नारी डेस्क: अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर अब यूनिवर्सिटीज पर भी सख्ती शुरू कर दी है। अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन ने 30 यूनिवर्सिटीज को अपने विदेशी संस्थानों के साथ हुए शैक्षणिक समझौतों की समीक्षा करने को कहा है। खासतौर पर चीन की यूनिवर्सिटीज और सैन्य प्रशिक्षण संस्थानों के साथ उनकी साझेदारी पर नजर रखी जाएगी। पेंटागन ने यूनिवर्सिटीज को इस पूरी जांच के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। सरकार का कहना है कि अगर किसी साझेदारी से अमेरिका की सुरक्षा या सरकारी फंड से होने वाली रिसर्च को खतरा नजर आता है, तो ऐसे समझौतों को खत्म करना पड़ सकता है। ऐसा नहीं करने पर संबंधित यूनिवर्सिटी की सरकारी फंडिंग भी रोकी जा सकती है।
पेंटागन ने क्यों लिया यह फैसला
अमेरिकी रक्षा विभाग का कहना है कि इस कदम का मकसद सरकारी पैसे से होने वाली रिसर्च और नई तकनीक को चोरी या गलत इस्तेमाल से बचाना है। पेंटागन को डर है कि कुछ विदेशी साझेदारियों के जरिए संवेदनशील रिसर्च और तकनीकी जानकारी दूसरे देशों तक पहुंच सकती है। पेंटागन के चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर एमिल माइकल ने कहा कि ऐसी किसी भी शैक्षणिक साझेदारी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, जिससे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है।

किन यूनिवर्सिटीज के नाम सामने आए
पेंटागन ने अभी उन 30 यूनिवर्सिटीज की पूरी सूची सार्वजनिक नहीं की है। हालांकि, एक अमेरिकी अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि इस सूची में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी MIT और जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी जैसे बड़े संस्थान शामिल हैं। इन यूनिवर्सिटीज की ओर से इस मामले पर तुरंत कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। अमेरिकी कॉलेज और यूनिवर्सिटी जगत में इस फैसले को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
यूनिवर्सिटी संगठन ने जताई चिंता
अमेरिकन काउंसिल ऑन एजुकेशन की उपाध्यक्ष सारा स्प्रीट्जर ने सरकार के इस कदम पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस तरह की घोषणा से लोगों के बीच यह संदेश जा सकता है कि संबंधित यूनिवर्सिटीज ने कुछ गलत किया है, जबकि सरकार ने अभी ऐसा कोई ठोस सबूत सार्वजनिक नहीं किया है। उनका कहना है कि विदेशी यूनिवर्सिटीज के साथ सहयोग और राष्ट्रीय सुरक्षा, दोनों के बीच सही संतुलन बनाना जरूरी है।
पहले भी 130 विदेशी संस्थानों की सूची जारी कर चुका है पेंटागन
यह पहली बार नहीं है जब पेंटागन ने विदेशी संस्थानों को लेकर चिंता जताई है। पिछले महीने अमेरिकी रक्षा विभाग ने करीब 130 विदेशी संस्थानों की एक अपडेटेड सूची जारी की थी। पेंटागन का कहना था कि इन संस्थानों की कुछ गतिविधियों से अमेरिकी सरकार के पैसे से चल रही रिसर्च और डेवलपमेंट के गलत इस्तेमाल का खतरा बढ़ सकता है। इस सूची में ज्यादातर संस्थान चीन के थे। इनमें चीन की यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ऑफ चाइना और एकेडमी ऑफ मिलिट्री मेडिकल साइंसेज जैसे संस्थान शामिल थे। इसके अलावा ईरान और रूस के कुछ संस्थानों के नाम भी इस सूची में थे।
चीन को लेकर अमेरिका की बढ़ती चिंता
ट्रंप प्रशासन लंबे समय से चीन के बढ़ते आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव को लेकर चिंता जाहिर करता रहा है। अमेरिका खासतौर पर दूसरे देशों में चीन के बढ़ते निवेश और बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर नजर रख रहा है। पनामा नहर के दोनों सिरों पर चीनी कंपनियों से जुड़े बंदरगाह, चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना के तहत होने वाले निवेश और टेलीकॉम सेक्टर में चीन की मौजूदगी भी अमेरिका की चिंता में शामिल है।

हार्वर्ड पहले से ही जांच के घेरे में
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का नाम इस मामले में खास तौर पर सामने आया है, क्योंकि यह यूनिवर्सिटी पहले से ही अमेरिकी प्रशासन की जांच का सामना कर रही है। अमेरिकी न्याय विभाग यह भी जांच कर रहा है कि क्या हार्वर्ड में चीनी दानदाताओं को ऐसे स्कॉलरशिप प्रोग्राम बनाने की अनुमति दी गई थी, जिनमें अमेरिकी छात्रों को शामिल नहीं किया गया। इसके अलावा भी हार्वर्ड से जुड़े कई मामलों की संघीय स्तर पर जांच चल रही है।
नियम नहीं माने तो फंडिंग पर असर
पेंटागन के इस आदेश का सबसे बड़ा असर यूनिवर्सिटीज की सरकारी फंडिंग पर पड़ सकता है। अगर कोई संस्थान तय समय में अपनी विदेशी साझेदारियों की समीक्षा नहीं करता या सरकार द्वारा जोखिम वाली बताई गई साझेदारी को खत्म करने से इनकार करता है, तो उसकी सरकारी मदद रोकी जा सकती है। अमेरिकी सरकार का कहना है कि उसका मकसद सरकारी पैसे से होने वाली रिसर्च और संवेदनशील तकनीक को सुरक्षित रखना है। वहीं, यूनिवर्सिटीज के लिए चुनौती यह है कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले शैक्षणिक सहयोग को जारी रखते हुए सुरक्षा से जुड़े नियमों का भी पालन करें।
फिलहाल 30 यूनिवर्सिटीज को अपनी साझेदारियों की समीक्षा के लिए दो हफ्ते का समय मिला है। अब देखना होगा कि जांच के बाद किन संस्थानों को चीन से जुड़े अपने समझौतों में बदलाव करना पड़ता है और इसका अमेरिका की यूनिवर्सिटी व्यवस्था पर कितना असर पड़ता है।