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अब मिर्गी का इलाज होगा आसान, यूनानी जड़ी-बूटियों से बन रहा खास नेजल स्प्रे

  • Edited By Monika,
  • Updated: 01 Aug, 2026 12:52 PM
अब मिर्गी का इलाज होगा आसान, यूनानी जड़ी-बूटियों से बन रहा खास नेजल स्प्रे

नारी डेस्क : मिर्गी के इलाज को लेकर भोपाल के वैज्ञानिकों ने नई उम्मीद जगाई है। प्राचीन यूनानी चिकित्सा में मिर्गी के उपचार के लिए इस्तेमाल की जाने वाली जड़ी-बूटियों से एक विशेष नेजल स्प्रे विकसित किया जा रहा है। इस स्प्रे को आधुनिक ‘नोज-टू-ब्रेन ड्रग डिलीवरी’ तकनीक के माध्यम से नाक के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंचाने की योजना है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तकनीक की मदद से जड़ी-बूटियों में मौजूद औषधीय तत्वों को मस्तिष्क के प्रभावित हिस्सों तक अधिक प्रभावी तरीके से पहुंचाया जा सकता है। हालांकि, यह शोध अभी प्री-क्लीनिकल चरण में है और इसकी सुरक्षा तथा प्रभावशीलता साबित करने के लिए आगे पशुओं पर अध्ययन और मानवों पर क्लीनिकल ट्रायल जरूरी होंगे।

तीन साल से चल रहा शोध

बताया गया है कि यह तीन वर्षीय शोध आयुष मंत्रालय के अधीन केंद्रीय यूनानी चिकित्सा अनुसंधान परिषद के सहयोग से किया जा रहा है। इसमें दिल्ली फार्मास्युटिकल साइंसेज एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ भी शामिल हैं। भोपाल स्थित हकीम सैयद जियाउल हसन सरकारी यूनानी मेडिकल कॉलेज के मोआलेजात विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अब्बास जैदी इस शोध से जुड़े हैं। शोध के दौरान यूनानी चिकित्सा में वर्णित चुनिंदा जड़ी-बूटियों की पहचान कर उनका मानकीकरण किया गया है। इसके बाद उनका नया नेजल फॉर्मूलेशन तैयार किया गया।

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चूहों पर टॉक्सिसिटी टेस्ट किया पूरा

शोधकर्ताओं के अनुसार, तैयार फॉर्मूलेशन का चूहों पर शुरुआती टॉक्सिसिटी परीक्षण किया गया है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना था कि दवा किसी तरह का हानिकारक या जहरीला प्रभाव तो पैदा नहीं करती। अब चूहों पर इसकी वास्तविक प्रभावशीलता का अध्ययन किया जा रहा है। यदि प्री-क्लीनिकल अध्ययन में संतोषजनक परिणाम मिलते हैं, तो नियामक मंजूरी के बाद मानवों पर क्लीनिकल ट्रायल की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। केवल चूहों पर टॉक्सिसिटी परीक्षण सफल होना यह साबित नहीं करता कि दवा इंसानों में भी सुरक्षित और प्रभावी होगी। मानव उपयोग से पहले कई चरणों की वैज्ञानिक जांच आवश्यक होती है।

क्या है नोज-टू-ब्रेन तकनीक?

नोज-टू-ब्रेन ड्रग डिलीवरी एक ऐसी तकनीक है, जिसमें दवा नाक के माध्यम से दी जाती है। नाक और मस्तिष्क के बीच मौजूद ओलफैक्टरी और ट्राइजेमिनल तंत्रिका मार्गों के कारण कुछ दवाओं को मस्तिष्क तक पहुंचाने की संभावना बनती है। वैज्ञानिक साहित्य के अनुसार, यह तकनीक कुछ दवाओं को ब्लड-ब्रेन बैरियर की चुनौती से बचाते हुए केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुंचाने में मदद कर सकती है। हालांकि, दवा की मात्रा, अवशोषण, लंबे समय की सुरक्षा और प्रत्येक फॉर्मूलेशन की प्रभावशीलता का अलग-अलग परीक्षण करना जरूरी है।

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क्या है मिर्गी?

