नारी डेस्क: किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे बच्चों में सिर्फ दवाएं ही नहीं, बल्कि सही खानपान और नियमित शारीरिक गतिविधि भी दिल को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभा सकती है। लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और कलावती सरन बाल चिकित्सालय के डॉक्टरों के अध्ययन में सामने आया है कि खानपान में सुधार, रोजाना व्यायाम और जरूरत के मुताबिक दवाओं के इस्तेमाल से इन बच्चों में हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा कम किया जा सकता है। यह अध्ययन स्टेरॉयड रेजिस्टेंट नेफ्रोटिक सिंड्रोम (एसआरएनएस) से पीड़ित 4 से 18 वर्ष की उम्र के 34 बच्चों पर 12 सप्ताह तक किया गया। अध्ययन के दौरान बच्चों के खानपान, शारीरिक गतिविधि, वजन, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल समेत कई स्वास्थ्य मानकों पर नजर रखी गई।
किडनी की बीमारी में क्यों बढ़ता है कोलेस्ट्रॉल
एसआरएनएस में किडनी शरीर के लिए जरूरी प्रोटीन को पेशाब के रास्ते बाहर निकालने लगती है। इस स्थिति में कुछ बच्चों के शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ सकता है। लंबे समय तक खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ा रहने पर रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है और आगे चलकर हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसी खतरे को देखते हुए अध्ययन में बच्चों की जीवनशैली और खानपान में बदलाव पर विशेष ध्यान दिया गया।

डाइट में घटाई गई संतृप्त वसा और कोलेस्ट्रॉल
अध्ययन के दौरान बच्चों के भोजन में संतृप्त वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम की गई। माता-पिता को बच्चों के खानपान पर नियमित नजर रखने और संतुलित आहार देने की सलाह दी गई। इसके साथ ही बच्चों को रोजाना कम से कम एक घंटे खेलने या व्यायाम करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। स्क्रीन टाइम को भी दो घंटे से कम रखने की सलाह दी गई, ताकि बच्चे मोबाइल और टीवी पर ज्यादा समय बिताने के बजाय शारीरिक गतिविधियों में हिस्सा लें।
एलडीएल 160 से ऊपर होने पर दी गई दवा
जिन बच्चों में खराब कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल का स्तर 160 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से अधिक पाया गया, उन्हें डॉक्टरों की निगरानी में एटोरवास्टेटिन दवा दी गई। बाल रोग विभाग के डॉ. अभिजीत साहा के अनुसार, 12 सप्ताह बाद बच्चों के कुल कोलेस्ट्रॉल, एलडीएल और ट्राइग्लिसराइड्स के स्तर में कमी दर्ज की गई। रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचने से जुड़े संकेतकों में भी सुधार देखा गया।
बढ़े रक्तचाप में भी आया सुधार
अध्ययन की शुरुआत में करीब 41 प्रतिशत बच्चों का रक्तचाप बढ़ा हुआ था। 12 सप्ताह तक जीवनशैली में बदलाव और इलाज के बाद इन बच्चों के रक्तचाप में भी सुधार देखा गया। इससे संकेत मिलता है कि किडनी की बीमारी से जूझ रहे बच्चों में हृदय और रक्त वाहिकाओं की सुरक्षा के लिए उपचार के साथ-साथ रोजमर्रा की आदतों में सुधार भी जरूरी है।
केवल दवाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं
एसआरएनएस से पीड़ित बच्चों के इलाज में केवल दवाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। बच्चों के भोजन की नियमित निगरानी के साथ उनकी शारीरिक गतिविधि, वजन और रक्तचाप पर भी नजर रखना जरूरी है। उन्होंने बताया कि अध्ययन में एटोरवास्टेटिन बच्चों के लिए सुरक्षित पाई गई और इसके इस्तेमाल से कोई दुष्प्रभाव सामने नहीं आया। हालांकि, बच्चों को यह दवा केवल डॉक्टर की सलाह और निगरानी में ही दी जानी चाहिए।

माता-पिता की भूमिका भी अहम
डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों के लिए डाइट प्लान बनाते समय माता-पिता को खुद से बदलाव करने के बजाय डॉक्टर और डाइटीशियन की सलाह लेनी चाहिए। किडनी की बीमारी से पीड़ित हर बच्चे की स्थिति अलग हो सकती है, इसलिए उसके अनुसार ही भोजन और शारीरिक गतिविधि तय की जानी चाहिए।
बच्चों को मोबाइल और टीवी से दूर रखकर खेलकूद के लिए प्रोत्साहित करना भी उनकी सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है। अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि सही डाइट, सक्रिय जीवनशैली और जरूरत के मुताबिक दवा का संयोजन किडनी रोग से पीड़ित बच्चों में बढ़े कोलेस्ट्रॉल और हृदय संबंधी जोखिम को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।