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पहाड़ों से गायब हो रहीं Chyawanprash में इस्तेमाल होने वाली जड़ी-बूटियां!

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 12 May, 2026 09:44 AM
पहाड़ों से गायब हो रहीं Chyawanprash में इस्तेमाल होने वाली जड़ी-बूटियां!

नारी डेस्क: आयुर्वेद में च्यवनप्राश को सेहत और शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत बढ़ाने वाला बेहद खास औषधि माना जाता है। लेकिन चिंता की बात यह है कि इसे बनाने में इस्तेमाल होने वाली कई दुर्लभ हिमालयी जड़ी-बूटियां अब धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं। वन विभाग की हालिया रिसर्च में सामने आया है कि अष्टवर्ग की आठ अहम औषधीय जड़ी-बूटियां हिमालयी इलाकों से तेजी से गायब हो रही हैं। इनमें काकोली, क्षीर काकोली, जीवक और ऋषभक जैसी जड़ी-बूटियां सबसे ज्यादा संकट में हैं। वहीं मेदा, महामेदा, रिद्धि और वृद्धि जैसी प्रजातियों की संख्या भी लगातार कम होती जा रही है।

हिमालय की ऊंची पहाड़ियों में पाई जाती हैं ये खास जड़ी-बूटियां

ये दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियां हिमालय के उन इलाकों में उगती हैं, जो समुद्र तल से करीब 2500 से 4500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलता मौसम, बढ़ता तापमान और जरूरत से ज्यादा तोड़ाई इनके लिए बड़ा खतरा बन गया है। बाजार में मांग बढ़ने की वजह से लोग बड़ी मात्रा में इन जड़ी-बूटियों को इकट्ठा कर रहे हैं, जिससे इन्हें दोबारा प्राकृतिक रूप से उगने का पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा। वन विभाग की अनुसंधान शाखा से जुड़ी रिसर्च एसोसिएट ऋतु बुधाड़ी के मुताबिक आयुर्वेद में अष्टवर्ग की जड़ी-बूटियों को शरीर को ताकत देने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और लंबे समय तक स्वास्थ्य बनाए रखने वाली महत्वपूर्ण औषधियों के रूप में देखा जाता है। च्यवनप्राश के अलावा कई टॉनिक और रोग प्रतिरोधक दवाओं में भी इनका उपयोग किया जाता है।

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पूरे हिमालयी क्षेत्र में बढ़ रहा संकट

विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे हिमालयी राज्यों में भी इन दुर्लभ जड़ी-बूटियों की संख्या लगातार घट रही है। पहले जिन इलाकों में काकोली, क्षीर काकोली और जीवक आसानी से मिल जाया करती थीं, वहां अब इनका मिलना बेहद मुश्किल होता जा रहा है।

दुर्लभ जड़ी-बूटियों को बचाने में जुटा वन विभाग

इन खास औषधीय पौधों को बचाने के लिए वन विभाग ने संरक्षण अभियान शुरू कर दिया है। हर्षिल स्थित वन अनुसंधान शाखा की नर्सरी में इन जड़ी-बूटियों के पौधे तैयार किए जा रहे हैं। विभाग की कोशिश है कि पौधों को तैयार करने के बाद उन्हें फिर से उनके प्राकृतिक वातावरण में लगाया जाए, ताकि इन दुर्लभ प्रजातियों को खत्म होने से बचाया जा सके।

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जानिए किन समस्याओं में काम आती हैं ये जड़ी-बूटियां

काकोली: काकोली का इस्तेमाल शरीर की कमजोरी दूर करने, थकान कम करने, फेफड़ों को मजबूत बनाने और शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने में किया जाता है।

क्षीर काकोली: यह जड़ी-बूटी फेफड़ों और दिल से जुड़ी समस्याओं में फायदेमंद मानी जाती है। साथ ही इसे प्रजनन क्षमता बेहतर करने में भी उपयोग किया जाता है।

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जीवक: जीवक का उपयोग कमजोरी, बुखार और शारीरिक थकान दूर करने के लिए किया जाता है। आयुर्वेद में इसे शरीर को ऊर्जा देने वाली औषधि माना जाता है।

ऋषभक: ऋषभक शरीर को ताकत देने, सांस संबंधी परेशानियों को कम करने और इम्यूनिटी मजबूत करने में मददगार मानी जाती है।

महामेदा: महामेदा को मानसिक तनाव कम करने, शरीर में ऊर्जा बढ़ाने और ताकत देने वाली महत्वपूर्ण जड़ी-बूटी माना जाता है।

समय रहते संरक्षण नहीं हुआ तो बढ़ सकता है संकट

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन जड़ी-बूटियों को बचाने के लिए जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में कई प्रजातियां पूरी तरह खत्म हो सकती हैं। इसका असर सिर्फ हिमालय की जैव विविधता पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि आयुर्वेद में इस्तेमाल होने वाली कई जरूरी औषधियों पर भी असर देखने को मिल सकता है।
  

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