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बीमारियों से बचना है तो  Office  के तेज AC  से बनाओ दूरी, वरना हमेशा रहेगा सिरदर्द, खांसी और थकान

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 08 Jun, 2026 05:53 PM
बीमारियों से बचना है तो  Office  के तेज AC  से बनाओ दूरी, वरना हमेशा रहेगा सिरदर्द, खांसी और थकान

नारी डेस्क: कई प्रोफेशनल्स के लिए काम का दिन एयर-कंडीशंड माहौल में शुरू और खत्म होता है। बाहर के ट्रैफ़िक, गर्मी और प्रदूषण से जूझने के बाद ठंडी हवा ताज़गी देती है। फिर भी एक्सपर्ट्स का कहना है कि घर या ऑफ़िस के अंदर की हवा अपने आप बाहर की हवा से ज्यादा सेहतमंद नहीं होती। ऑफ़िस में ज़्यादातर लोग कम से कम 8-10 घंटे बिताते हैं। हमारे जैसे गर्म और नमी वाले देश में, ऑफ़िस अक्सर एयर-कंडीशंड होते हैं जिनमें ज़्यादातर सेंट्रल यूनिट्स लगी होती हैं। हालांकि सेहत पर अंदर की हवा की क्वालिटी का क्या असर पड़ता है, इस बात को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

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ऑफ़िस के अंदर होती है ज्यादा दिक्कतें 

असल में अंदर की हवा की क्वालिटी को लेकर चिंताएं  नई नहीं हैं। "सिक बिल्डिंग सिंड्रोम" शब्द दशकों पहले एक ऐसी स्थिति को बताने के लिए बनाया गया था जिसमें लोगों को किसी बिल्डिंग के अंदर गले में जलन, सिरदर्द, खांसी, थकान और सांस लेने में तकलीफ़ जैसे लक्षण महसूस होते हैं, लेकिन बाहर निकलने पर वे बेहतर महसूस करते हैं। पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स ने इस स्थिति को पहचाना है और ऑफ़िस के माहौल में इस पर काफी स्टडी की है। US एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (EPA) का कहना है कि खराब वेंटिलेशन, अंदर मौजूद प्रदूषक और बिल्डिंग के सिस्टम का ठीक से रखरखाव न होना ऐसी शिकायतों की मुख्य वजहों में शामिल हैं। समस्या एयर कंडीशनर से नहीं है। असल दिक्कत अक्सर उस चीज़ से होती है जो सिस्टम के ज़रिए घूमती है।


इसलिए आती है दिक्कतें

कई ऑफिस बिल्डिंग्स में एनर्जी बचाने के लिए हवा को बार-बार घुमाया (रीसर्क्युलेट) जाता है। इससे बिजली तो बचती है, लेकिन हानिकारक कण भी अंदर ही फंसे रह सकते हैं।  एनर्जी बचाने के लिए अक्सर हवा को रीसर्क्युलेट किया जाता है। नमी वाली जगहों पर फंगस पनप सकती है। जिन वेंटिलेशन सर्किट की समय-समय पर सफाई नहीं होती, उनमें धूल, गंदगी और कचरा जमा हो सकता है, जो फिर वेंट के जरिए हवा में फैल जाता है। यूनिट्स में कबूतर और दूसरे पक्षियों की बीट हवा में मिलकर सांस के ज़रिए शरीर में जा सकती है, जिससे हाइपरसेंसिटिविटी रिएक्शन हो सकते हैं। एयर-कंडीशनिंग यूनिट्स में लीजियोनेला जैसे बैक्टीरिया पनप सकते हैं और बीमारी फैला सकते हैं।

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इन लक्षणों पर रखें नजर

ज़्यादातर लोग सोचते हैं कि फेफड़ों की समस्या होने पर बहुत ज़्यादा सांस फूलने लगती है। असल में, शुरुआती लक्षणों को अक्सर आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाता है जैसे: लगातार सूखी खांसी, गले में खराश, आंखों में जलन, बार-बार छींक आना, सांस फूलना सिरदर्द, बार-बार सर्दी-जुकाम जैसे लक्षण, अस्थमा के दौरे बढ़ना। एक बात अक्सर साफ़ तौर पर देखी जाती है: ऑफिस से निकलने के बाद लक्षणों में सुधार होता है। अच्छी बात यह है कि घर या ऑफिस के अंदर की हवा की क्वालिटी को बेहतर बनाना अक्सर बिना किसी बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव के भी मुमकिन है।


इन बाताें का रखें ख्याल

डॉक्टर कहते हैं कि- इससे बचने के लिए ऑफिस के अंदर का तापमान 23–25°C के बीच कंट्रोल किया जाना चाहिए और ह्यूमिडिटी का लेवल 40-60% के बीच बनाए रखना चाहिए। सिस्टम में धूल जमा होने से बचने के लिए हर दो से चार हफ़्ते में कम से कम एक बार फ़िल्टर की सफ़ाई और रेगुलर डक्ट डिसइंफेक्शन ज़रूरी है। HVAC की रेगुलर सर्विसिंग और फ़िल्टर बदलने का काम पक्का करें। सीलन वाली दीवारों और साफ़ दिखने वाली फफूंदी (मोल्ड) का तुरंत इलाज करें। एयर फ्रेशनर और तेज़ केमिकल का ज़्यादा इस्तेमाल करने से बचें।समय-समय पर इनडोर एयर क्वालिटी का असेसमेंट करें। सांस की बीमारी वाले कर्मचारियों को जब मुमकिन हो, तब दूर से (रिमोटली) काम करने के लिए प्रोत्साहित करें। जहां भी मुमकिन हो, वेंटिलेशन और ताज़ी हवा के सर्कुलेशन को बेहतर बनाएं।

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