नारी डेस्क: बच्चों की स्कूल एक्टिविटी, खेलकूद या किसी खास पल की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर करना आजकल आम बात है। लेकिन यही तस्वीरें गलत हाथों में पड़कर मुसीबत का कारण बन सकती हैं। AI के बढ़ते दुरुपयोग ने बच्चों की ऑनलाइन सेफ्टी को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी है। साइबर एक्सपर्ट्स और बाल सुरक्षा संगठनों ने माता-पिता और स्कूलों को सतर्क रहने की सलाह दी है, क्योंकि सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर मौजूद बच्चों की सामान्य तस्वीरों के साथ भी डिजिटल छेड़छाड़ की जा सकती है। ऐसे में सवाल है कि बच्चों की फोटो शेयर करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? बाल सुरक्षा संगठनों, नेशनल क्राइम एजेंसी (NCA) और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने स्कूलों और माता-पिता से बच्चों की तस्वीरें ऑनलाइन साझा करते समय सावधानी बरतने की अपील की है।
स्कूल की वेबसाइट से तस्वीरें उठाने का खतरा
विशेषज्ञों के मुताबिक, अपराधी कई बार स्कूलों की वेबसाइट, सोशल मीडिया पेज या दूसरे सार्वजनिक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से बच्चों की तस्वीरें हासिल कर लेते हैं। ये तस्वीरें अक्सर बिल्कुल सामान्य होती हैं, जिनमें बच्चे खेलकूद, स्कूल कार्यक्रम या किसी अन्य गतिविधि में नजर आते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब इन तस्वीरों को बिना अनुमति डाउनलोड करके किसी दूसरे उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तस्वीर होने के कारण उसके इस्तेमाल पर नियंत्रण रखना स्कूल या परिवार के लिए मुश्किल हो सकता है।

AI की मदद से तस्वीरों में की जा रही छेड़छाड़
साइबर विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता AI तकनीक के गलत इस्तेमाल को लेकर है। आधुनिक AI टूल्स की मदद से किसी वास्तविक तस्वीर में डिजिटल बदलाव करना पहले की तुलना में आसान हो गया है। अपराधी बच्चों की सामान्य तस्वीरों को लेकर फर्जी और आपत्तिजनक सामग्री तैयार करने की कोशिश कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ बच्चे की निजता का उल्लंघन नहीं है, बल्कि बाल शोषण से जुड़ा गंभीर साइबर अपराध भी है।
फर्जी तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेल का खतरा
ऐसे मामलों में खतरा केवल तस्वीर के गलत इस्तेमाल तक सीमित नहीं रहता। सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, अपराधी AI से तैयार की गई फर्जी तस्वीरों का इस्तेमाल बच्चों, उनके परिवारों या संस्थानों को डराने और ब्लैकमेल करने के लिए भी कर सकते हैं। कुछ मामलों में स्कूलों और संस्थानों से पैसे की मांग करने के लिए भी ऐसी फर्जी सामग्री का इस्तेमाल किए जाने की चेतावनी दी गई है। यही वजह है कि विशेषज्ञ स्कूलों से ऑनलाइन फोटो शेयरिंग की अपनी नीतियों पर दोबारा विचार करने को कह रहे हैं।
AI से जुड़े बाल शोषण मामलों में बढ़ रही चिंता
इंटरनेशनल सेंटर ऑफ मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रेन (ICMEC) और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्टों ने AI की मदद से तैयार की जाने वाली बाल शोषण सामग्री को लेकर चिंता बढ़ाई है। ऐसी सामग्री से जुड़ी रिपोर्टों में हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, AI तकनीक के तेजी से विकसित होने के साथ अपराधियों के लिए तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ करना आसान हुआ है। ऐसे में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर परिवारों, स्कूलों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को पहले से ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है।

स्कूलों को पुरानी तस्वीरों की भी करनी चाहिए समीक्षा
विशेषज्ञों ने स्कूलों और अन्य संस्थानों से अपनी वेबसाइट और सोशल मीडिया अकाउंट पर पहले से मौजूद तस्वीरों की समीक्षा करने की अपील की है। खासतौर पर ऐसी तस्वीरों को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी गई है, जिनमें बच्चों के चेहरे आसानी से पहचाने जा सकते हैं। जरूरत न होने पर पुरानी तस्वीरों को हटाना और सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर बच्चों की पहचान योग्य तस्वीरें कम से कम रखना एक सुरक्षा उपाय हो सकता है। स्कूलों को फोटो शेयरिंग से जुड़े नियम और अनुमति प्रक्रिया भी स्पष्ट रखनी चाहिए।
माता-पिता भी सोशल मीडिया पर रहें सावधान
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा में माता-पिता की भूमिका भी बेहद अहम है। विशेषज्ञों की सलाह है कि सोशल मीडिया अकाउंट की Privacy Settings को मजबूत रखा जाए और बच्चों की तस्वीरें सार्वजनिक रूप से शेयर करने से पहले यह सोचा जाए कि उन्हें कौन-कौन देख सकता है। बच्चे की स्कूल यूनिफॉर्म, स्कूल का नाम, लोकेशन या रोजाना की गतिविधियों जैसी पहचान बताने वाली जानकारी तस्वीरों के साथ सार्वजनिक करना भी अनावश्यक जोखिम पैदा कर सकता है।
Photo Sharing से पहले Consent Policy जरूर समझें
स्कूल कार्यक्रमों, खेल प्रतियोगिताओं या दूसरी गतिविधियों में फोटो और वीडियो शेयरिंग से जुड़े नियमों को लेकर माता-पिता को पहले से जानकारी लेनी चाहिए। स्कूलों को भी स्पष्ट करना चाहिए कि बच्चों की तस्वीरें कहां और किस उद्देश्य से इस्तेमाल की जाएंगी। अगर किसी फोटो के इस्तेमाल को लेकर अभिभावक सहज नहीं हैं, तो उन्हें अपनी आपत्ति या सहमति स्पष्ट रूप से स्कूल के सामने रखने का अधिकार होना चाहिए।

बच्चों की तस्वीरें शेयर करना बंद करना ही एकमात्र रास्ता नहीं
विशेषज्ञों का मकसद यह नहीं है कि बच्चों की हर तस्वीर ऑनलाइन डालना पूरी तरह बंद कर दिया जाए। असली जरूरत यह समझने की है कि इंटरनेट पर एक बार सार्वजनिक की गई तस्वीर को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। इसलिए स्कूलों और माता-पिता को यह तय करते समय सावधानी बरतनी चाहिए कि कौन-सी तस्वीर साझा की जाए, किस प्लेटफॉर्म पर की जाए और उसे कौन देख सकता है। थोड़ी सी सावधानी बच्चों की Privacy और Digital Safety को काफी हद तक मजबूत कर सकती है।