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पुराना फर्नीचर अब सिर्फ पुराना नहीं रहा!

  • Edited By Monika,
  • Updated: 27 Aug, 2026 05:50 PM
पुराना फर्नीचर अब सिर्फ पुराना नहीं रहा!

नारी डेस्क : घर को नया रूप देने का मतलब हमेशा नया फर्नीचर खरीदना नहीं होता। कई बार घर में रखा पुराना लकड़ी का कैबिनेट, साइडबोर्ड, बेडसाइड टेबल या डाइनिंग चेयर सही रंग और अच्छी फिनिश के साथ बिल्कुल नया दिखाई देने लगता है। यही सोच आज फिर से इंटीरियर में जगह बना रही है। डिजाइन जगत में रंग किए हुए फर्नीचर की वापसी को एक खास बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। एक जैसे बने और बड़े पैमाने पर तैयार होने वाले फर्नीचर के बजाय अब लोग ऐसे सामान पसंद कर रहे हैं जिनमें कारीगरी, अलग पहचान और पुरानी चीजों को नए रूप में इस्तेमाल करने की भावना दिखाई दे। भारत में यह विचार और भी उपयोगी है, क्योंकि हमारे घरों में पुराने लकड़ी के फर्नीचर, पुश्तैनी अलमारियां, पारंपरिक कैबिनेट और कारीगरी वाले सामान पहले से मौजूद हैं।

केवल रंग कर देना ही काफी नहीं

रंग किए हुए फर्नीचर का मतलब केवल उस पर जल्दी से रंग की एक परत चढ़ा देना नहीं है। अच्छा परिणाम पाने के लिए सतह की सही तैयारी, उपयुक्त आधार परत, सही रंग और अंतिम परत का ध्यान रखना जरूरी है।
सबसे पहले यह समझना चाहिए कि फर्नीचर किस सामग्री का बना है। ठोस लकड़ी, लकड़ी की पतली परत, लैमिनेट या पहले से पॉलिश की गई सतह—हर सामग्री के लिए एक जैसी प्रक्रिया सही नहीं होती।
पुराने फर्नीचर की मजबूती भी जांचनी चाहिए। कहीं लकड़ी में दीमक, नमी या सड़न तो नहीं है? जोड़ मजबूत हैं या नहीं? दराज और दरवाजे ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं? इन बातों को देखने के बाद ही रंग या फिनिश बदलने का निर्णय लेना चाहिए।
सरल शब्दों में कहें तो क्रम होना चाहिए। पहले मजबूती, फिर सतह और उसके बाद रंग।

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पुराने फर्नीचर को दें दूसरा मौका

यदि घर में कोई पुराना लेकिन मजबूत फर्नीचर रखा है, तो उसे हटाने से पहले कुछ बातें जरूर देखें।
●    क्या उसका ढांचा अभी भी मजबूत है?
●    क्या लकड़ी में दीमक या नमी का नुकसान नहीं है?
●    क्या पुराने हैंडल या कुंडी बदले जा सकते हैं?
●    क्या उसका आकार आज भी उपयोगी है?
●    क्या केवल रंग और फिनिश बदलने से उसका रूप बेहतर हो सकता है?

यदि इन सवालों के जवाब सकारात्मक हैं, तो नया फर्नीचर खरीदने के बजाय पुराने सामान को नया रूप देना बेहतर विकल्प हो सकता है।
उदाहरण के लिए पुराने लकड़ी के साइडबोर्ड को मिट्टी जैसा हरा, हल्का भूरा या गर्म क्रीम रंग देकर आधुनिक कमरे का हिस्सा बनाया जा सकता है। पुराने फर्नीचर को प्राकृतिक सामग्री और नए डिजाइन वाले हैंडल के साथ मिलाने से उसका रूप और भी आकर्षक हो सकता है।

