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पति-बेटों को खोने के बाद भी नहीं टूटीं, ऐसे बनीं देश की राष्ट्रपति- द्रौपदी मुर्मू

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 26 Mar, 2026 04:33 PM
पति-बेटों को खोने के बाद भी नहीं टूटीं, ऐसे बनीं देश की राष्ट्रपति- द्रौपदी मुर्मू

 नारी डेस्क: भारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की कहानी सिर्फ राजनीति में सफलता की नहीं, बल्कि हिम्मत, दर्द और संघर्ष की मिसाल है। उनका जीवन यह सिखाता है कि कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न हों, अगर इंसान हार न माने तो वह इतिहास रच सकता है। द्रौपदी मुर्मू का जन्म ओडिशा के मयूरभंज जिले के उपरबेड़ा गांव में एक संथाली आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके पिता बिरंची नारायण टुडू एक साधारण किसान थे। बचपन से ही उन्होंने आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना किया। उनका बचपन का नाम ‘दुर्गी टुडू’ था, जिसे बाद में उनके शिक्षक ने बदलकर ‘द्रौपदी’ कर दिया।

परिवार की खुशियां और अचानक आए दुख

द्रौपदी मुर्मू की शादी श्याम चरण मुर्मू से हुई थी। उनके तीन बच्चे थे दो बेटे और एक बेटी। उनका जीवन सामान्य तरीके से चल रहा था, लेकिन अचानक दुखों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जिसने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया।

एक के बाद एक अपनों को खोने का दर्द

साल 2009 में उनके बड़े बेटे का सिर में गंभीर चोट लगने के कारण निधन हो गया। यह उनके जीवन का पहला बड़ा झटका था। इसके बाद साल 2013 में उनके छोटे बेटे की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। साल 2014 उनके लिए सबसे कठिन समय साबित हुआ। उसी साल उन्होंने अपनी मां, पति और भाई तीनों को खो दिया। कुछ ही वर्षों में उन्होंने अपने सबसे करीबी लोगों को खो दिया, जिससे कोई भी इंसान पूरी तरह टूट सकता था।

अकेलेपन के बाद भी नहीं मानी हार

लगातार दुखों के कारण साल 2015 तक वह पूरी तरह अकेली पड़ गईं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने दर्द को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसे अपनी ताकत बना लिया। उनकी बेटी इतिश्री मुर्मू आज उनके साथ खड़ी हैं और एक बैंक में काम करती हैं। उनके दामाद गणेश हेम्ब्रम एक रग्बी खिलाड़ी हैं।

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शिक्षक से राष्ट्रपति बनने तक का सफर

द्रौपदी मुर्मू ने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षिका के रूप में की थी। इसके बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा और अपनी मेहनत के दम पर आगे बढ़ती चली गईं। वह ओडिशा में मंत्री रहीं और बाद में झारखंड की राज्यपाल भी बनीं। अपने अनुभव, सादगी और समर्पण के बल पर उन्होंने देश की सर्वोच्च संवैधानिक पद तक का सफर तय किया और भारत की राष्ट्रपति बनीं।

दर्द को ताकत बनाकर रचा इतिहास

द्रौपदी मुर्मू की कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में दुख और कठिनाइयां हर किसी के हिस्से में आती हैं, लेकिन उनसे हार मान लेना ही असली हार होती है। उन्होंने अपने जीवन के गहरे दुखों को पीछे छोड़कर देश की सेवा को चुना और एक नई पहचान बनाई। द्रौपदी मुर्मू की जिंदगी इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि अगर इंसान में हिम्मत और दृढ़ संकल्प हो, तो वह किसी भी मुश्किल को पार कर सकता है। दर्द अगर हिम्मत से झेला जाए, तो वही दर्द इतिहास बना देता है।  

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