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दोनों हाथ नहीं थे, दुनिया ने कमजोर समझा, आज अफसर हैं Mouli पैरों से करती हैं काम

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 17 Jun, 2026 02:47 PM
दोनों हाथ नहीं थे, दुनिया ने कमजोर समझा, आज अफसर हैं Mouli  पैरों से करती हैं काम

 नारी डेस्क: कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों, तो मुश्किलें भी रास्ता बन जाती हैं। इस बात को सच कर दिखाया है महाराष्ट्र की रहने वाली Mouli Adukar ने। जन्म से दोनों हाथ न होने के बावजूद उन्होंने कभी अपनी परिस्थितियों को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। आज वे न सिर्फ आत्मनिर्भर हैं, बल्कि सरकारी अधिकारी बनकर हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।माऊली की कहानी यह बताती है कि जीवन में चुनौतियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर परिवार का साथ और खुद पर भरोसा हो, तो मंजिल दूर नहीं रहती।

जन्म से नहीं थे दोनों हाथ, समाज ने माना दुर्भाग्य

महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के पोर्ले गांव में जन्मी माऊली आडूकर जब इस दुनिया में आईं, तो उनके दोनों हाथ नहीं थे। परिवार के लिए यह स्थिति भावनात्मक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण थी। समाज के कई लोगों ने उनके भविष्य को लेकर नकारात्मक बातें कहीं। कुछ लोगों ने तो परिवार को उन्हें बोझ मानने तक की सलाह दी। लेकिन माऊली के परिवार ने हार मानने के बजाय उनका साथ देने का फैसला किया।

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पिता और दादी बने सबसे बड़ी ताकत

जब दुनिया सवाल उठा रही थी, तब माऊली के पिता और दादी उनके लिए सबसे मजबूत सहारा बनकर खड़े रहे। उनकी दादी ने बचपन से ही उन्हें आत्मविश्वास दिया और यह महसूस कराया कि वे किसी से कम नहीं हैं। पिता ने भी हर परिस्थिति में उनका हौसला बढ़ाया और सिखाया कि जिंदगी में हालात चाहे जैसे हों, उनका डटकर सामना करना चाहिए।

पैरों को बनाया अपनी ताकत

माऊली ने अपनी कमी को कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने पैरों को ही अपना सहारा बना लिया और धीरे-धीरे उनसे हर काम करना सीख लिया। आज वे पैरों से लिखती हैं, कंप्यूटर चलाती हैं, खाना बनाती हैं और यहां तक कि हार्मोनियम भी बजा लेती हैं। सुई में धागा पिरोने जैसे बारीक काम भी वे आसानी से कर लेती हैं। उनकी यह क्षमता न सिर्फ आत्मनिर्भरता की मिसाल है, बल्कि यह साबित करती है कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसका संकल्प होता है।

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स्कूल ने एडमिशन देने से किया था इनकार

माऊली के जीवन में ऐसे भी दिन आए, जब एक स्कूल ने उनकी दिव्यांगता की वजह से उन्हें दाखिला देने से मना कर दिया। यह पल किसी भी बच्चे और उसके परिवार के लिए निराशाजनक हो सकता था। लेकिन उसी समय एक शिक्षक उनके साथ खड़े हुए और उनकी जिम्मेदारी उठाई। बाद में उन्होंने विशेष संस्थान में रहकर पढ़ाई की, जहां हॉस्टल जीवन ने उन्हें और अधिक आत्मनिर्भर बनाया। अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने दसवीं की परीक्षा में 75 प्रतिशत अंक हासिल किए और साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी शारीरिक सीमा की मोहताज नहीं होती।

पैरों से सीखा कंप्यूटर, पूरी की मास्टर्स डिग्री

शिक्षा के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ। उन्होंने गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक से कंप्यूटर डिप्लोमा किया और पैरों की मदद से कंप्यूटर चलाना सीखा। इसके बाद उन्होंने कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया और फिर मनोविज्ञान में मास्टर्स डिग्री हासिल की। लेकिन माऊली के सपने यहीं खत्म नहीं हुए। माऊली का सपना प्रशासनिक सेवा में जाने का था। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की और कठिन परिश्रम के बल पर सफलता हासिल की। उन्होंने बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी Brihanmumbai Municipal Corporation की परीक्षा पास की और आज वे असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं। हालांकि माऊली का कहना है कि यह उनकी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है। वे आगे भी प्रशासनिक सेवा में जाने का सपना पूरा करने के लिए तैयारी कर रही हैं।

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संघर्ष से सफलता तक का सफर

माऊली आडूकर की कहानी उन लोगों के लिए एक संदेश है, जो मुश्किल परिस्थितियों में हार मान लेते हैं। उनका जीवन यह सिखाता है कि सीमाएं शरीर में नहीं, बल्कि सोच में होती हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि अगर हौसले बुलंद हों, तो बिना हाथों के भी जिंदगी की सबसे बड़ी ऊंचाइयों को छुआ जा सकता है। 

 
 

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