मिर्गी मस्तिष्क से जुड़ा एक क्रॉनिक न्यूरोलॉजिकल रोग है, जिसमें व्यक्ति को बार-बार दौरे पड़ सकते हैं। दौरे मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि में अचानक होने वाले असामान्य बदलाव के कारण आते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, सही पहचान और उचित एंटी-सीजर दवाओं की मदद से मिर्गी से पीड़ित लगभग 70 प्रतिशत लोग दौरे से मुक्त हो सकते हैं। हालांकि, कुछ मरीजों में उपलब्ध दवाओं से भी दौरे पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाते और उन्हें विशेषज्ञ उपचार की जरूरत पड़ती है।

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वर्तमान इलाज में क्या हैं चुनौतियां?

मिर्गी का उपचार मुख्य रूप से एंटी-सीजर या एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं से किया जाता है। मरीज को दवा का चयन दौरे के प्रकार, उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और अन्य व्यक्तिगत कारकों के आधार पर किया जाता है। कुछ मरीजों को लंबे समय तक दवाएं लेनी पड़ती हैं। इनसे उनींदापन, चक्कर, थकान या अन्य दुष्प्रभाव हो सकते हैं। वहीं कुछ मामलों में कई दवाएं आजमाने के बाद भी दौरे पूरी तरह नियंत्रित नहीं होते। ऐसी स्थिति में डॉक्टर अन्य उपचार विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। इसी वजह से वैज्ञानिक ऐसे नए विकल्पों पर शोध कर रहे हैं, जिनसे दवा को मस्तिष्क के लक्षित हिस्सों तक पहुंचाया जा सके और शरीर के अन्य अंगों पर उसका अनावश्यक प्रभाव कम किया जा सके। मिर्गी में नैनो-आधारित नोज-टू-ब्रेन डिलीवरी पर भी दुनिया के अलग-अलग शोध संस्थानों में अध्ययन किए जा रहे हैं।

दुष्प्रभाव कम होने की उम्मीद, लेकिन पुष्टि बाकी

शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि नाक के रास्ते दवा पहुंचाने से उसकी प्रभावशीलता बढ़ाई जा सकती है और संभावित दुष्प्रभाव कम किए जा सकते हैं। हालांकि, फिलहाल यह केवल एक शोध परिकल्पना है। दवा के दुष्प्रभाव बहुत कम होंगे या नहीं होंगे, इसकी पुष्टि मानवों पर नियंत्रित क्लीनिकल ट्रायल के बाद ही की जा सकेगी। किसी भी हर्बल या यूनानी दवा को केवल प्राकृतिक होने के आधार पर पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

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Researcher ने क्या कहा?

डॉ. अब्बास जैदी के अनुसार, प्राचीन यूनानी चिकित्सा ग्रंथों में मिर्गी के इलाज के लिए कई जड़ी-बूटियों का उल्लेख मिलता है। इन्हीं जड़ी-बूटियों को आधुनिक नोज-टू-ब्रेन तकनीक से जोड़कर नेजल स्प्रे का रूप देने का प्रयास किया जा रहा है। उनका कहना है कि यदि पशुओं पर होने वाले प्रभावशीलता अध्ययन और इसके बाद मानवों पर क्लीनिकल ट्रायल सफल रहते हैं, तो भविष्य में मिर्गी के मरीजों के लिए उपचार का एक नया विकल्प सामने आ सकता है।

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मानवों पर ट्रायल के बाद ही साफ होगी तस्वीर

शोध का अगला महत्वपूर्ण चरण पशुओं पर प्रभावशीलता का अध्ययन है। इसके बाद वैज्ञानिक आंकड़ों, नैतिक समिति और संबंधित नियामक संस्थाओं की मंजूरी के आधार पर मानव परीक्षण किए जा सकते हैं। क्लीनिकल ट्रायल में यह देखा जाएगा कि नेजल स्प्रे इंसानों के लिए कितना सुरक्षित है, इसकी सही खुराक क्या होगी, यह दौरे नियंत्रित करने में कितना प्रभावी है और इसके संभावित दुष्प्रभाव क्या हो सकते हैं।

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यूनानी जड़ी-बूटियों और आधुनिक नोज-टू-ब्रेन तकनीक का यह संयोजन मिर्गी के उपचार की दिशा में एक दिलचस्प शोध है। चूहों पर शुरुआती सुरक्षा परीक्षण पूरा होना पहला कदम है, लेकिन इसे मिर्गी का प्रमाणित इलाज मानना अभी जल्दबाजी होगी। प्री-क्लीनिकल अध्ययन और मानवों पर सभी चरणों के क्लीनिकल ट्रायल सफल होने के बाद ही यह तय हो पाएगा कि यह नेजल स्प्रे मरीजों के लिए कितना सुरक्षित और प्रभावी विकल्प बन सकता है।

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