नारी डेस्क: अकेलेपन को अक्सर एक भावनात्मक चुनौती के तौर पर देखा जाता है, लेकिन इसका असर मानसिक सेहत से कहीं ज़्यादा हो सकता है। बढ़ते सबूत बताते हैं कि लंबे समय तक अकेलापन और सामाजिक अलगाव का दिमाग की सेहत पर गहरा असर पड़ सकता है। इससे याददाश्त, फ़ैसला लेने की क्षमता, सोचने-समझने की शक्ति और यहां तक कि लंबे समय में न्यूरोलॉजिकल नतीजों पर भी असर पड़ सकता है।

सोचने-समझने की शक्ति खो देता है इंसान
एचटी लाइफस्टाइल को दिए इंटरव्यू में एक डॉक्टर ने बताया कि- “जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक अकेलेपन का अनुभव करता है, तो मस्तिष्क अत्यधिक सतर्कता की स्थिति में रह सकता है, जिससे कोर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। समय के साथ, यह नींद की गुणवत्ता, एकाग्रता, स्मृति और मनोदशा को प्रभावित कर सकता है। कम सामाजिक संपर्क उम्र बढ़ने के साथ संज्ञानात्मक लचीलेपन और सहनशीलता को बनाए रखने के लिए आवश्यक मानसिक उत्तेजना को भी सीमित कर सकता है।”
क्या कहती है WHO की रिपोर्ट
WHO की रिपोर्ट में बताया गया कि दुनिया में हर 6 में से 1 व्यक्ति अकेलेपन का सामना कर रहा है। इतना ही नहीं, अकेलेपन और सामाजिक अलगाव की वजह से हर साल करीब 8.71 लाख लोगों की मौत हो जाती है। यानी औसतन हर घंटे लगभग 100 मौतें अकेलेपन से जुड़ी हुई मानी जाती हैं। ऐसे में WHO का कहना है कि अकेलापन सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य को नहीं, शारीरिक सेहत को भी प्रभावित करता है।

मस्तिष्क के लिए सामाजिक जुड़ाव बेहद जरूरी
डॉक्टर कहते हैं - “मस्तिष्क के लिए सामाजिक जुड़ाव उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शरीर के लिए व्यायाम। बातचीत, साझा अनुभव और रिश्ते लगातार विभिन्न संज्ञानात्मक नेटवर्क को सक्रिय करते हैं। जब ये संपर्क कम हो जाते हैं, तो मस्तिष्क को कम उत्तेजना मिलती है।” अकेलापन जीवनशैली की आदतों को प्रभावित करके तंत्रिका संबंधी स्वास्थ्य पर अप्रत्यक्ष रूप से भी असर डाल सकता है। जो लोग सामाजिक रूप से अलग-थलग महसूस करते हैं, उनमें नींद की कमी, शारीरिक गतिविधि में कमी, अस्वास्थ्यकर खान-पान की आदतें या मादक पदार्थों पर निर्भरता जैसी समस्याएं होने की संभावना अधिक होती है, ये सभी कारक मस्तिष्क के खराब स्वास्थ्य से जुड़े हैं।
डिमेंशिया का एक जोखिम कारक
डॉक्टर बताते हैं कि आज की डिजिटल दुनिया में अकेलापन तेज़ी से आम होता जा रहा है और अब इसे डिमेंशिया के एक स्वतंत्र जोखिम कारक के रूप में पहचाना जा रहा है। हालिया अध्ययनों से पता चला है कि अकेलापन मस्तिष्क में संरचनात्मक बदलाव ला सकता है, खासकर उन हिस्सों में जो याददाश्त, तर्क, सोच और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से जुड़े होते हैं। स्ट्रोक, मिर्गी, पार्किंसंस रोग, मल्टीपल स्केलेरोसिस या डिमेंशिया जैसी न्यूरोलॉजिकल स्थितियों से जूझ रहे लोगों पर इसका असर और भी ज़्यादा हो सकता है। सामाजिक अलगाव लक्षणों को और गंभीर बना सकता है, ठीक होने की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है और इलाज चलने के बावजूद बीमारी के दोबारा उभरने का जोखिम बढ़ा सकता है।
स्वास्थ्य के लिए अन्य बड़े खतरों के बराबर अकेलापन
वैज्ञानिक अध्ययनों से यह भी पता चला है कि अकेलापन मस्तिष्क के उन्हीं हिस्सों को सक्रिय करता है जो शारीरिक दर्द से जुड़े होते हैं। इससे इस बात की न्यूरोलॉजिकल व्याख्या मिलती है कि भावनात्मक तकलीफ़ शारीरिक रूप से दर्दनाक क्यों महसूस हो सकती है। लंबे समय तक अकेलेपन के नतीजे सिर्फ़ सोचने-समझने की क्षमता कम होने तक ही सीमित नहीं रहते। बल्कि यह समय से पहले मौत का खतरा 26% बढ़ जाता है। अकेलापन मोटापे और शारीरिक रूप से सक्रिय न रहने जितना ही बड़ा स्वास्थ्य जोखिम बन जाता है, और यह धूम्रपान से जुड़े खतरे के भी करीब है। विशेषज्ञों का कहना है कि अच्छी बात यह है कि अकेलापन कोई स्थायी स्थिति नहीं है और दिमाग में खुद को ढालने और बदलने की क्षमता बनी रहती है। अहम बात यह है कि विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सामाजिक संबंधों के मामले में संख्या से ज़्यादा उनकी क्वालिटी मायने रखती है।