नारी डेस्क: स्टेम सेल थेरेपी को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सख्त रुख अपनाया है। मंत्रालय ने राज्यों और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि ऐसी बीमारियों या स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज के लिए स्टेम सेल थेरेपी देने वाले डॉक्टरों और क्लिनिकल संस्थानों पर कार्रवाई की जाए, जिनके लिए इस उपचार की प्रभावशीलता अभी तक साबित नहीं हुई है या जिन्हें नियमित इलाज के तौर पर मंजूरी नहीं मिली है। मंत्रालय ने साफ किया है कि स्टेम सेल थेरेपी का इस्तेमाल तय वैज्ञानिक और नियामकीय व्यवस्था के तहत ही किया जा सकता है। बिना जरूरी मंजूरी के इस थेरेपी को मरीजों को देना, उसका प्रचार करना या ऐसे उपचार को नियमित इलाज के तौर पर पेश करना डॉक्टरों के लिए पेशेवर कार्रवाई का कारण बन सकता है।
डॉक्टरों और क्लिनिकल संस्थानों पर अलग-अलग कार्रवाई का प्रावधान
स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देशों के मुताबिक, अगर कोई मेडिकल प्रैक्टिशनर निर्धारित नियमों के बाहर जाकर स्टेम सेल थेरेपी देता है, तो उसके खिलाफ पेशेवर आचार नियमों के तहत कार्रवाई हो सकती है। वहीं, संबंधित क्लिनिकल संस्थान पर लागू कानून और राज्य के नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। Clinical Establishments Act के तहत क्लिनिकल संस्थानों के पंजीकरण और नियमन का प्रावधान है। हालांकि, यह कानून पूरे देश में एक समान तरीके से लागू नहीं है। स्वास्थ्य मंत्रालय की आधिकारिक सूची के मुताबिक, फिलहाल 19 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इसके तहत शामिल हैं, जिनमें हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, सिक्किम, तेलंगाना और उत्तराखंड जैसे राज्य शामिल हैं। इसलिए किसी संस्थान के खिलाफ कार्रवाई किस कानून के तहत होगी, यह संबंधित राज्य और वहां लागू नियमों पर भी निर्भर करेगा।

किन बीमारियों में स्टेम सेल थेरेपी इस्तेमाल की जा सकती है?
स्टेम सेल थेरेपी को हर बीमारी का इलाज नहीं माना जा सकता। स्वास्थ्य मंत्रालय और संबंधित नियामकीय व्यवस्था के तहत नियमित क्लिनिकल इस्तेमाल के लिए केवल निर्धारित बीमारियों और स्थितियों को शामिल किया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के दस्तावेजों में स्टेम सेल थेरेपी से जुड़ी स्वीकृत स्थितियों की सूची दी गई है। इनमें कुछ गंभीर रक्त संबंधी बीमारियां और कैंसर शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर एक्यूट मायलॉयड ल्यूकेमिया, कुछ प्रकार के लिम्फोमा और मल्टीपल मायलोमा जैसी स्थितियां इसमें आती हैं। कुछ अन्य गंभीर रक्त संबंधी और प्रतिरक्षा से जुड़ी स्थितियों में भी निर्धारित परिस्थितियों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी भी बीमारी के मरीज को स्टेम सेल थेरेपी दी जा सकती है। उपचार का इस्तेमाल संबंधित बीमारी, स्वीकृत संकेत और निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
ऑटिज्म के इलाज के लिए क्या है नियम
स्टेम सेल थेरेपी को लेकर हाल में सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण मामला भी सामने आया था, जिसमें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर यानी ASD के इलाज का मुद्दा शामिल था। National Medical Commission ने 5 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट के 30 जनवरी 2026 के फैसले से संबंधित आदेश अपनी वेबसाइट पर जारी किया है स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज के मुताबिक, नियमित इलाज के तौर पर स्टेम सेल थेरेपी केवल मंत्रालय द्वारा निर्धारित स्वीकृत स्थितियों में ही दी जा सकती है। ASD के मामले में इसे सामान्य क्लिनिकल प्रैक्टिस के तौर पर इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। अगर इस क्षेत्र में स्टेम सेल थेरेपी पर शोध किया जा रहा है, तो उसे निर्धारित क्लिनिकल ट्रायल और नियामकीय मंजूरी की प्रक्रिया के तहत ही किया जाना चाहिए।
बिना मंजूरी इलाज या प्रचार भी पड़ सकता है भारी
NMC ने भी स्टेम सेल थेरेपी को लेकर मेडिकल प्रोफेशनल्स के लिए नियमों का पालन करने पर जोर दिया है। आधिकारिक दस्तावेजों में कहा गया है कि स्वीकृत स्थितियों से बाहर स्टेम सेल थेरेपी का इस्तेमाल, मरीजों के लिए इसे लिखना या इसका प्रचार-प्रसार पेशेवर आचार से जुड़ा मामला बन सकता है।इसका मकसद ऐसे उपचारों के इस्तेमाल को रोकना है, जिनकी किसी खास बीमारी के लिए प्रभावशीलता और सुरक्षा पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाणों से स्थापित नहीं हुई है।

मरीजों को भी बरतनी चाहिए सावधानी
स्टेम सेल थेरेपी का नाम सुनकर कई मरीज और उनके परिवार इसे हर तरह की बीमारी के इलाज के रूप में समझ सकते हैं। ऐसे में किसी भी क्लिनिक या डॉक्टर से इलाज कराने से पहले यह पता करना जरूरी है कि जिस बीमारी के लिए थेरेपी दी जा रही है, उसके लिए वह उपचार नियामकीय तौर पर स्वीकृत है या नहीं। अगर कोई संस्थान किसी गंभीर बीमारी को ठीक करने का दावा करते हुए स्टेम सेल थेरेपी की पेशकश कर रहा है, तो मरीज को उपचार की मंजूरी, डॉक्टर की योग्यता, क्लिनिकल ट्रायल की स्थिति और संबंधित नियामकीय अनुमति के बारे में जानकारी जरूर लेनी चाहिए।
स्वास्थ्य मंत्रालय का फोकस वैज्ञानिक और नियामकीय नियमों पर
स्वास्थ्य मंत्रालय की एडवाइजरी का मुख्य उद्देश्य राज्यों और जिला स्तर के अधिकारियों को स्टेम सेल रिसर्च और थेरेपी से जुड़े मौजूदा नियमों की जानकारी देना और उनका पालन सुनिश्चित करना है। आधिकारिक निर्देशों के मुताबिक, स्टेम सेल थेरेपी का इस्तेमाल वैज्ञानिक प्रमाण, निर्धारित चिकित्सा मानकों और जरूरी नियामकीय मंजूरी के अनुसार ही किया जाना चाहिए। किसी ऐसी बीमारी के लिए इसे नियमित इलाज के रूप में देना, जिसके लिए इसकी प्रभावशीलता स्थापित या स्वीकृत नहीं है, नियमों के दायरे में कार्रवाई का कारण बन सकता है।