से जाना जाने लगा।
कब बना वन देवी मंदिर?
स्थानीय और मीडिया रिपोर्ट्स में मंदिर के वर्तमान स्वरूप से जुड़े अलग-अलग विवरण मिलते हैं। एक प्रचलित विवरण के मुताबिक, 1958 में संत भगवान दास त्यागी अमहारा में एक यज्ञ के लिए आए थे। उनके आने के बाद पिंड के आसपास मंदिर निर्माण की दिशा में काम शुरू हुआ। इसके बाद 12 फरवरी 1997 को मंदिर के निर्माण और विकास से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाया गया। आज यहां मंदिर का ढांचा मौजूद है, लेकिन देवी की पारंपरिक मूर्ति के बजाय पवित्र पिंड की ही पूजा की जाती है।
रात होते ही कौन देता है मंदिर में पहरा?
यही वन देवी मंदिर से जुड़ी सबसे रहस्यमयी मान्यता है। कहा जाता है कि सूर्यास्त के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इसके बाद पुजारी भी वहां से चले जाते हैं और रात में मंदिर के भीतर कोई नहीं रहता। आसपास के जंगल में भी लोगों के जाने पर रोक रहती है। स्थानीय मान्यता है कि रात के समय मां वन देवी स्वयं मंदिर और जंगल के आसपास भ्रमण करती हैं। इसी वजह से सूर्यास्त के बाद यहां लोगों के प्रवेश की अनुमति नहीं होती। हालांकि, यह बात धार्मिक और स्थानीय मान्यता पर आधारित है। इसे किसी वैज्ञानिक प्रमाण के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
‘The Vvaan’ से क्यों जुड़ रहा है मंदिर?
वन देवी मंदिर की चर्चा अब सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म ‘The Vvaan: Force of the Forrest’ के कारण भी हो रही है। फिल्म की कहानी को बिहार के वन देवी मंदिर और इससे जुड़ी लोककथाओं से प्रेरित बताया गया है। खासतौर पर सूर्यास्त के बाद जंगल में प्रवेश की मनाही और रात के समय मंदिर से जुड़ी रहस्यमयी मान्यताएं फिल्म की कहानी से जुड़ी बताई जा रही हैं। इसी वजह से फिल्म की रिलीज से पहले लोग इस वास्तविक मंदिर और उसकी लोककथाओं के बारे में जानने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
मंदिर से जुड़ी खास बातें
यहां देवी की पारंपरिक मूर्ति नहीं है।
पवित्र पिंड को देवी का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है।
मंदिर से जुड़ी लोककथा मां विंध्यवासिनी से जोड़ी जाती है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, मंदिर का इतिहास कई सदियों पुराना है।
सूर्यास्त के बाद मंदिर और आसपास के जंगल में प्रवेश की मनाही बताई जाती है।
रात में पुजारी मंदिर में नहीं रुकते।
रात में मां वन देवी के भ्रमण करने की बात स्थानीय मान्यता का हिस्सा है।
वन देवी मंदिर कैसे पहुंचें?
अगर आप पटना से वन देवी मंदिर जाना चाहती हैं, तो सड़क मार्ग से बिहटा की ओर जा सकती हैं। मंदिर पटना से करीब 35 किलोमीटर दूर बताया जाता है।
ट्रेन से: बिहटा रेलवे स्टेशन इस क्षेत्र के नजदीकी स्टेशनों में से एक है। पटना जंक्शन से भी सड़क मार्ग के जरिए बिहटा पहुंचा जा सकता है।
हवाई मार्ग से: पटना का जय प्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नजदीकी प्रमुख एयरपोर्ट है। यहां से बिहटा सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है।
नोट: मंदिर की प्राचीनता, लोककथा और रात में देवी के भ्रमण जैसी बातें स्थानीय मान्यताओं और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं। इन्हें ऐतिहासिक या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।