हर फर्नीचर को रंगने की जरूरत नहीं

1. रंग किए हुए फर्नीचर का सबसे अच्छा प्रभाव तब दिखाई देता है जब उसका इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाए। पूरे घर के हर लकड़ी के सामान को अलग-अलग रंग देने के बजाय एक खास फर्नीचर को ध्यान का केंद्र बनाया जा सकता है।
2. बैठक में रंग किया हुआ साइडबोर्ड या कंसोल अच्छा विकल्प हो सकता है। शयनकक्ष में बेडसाइड टेबल या छोटी दराज वाली मेज को नया रंग दिया जा सकता है। भोजन क्षेत्र में पुरानी बर्तन रखने की अलमारी और प्रवेश स्थान पर कंसोल भी आकर्षक लग सकता है।
3. अध्ययन कक्ष में किताबों की अलमारी या कैबिनेट को रंगकर पूरे कमरे की पहचान बदली जा सकती है।
4. रसोई में भी कुछ अलमारियों या बीच की मेज को रंगीन रूप दिया जा सकता है, लेकिन यहां इस्तेमाल होने वाली सतह और रंग की गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखना जरूरी है।

भारतीय रंगों से बनेगा अलग आकर्षण

1. रंग किए हुए फर्नीचर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके जरिए घर में रंगों के माध्यम से भारतीय पहचान आसानी से जोड़ी जा सकती है।
2. मिट्टी जैसा लाल, हल्का हरा, जैतूनी हरा, गहरा नीला, हल्दी जैसा पीला, गर्म भूरा और हल्का मिट्टी रंग घर को गर्म और अपनापन भरा एहसास दे सकते हैं।
3. हालांकि एक साथ बहुत सारे रंग इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है। यदि फर्नीचर का रंग गहरा या चमकीला है तो आसपास की दीवारों और बड़े फर्नीचर को हल्के और शांत रंगों में रखना बेहतर होगा।
4. इसके विपरीत, यदि पूरा कमरा हल्के रंगों में है तो एक रंगीन अलमारी या साइडबोर्ड पूरे कमरे का ध्यान आकर्षित करने वाला हिस्सा बन सकता है।

हाथ से बनाई सजावट या सादा रंग?

1. रंग किए हुए फर्नीचर के दो अलग रूप हो सकते हैं।
2. सादा एकरंगा फर्नीचर आधुनिक और शांत दिखाई देता है। यह आज के सरल और कम सजावट वाले घरों में आसानी से शामिल हो जाता है।
3. दूसरी ओर, हाथ से बनाई गई सजावट वाले फर्नीचर में कारीगरी और अलग पहचान अधिक दिखाई देती है। फूल-पत्तियों के चित्र, पारंपरिक आकृतियां या ज्यामितीय डिजाइन किसी पुराने भारतीय फर्नीचर को खास बना सकते हैं।
4. भारत में हाथ से सजाए गए फर्नीचर की परंपरा नई नहीं है। राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में चित्रकारी और हस्तशिल्प लंबे समय से फर्नीचर और घर की सजावट का हिस्सा रहे हैं।
5. आज इन पारंपरिक कलाओं को आधुनिक आकार और सीमित रंगों के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए पूरे घर को पारंपरिक बनाने की जरूरत नहीं है। एक खास फर्नीचर भी पर्याप्त प्रभाव पैदा कर सकता है।

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नए हैंडल से भी बदल जाता है रूप

1. कई बार पुराने फर्नीचर का रूप केवल रंग के कारण पुराना नहीं लगता। उसके पुराने हैंडल, कुंडियां और अन्य सामान भी उसे पुराना दिखा सकते हैं।
2. रंग बदलने के साथ पीतल, काले धातु या साधारण आधुनिक डिजाइन वाले नए हैंडल लगाए जाएं तो पूरा फर्नीचर अलग दिखाई दे सकता है।
3. लेकिन यहां भी केवल सुंदरता नहीं देखनी चाहिए। दराज कितनी भारी है, दरवाजा कितनी बार खुलता है और नया हैंडल कितनी मजबूती से लगाया जा सकता है। इन बातों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

रसोई में ज्यादा सावधानी जरूरी

1. रसोई में रंग किया हुआ फर्नीचर बहुत सुंदर लग सकता है, लेकिन यहां व्यावहारिकता सबसे महत्वपूर्ण है।
2. गर्मी, भाप, नमी, तेल और बार-बार सफाई के कारण रसोई की सतहों पर ज्यादा दबाव पड़ता है। इसलिए केवल पसंदीदा रंग देखकर कोई भी रंग या परत चुन लेना सही नहीं होगा।
3. रसोई की अलमारियों के लिए ऐसा रंग और फिनिश चुनना चाहिए जो वहां के वातावरण के लिए उपयुक्त हो। साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि उसकी सफाई किस तरह की जा सकती है और समय के साथ जरूरत पड़ने पर उसकी मरम्मत या दोबारा 4. रंगाई कितनी आसानी से हो सकती है।

क्या यह टिकाऊ डिजाइन का हिस्सा है?

