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भोले शंकर के 12 प्रतीकः शिव के आंसू से बने थे रूद्राक्ष, त्रिपुंड तिलक का जानिए महत्व

  • Edited By neetu,
  • Updated: 13 Jul, 2020 06:35 PM
भोले शंकर के 12 प्रतीकः शिव के आंसू से बने थे रूद्राक्ष, त्रिपुंड तिलक का जानिए महत्व

सावन का महीना भगवान शिव को अतिप्रिय माना जाता है। इस दौरान इनकी पूजा करने से व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है। भगवान शिव के कुछ शुभ चिन्ह बहुत ही महत्व रखते हैं। असल में इनके कुल 12 शुभ चिन्ह माने जाते है। साथ ही हर एक चिन्ह में कोई न कोई रहस्य छिपा है। ऐसे में इन प्रतीकों से शिव जी की  पहचान होती है। तो चलिए जानते है भगवान शिव के शुभ प्रतीकों के बारे में...

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शिवलिंग

शिवलिंग भगवान शिव को अतिप्रिय है। इसपर सच्चे मन से जल चढ़ाने वाले की हर मनोकामना पूरी होती है। यह शिव जी के निर्गुण, निराकार, ब्रह्म, आत्मा और ब्रह्मांडरूप का प्रतीक माना जाता है। बात अगर वायु पुराण की करें तो उसमें कहा गया है कि सारी दुनिया जिसमें लीन हो दोबारा प्रकट होती है उसे शिवलिंग कहा जाता है। 

त्रिशूल

भगवान शिव के पास हमेशा त्रिशुल रहता है। यह मनुष्य को मुख्य 3 तरह के कष्ट दैनिक, दैविक और भौतिक से मुक्ति दिलाने का काम करता है। इस पवित्र त्रिशूल में सत, रज और तम आदि तीनोें शक्तियां पाई जाती है। यह दुनिया का पालन करने के साथ उसके संरक्षण का काम करता है। इसे महाकालेश्वर के 3 कालों यानि वर्तमान, भूत, भविष्य का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही त्रिशुल को स्वपिंड, ब्रह्मांड और शक्ति का एक साथ स्थापित होना माना जाता है। 

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भस्म 

भगवान शिव अपने शरीर पर भस्म लगाते है। इसे आकर्षण, मोह, अंहकार आदि से मुक्ति मिलने का प्रतीक माना जाता है। पूरे देश में सिर्फ उज्जैन में स्थित महाकाल मंदिर में शिव की भस्म से आरती की जाती है। इसमें श्मशान की भस्म या राख को इस्तेमाल होता है।

रुद्राक्ष 

मान्याताओं के अनुसार रूद्राक्ष भगवान शिव के आंसू से उत्पन्न हुआ था। पवित्रता का प्रतीक माना जाने वाला रूद्राक्ष की माला से जाप करने से शिव जी की असीम कृपा मिलती है। धार्मिक व पौराणिक ग्रंथों के अनुसार धरती पर 21 मुख तक रुद्राक्ष है। मगर इस समय तक 14 मुखी रुद्राक्ष ही पाएं गए। रूद्राक्ष के मनको की माला जपने या इसे पहनने से ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होने के साथ शरीर में पॉजीटिव एनर्जी का संचार होता है। 

त्रिपुंड तिलक

माथे पर तिलक से 3 लंबी धारियां खींचने को त्रिपुंड तिलक कहा जाता है। यह त्रिगुण, सतोगुण, रजोगुण और तपोगुण का प्रतीक माना जाता है। इसकी धारियों के बिल्कुल बीच शक्ति का प्रतीक कहे जाने वाला लाल रंग का गोल तिलक बनाया जाता है। इसे लगाने से मन को शांति मिलने के साथ एकाग्रता शक्ति बढ़ती है। मगर आम इंसान को लाल रंग की जगह सिर्फ 3 धारियों वाला तिलक लगाना चाहिए। 

