
नारी डेस्क : ओडिशा के पुरी में निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा दुनिया के सबसे बड़े और प्राचीन धार्मिक उत्सवों में से एक है। हर वर्ष भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के लिए तीन नए रथ तैयार किए जाते हैं। इन रथों की सबसे खास बात यह है कि इन्हें सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार विशेष प्रकार की नीम की पवित्र लकड़ी, जिसे 'दारु' कहा जाता है, से बनाया जाता है।
किस लकड़ी से बनता है भगवान जगन्नाथ का रथ?
रथ निर्माण के लिए साधारण लकड़ी का उपयोग नहीं किया जाता। परंपरा के अनुसार शुभ लक्षणों वाले, स्वस्थ और परिपक्व नीम (दारु) के पेड़ों का चयन किया जाता है। इन पेड़ों की पहचान विशेष धार्मिक नियमों के आधार पर मंदिर प्रशासन और पारंपरिक सेवायतों की देखरेख में की जाती है।

कब शुरू होता है रथ निर्माण?
रथों के लिए लकड़ी का चयन बसंत पंचमी के आसपास शुरू हो जाता है, जबकि अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर 'रथ अनुकूल' अनुष्ठान के साथ रथ निर्माण का कार्य प्रारंभ होता है। इसके बाद पारंपरिक कारीगर कई सप्ताह तक लगातार काम करके तीनों विशाल रथ तैयार करते हैं।
क्यों नहीं लगती एक भी कील?
भगवान जगन्नाथ के रथों की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि इनके निर्माण में लोहे की कीलों या अन्य धातु का प्रयोग नहीं किया जाता। लकड़ी के विभिन्न हिस्सों को पारंपरिक जोड़ाई तकनीक और लकड़ी के खूंटों की मदद से जोड़ा जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उसी विधि का पालन किया जाता है।

हर साल नए रथ क्यों बनाए जाते हैं?
रथ यात्रा के लिए हर वर्ष तीनों रथ नए बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष, भगवान बलभद्र का तालध्वज और देवी सुभद्रा का दर्पदलन (देवदलन) रथ हर साल नए स्वरूप में तैयार किया जाता है। यह परंपरा रथ यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक मानी जाती है।
छेरा पहंरा की अनोखी परंपरा
रथ तैयार होने के बाद पुरी के गजपति महाराज 'छेरा पहंरा' अनुष्ठान करते हैं। इस दौरान वे सोने की झाड़ू से रथों और मार्ग की प्रतीकात्मक सफाई करते हैं। यह परंपरा इस बात का संदेश देती है कि भगवान के सामने सभी समान हैं, चाहे वह राजा हो या सामान्य भक्त।
रथ खींचना क्यों माना जाता है शुभ?
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथों को खींचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि रथ खींचने का सौभाग्य प्राप्त होना अत्यंत पुण्यदायी होता है और इससे भगवान का विशेष आशीर्वाद मिलता है।