1. मजबूत और उपयोगी पुराने फर्नीचर को केवल उसका रूप बदलकर दोबारा इस्तेमाल करना संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में एक अच्छा कदम हो सकता है। इससे हर बार नया फर्नीचर खरीदने की जरूरत कम हो सकती है और पुरानी वस्तु लंबे समय तक उपयोग में रह सकती है।
2. लेकिन हर रंग किए हुए फर्नीचर को अपने आप टिकाऊ कहना भी सही नहीं होगा। इस्तेमाल होने वाले रंग, उसकी सामग्री, फर्नीचर की हालत और वह आगे कितने वर्षों तक उपयोग में आएगाइन सभी बातों का महत्व है।
3. टिकाऊ डिजाइन का मतलब केवल नया और पर्यावरण के अनुकूल सामान खरीदना नहीं है। किसी अच्छी वस्तु को लंबे समय तक इस्तेमाल करना, उसकी मरम्मत करना और अनावश्यक कचरा कम करना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।

वास्तु के साथ कैसे जोड़ें?

1. यदि घर में वास्तु के सिद्धांतों को भी ध्यान में रखा जा रहा हो तो फर्नीचर का रंग केवल चलन देखकर तय नहीं करना चाहिए।
2. वास्तु की अलग-अलग परंपराओं में दिशाओं और रंगों को लेकर अलग मान्यताएं मिलती हैं। इसलिए किसी एक रंग को हर घर के लिए शुभ या अशुभ बताना उचित नहीं होगा।
3. व्यावहारिक रूप से रंग चुनते समय कमरे में आने वाली प्राकृतिक रोशनी, कमरे का आकार, दीवारों का रंग, फर्नीचर का उपयोग और पूरे घर की सजावट को ध्यान में रखना चाहिए।
4. यदि कोई परिवार वास्तु के अनुसार रंगों का चुनाव करना चाहता है, तो दिशा और कमरे की स्थिति को देखकर व्यक्तिगत सलाह लेना अधिक संतुलित तरीका होगा।

नया खरीदने से पहले पुराने को देखें

1. आज के इंटीरियर में घर को पूरी तरह एक जैसा सजाने के बजाय उसमें व्यक्तिगत पहचान और कारीगरी को जगह देने की सोच बढ़ रही है। पुराने फर्नीचर को नया रंग देना इसी सोच का सरल उदाहरण है।
2. एक पुरानी अलमारी को नया रंग देना केवल उसके रूप में बदलाव नहीं है। वह परिवार से जुड़ी किसी पुरानी वस्तु को नए घर में एक नई भूमिका देने का तरीका भी हो सकता है।
3. मेरे अनुसार फर्नीचर को नया रूप देते समय उसकी मूल पहचान को समझना सबसे जरूरी है। हर पुरानी चीज को आधुनिक बनाने के लिए उसकी पहचान मिटाना जरूरी नहीं। कई बार सही रंग, नए हैंडल और बेहतर फिनिश ही उसे आज के घर के साथ जोड़ने के लिए पर्याप्त होते हैं।
4. अच्छा इंटीरियर वह नहीं है जिसमें हर चीज नई हो। अच्छा इंटीरियर वह है जिसमें हर वस्तु का अपना स्थान, उपयोग और अर्थ हो। पुराने फर्नीचर को सही रंग और सोच-समझकर किए गए बदलाव के साथ इस्तेमाल करके कम खर्च में भी घर को नया व्यक्तित्व दिया जा सकता है।
5. पुराना फर्नीचर इसलिए पुराना नहीं होता कि वह पहले इस्तेमाल हो चुका है। सही सोच और सही रंग के साथ वही फर्नीचर घर की सबसे खास चीज बन सकता है।

— रक्षा सेठी, इंटीरियर डिजाइनर एवं वास्तु विशेषज्ञ, इंदौर

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