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डमरू 

शिव का डमरू संगीत को उत्पन्न करने वाला होता है। इसे संगीत का पिता का भी कहा जाता है। डमरू की उत्पत्ति से पहले दुनिया में कोई भी नाचना, गाना बिल्कुल भी नहीं जाता था। यह एक ऐसी ध्वनि है जो ब्रह्मांड में निरंतर गुंजती है इसे  'ॐ' कहा जाता है। संगीत के बीच में मौजूद केंद्रीय स्वर नाद कहलाता है। इसी से ही वाणी के चारों रूपों पर, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी की सरचना माना जाता है। 

कमंडल 

शिव जी का कमंडल में पाएं जाने वाला जल अमृत के समान माना जाता है। यह संत और योगी द्वारा धारण किया जाता है। 

हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म

शिव जी अपने आसन के तौर हाथी और सेर की खाल का इस्तेमाल करते है। असल में हस्ती अभिमान और व्याघ्र हिंसा का प्रतीक कहलाता है। ऐसे में शिवजी इन दोनों अपने शरीर में धारण कर इन्हें दबाकर रखते है। बाघ को शक्ति और सत्ता का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव इस पर बैठकर और इसकी खाल को पहनकर यह दर्शाते है कि शिव जी से ऊपर कोई शक्ति नहीं हैं। 

चन्द्रमा 

शिव को सोम यानि चंद्रमा भी कहा जाता है। उनके द्वारा इसे धारण करने से मन स्थिर रखने का प्रतीक माना जाता है। धरती पर स्थापित पहला सोमनाथ भी चंद्रदेव द्वारा ही रखा गया था। इसके अलावा शिव जी के सभी त्योहारों का संबंध चंद्रमा के साथ माना जाता है। बात अगर मध्य एशिया की करें तो में यह इस जाति के लोग इसे अपने ध्वज पर बनाते है। इतिहास में चंगेज खान के झंडे पर अर्द्धचन्द्र बना होता था। 

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शिव कुंडल 

हिंदु धर्म में कान को छिदवाया जाता है। प्राचीन समय में शैव, शाक्त और नाथ संप्रदाय में दीक्षा लेने के समय बालकों को कान छिदवाकर कुंडल धारण करने पड़ते थे। बात अगर भगवान की प्रतिमाओं की करें तो वहां भी उनके कान में कुंडल पहने दिखाई देते है। भगवान शिव, विष्णु सभी देवताएं कानों में कुंडल धारण करते है। 

जटाएं और गंगा

भगवान शिव अंतरिक्ष के देवता माने जाते है। इनके द्वारा धारण की गई जटाएं वायुमंडल की प्रतीक मानी जाती है। साथ ही इस बात को सभी जानते है कि शिव जी ने अपनी जटाओं पर गंगा नदी को धारण किया हुआ था। इसी कारण इनको गंगाजल चढ़ाया जाता है। जब स्वर्ग से धरती पर गंगा को लाने की बात हुई थी तब भगवान शिव जी ने ही गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर उतारा था। नहीं तो गंगा नदी पाताल में समा जानी थी। 

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नंदी और नाग 

शिव जी के वाहन नंदी उनको अति प्रिय है। इसे वृषभ भी कहा जाता है जिसका अर्थ है धर्म। वेद में धर्म को चार पैरों वाला यानि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष माना जाता है। भगवान शिव इन्हीं चार पैरों वाले नंदी की सवारी करते है। यह शिव जी को प्रिय गणों में से एक होने के साथ धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना करने वाले भी माने जाते है। उसी तरह शिव जी अपने गले पर नाग को धारण करने वाले माने जाते है। वे हिमालय पर्वत में रहते है, जिसे नागों का गढ़ माना जाता है। ऐसे में नाग कुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे। नागों के साथ गहरा संबंध होने से महादेव का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग इसी नाम से प्रसिद्ध है। इसीलिए हर साल नागपंचमी पर नागों की पूजा कर उन्हें दूध पिलाने की प्रथा है। ऐसे में शिव जी के गले में लिपटा हुआ नाग कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। 

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