नारी डेस्क : गरीबी, भाषा की परेशानी और मेडिकल कॉलेज में शुरुआती असफलता भी डॉ. विजयलक्ष्मी देशमाने के हौसले को नहीं तोड़ सकी। जिस लड़की ने कभी अपनी मां के साथ सब्जियां बेचकर परिवार का हाथ बंटाया था, वही आगे चलकर भारत की जानी-मानी कैंसर सर्जनों में शामिल हुईं। 2025 में उन्हें चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया। डॉ. विजयलक्ष्मी देशमाने की कहानी सिर्फ एक डॉक्टर के सफल करियर की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, परिवार के त्याग और शिक्षा के दम पर जिंदगी बदलने की मिसाल भी है।
मां के साथ सब्जियां बेचती थीं
कर्नाटक के कलबुर्गी जिले से आने वाली डॉ. विजयलक्ष्मी का बचपन आर्थिक मुश्किलों के बीच बीता। उनके पिता बाबूराव देशमाने मिल में मजदूर थे, जबकि उनकी मां रत्नम्मा सब्जियां बेचती थीं। स्कूल के बाद विजयलक्ष्मी अपनी मां की मदद करती थीं और सब्जियां बेचने के काम में हाथ बंटाती थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति भले ही कमजोर थी, लेकिन उनके माता-पिता ने बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता दी। उनके पिता चाहते थे कि उनकी बेटी डॉक्टर बने और आगे चलकर सर्जन के रूप में लोगों की सेवा करे।

बेटी की पढ़ाई के लिए मां ने बेच दिया मंगलसूत्र
मेडिकल की पढ़ाई का सपना पूरा करना आसान नहीं था। जब विजयलक्ष्मी का मेडिकल कॉलेज में दाखिला हुआ, तब परिवार के सामने फीस जुटाने की बड़ी चुनौती थी। ऐसे समय में उनकी मां ने अपना मंगलसूत्र बेचकर बेटी की पढ़ाई के लिए पैसे जुटाए। यही त्याग विजयलक्ष्मी के जीवन का एक बड़ा मोड़ बना।विजयलक्ष्मी ने बाद में बताया कि उनके माता-पिता खुद ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते थे।
मेडिकल कॉलेज में पहले साल हुईं फेल
विजयलक्ष्मी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई कन्नड़ माध्यम से की थी। मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी था, जिसके कारण उन्हें शुरुआत में काफी परेशानी हुई। वह एमबीबीएस (MBBS) के पहले साल में फेल भी हो गईं। लेकिन उन्होंने इसे अपनी मंजिल का अंत नहीं माना। उन्होंने दोबारा मेहनत की और आगे की पढ़ाई में शानदार प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्होंने जनरल सर्जरी में एमएस की पढ़ाई पूरी की और कैंसर सर्जरी के क्षेत्र में अपना करियर बनाया।
किदवई में बनीं पहली महिला प्रोफेसर
एमएस पूरा करने के बाद डॉ. विजयलक्ष्मी देशमाने ने बेंगलुरु स्थित किदवई मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑन्कोलॉजी में काम शुरू किया। 1994 में वह संस्थान की पहली महिला प्रोफेसर बनीं। बाद में उन्होंने डीन, विभागाध्यक्ष और निदेशक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी संभालीं। सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में उन्होंने खास तौर पर कैंसर मरीजों के इलाज और जागरूकता के लिए काम किया। उनके करियर में स्तन कैंसर से जुड़ी सर्जरी और रिसर्च भी महत्वपूर्ण रही।

इलाज के साथ ग्रामीण इलाकों में कैंसर जागरूकता
डॉ. देशमाने का काम अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने ग्रामीण और वंचित समुदायों के बीच कैंसर जागरूकता अभियान और स्वास्थ्य कार्यक्रमों में भी हिस्सा लिया। वह जरूरतमंद मरीजों के लिए मुफ्त परामर्श और चिकित्सा सेवाओं से भी जुड़ी रहीं। उनका मानना रहा है कि कैंसर की समय पर पहचान और इलाज से कई लोगों की जान बचाई जा सकती है। इसी सोच के साथ उन्होंने जागरूकता और शुरुआती जांच को बढ़ावा देने के लिए भी काम किया।
2025 में मिला पद्म श्री
दशकों तक चिकित्सा और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में योगदान देने के बाद डॉ. विजयलक्ष्मी देशमाने को 2025 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके चिकित्सा क्षेत्र में योगदान और समाज के लिए किए गए काम की राष्ट्रीय पहचान बना। सब्जियां बेचने वाली मां की बेटी से लेकर देश की जानी-मानी कैंसर सर्जन और पद्म श्री सम्मानित डॉक्टर बनने तक डॉ. विजयलक्ष्मी देशमाने का सफर बताता है कि आर्थिक मुश्किलें और शुरुआती असफलताएं किसी इंसान की मंजिल तय नहीं करतीं। सही शिक्षा, परिवार का साथ और लगातार मेहनत के दम पर जिंदगी की दिशा बदली जा सकती है।