
नारी डेस्क : कहते है कि किस्मत एक दरवाजा बंद करती है तो चार और खोल भी देती है। ऐसा ही हुआ 92 साल की बूढ़ी देवकी अम्मा के साथ जिन्हें प्यार से लोग 'फॉरेस्ट ग्रैंडमा' और 'पर्यावरण की मां' भी कहते है। 45 साल की कड़ी मेहनत और लगन देख अम्मा को पद्म श्री से सम्मानित किया गया। केरल के अलप्पुझा ज़िले की रहने वाली देवकी अम्मा ने पिछले 4 दशकों में एक बंजर और रेतीली भूमि को 5 एकड़ के घने जंगल में बदल दिया जिसे 'कोलक्कल तपोवनम' भी कहा जाता है। इस जंगल में देवकी उम्मा ने 3,000 से अधिक दुर्लभ और औषधीय पौधे लगाएं और बंजर पड़ी जमीन को हरा-भरा जंगल बना दिया। उन्हें अपने इस नेक काम के लिए 'नारी शक्ति पुरस्कार' और ‘इंदिरा प्रियदर्शनी वृक्षमित्र अवॉर्ड’ से नवाज़ा जा चुका है।

भले ही देवकी अम्मा की जिंदगी आज जंगल की तरह हरी-भरी दिखती हो लेकिन शुरूआत बड़ी दर्दनाक थी। देवकी अम्मा साराधण गृहिणी थी जिन्होंने शादी के बाद सास के साथ धान की खेती में हाथ बंटाया। जीवन सामान्य चल रहा था लेकिन जीवन सामान्य चल रहा था लेकिन अचानक से एक कार दुर्घटना ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। जी हां, अम्मा का यह सफर तब शुरु हुआ जब 1980 में एक गंभीर कार दुर्घटना में उनका पैर बुरी तरह से ग्रस्त हो गया। डॉक्टर्स चलने-फिरने से साफ मना कर दिया। जीवन बिस्तर और कुर्सी तक सीमित रह गया लेकिन देवकी अम्मा को यह लाचारी मंजूर नहीं थी। देवकी उम्मा को डिप्रैशन घेरने लगा, दिन बिस्तर या कुर्सी पर निकालने मुश्किल हो गए।

3 साल बाद किस्मत ने उनके लिए एक दरवाजा खोला वो दरवाजा था, उनके घर के पीछे पड़ी बंजर जमीन का..। दर्द में कहराते हुए एक दिन देवकी अम्मा घर के पीछे जमीन में एक पौधा लगाया। इस पौधे को पानी दिया जिससे उनके मन को सुकून मिला। जैसे-जैसे पौधा बड़ा हुआ, देवकी अम्मा को महसूस होने लगा कि उनके अंदर भी एक नई उम्मीद जाग रही है। फिर उन्होंने अपनी शारीरिक लाचारी को हिम्मत बनाया और जुट गई पौधे लगाने के काम पर...बैसाखी और छड़ी का सहारा लेकर चलती, मिट्टी खोदती और पौधे लगाती, शुरूआत में रिश्तेदार इसे अम्मा का पागलपन कहते और बोलते- इस उम्र में टूटे पैरों से क्या कर रही है? अम्मा नहीं रुकी, उनके लिए यह बागवानी नहीं, एक थेरेपी थी, खुद को जिंदा रखने की जद्दोजहद थी।

इसी जुनून में आकर उन्होंने परिवार की 5 एकड़ बंजर पड़ी पुश्तैनी जमीन को घने जंगल में बदल दिया। पति गोपालकृष्णा पिल्लई ने उन्हें तरह-तरह के बीज लाकर दिए, बच्चों व रिश्तेदारों ने भी उन्हें तोहफे में पौधे लगाकर देने शुरू कर दिए। घर की 4 पीढ़ियों ने उनके इस काम में उनका साथ दिया, पोते-पोतियां छुट्टियों पर घर आते और नए पौधे लगाकर जाते। अम्मा पौधों को प्राकृतिक खाद्य इस्तेमाल करती, इस जमीन में लगे पौधे से देवकी अम्मा का रिश्ता बिल्कुल एक मां और बच्चे जैसा है। अम्मा, उनसे बातें करती हैं और अक्सर कहती है कि ये मेरे बच्चे हैं, मैं इनके बिना नहीं रह सकती। उन्होंने उन पौधों को भी सहेजा जो अब केरल के जंगलों से गायब हो रहे हैं।
पर्यावरण की हरा-भरा बनाने के इस नेक काम के लिए देवकी अम्मा को हमारा सलाम!