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किसने बनाया था हीरा मंडी को वेश्याओं का कोठा, जानिए इसके पीछे की असल कहानी

  • Edited By Vandana,
  • Updated: 27 Apr, 2024 05:22 PM

बॉलीवुड के फेमस फिल्मेमकर संजय लीला भंसाली इस समय अपनी वेब सीरीज हीरामंडीः द डायमंड बाजार के लिए सुर्खियां बटोर रहे हैं। उनकी इस मोस्ट अवेटेड वेब सीरीज के आने का सबको बेसब्री से इंतजार था जिसकी कल ग्रैंड स्क्रीनिंग रही। स्क्रीनिंग इतनी शानदार और बड़ी थी कि बॉलीवुड का हर बड़ा स्टार रेड कार्पेट पर शिरकत किए नजर आया। इस वेब सीरीज में आपको बहुत से स्टार फेस भी नजर आएगे। ये संजय लीला भंसाली का बहुत ही खास प्रोजेक्ट था। कहा जाता है कि 14 साल पहले लाहौर के हीरामंडी रेड लाइट एरिया पर फिल्म बनाने का आइडिया उन्हें राइटर मोइन बैग (Moin Baig) ने दिया था। हालांकि उस वक्त वह बाकी प्रोजेक्ट में बिजी थे इसलिए इसे काफी साल लग गए।

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हीरामंडी- द डायमंड बाजार की असल कहानी 

लेकिन क्या आप जानते हैं ये हीरामंडी- द डायमंड बाजार की असल कहानी क्या है? नाम सुनने पर तो ऐसा लग रहा है कि जैसे यहां हीरों की मंडी लगती हैं क्योंकि हीरामंडी का शाब्दिक अर्थ हीरो का बाजार है हालांकि हीरे के बाजार से इसका कोई लेना देना नहीं है। रिपोर्ट्स में दी जानकारी के मुताबिक, 1799 में लाहौर पर महाराजा रणजीत सिंह का राज हुआ। उसी दौरान हीरामंडी का नाम महाराजा रणजीत सिंह के दीवान हीरा सिंह के नाम पर रखा गया था। यह नाम उनके सम्मान में चुना गया था। उन्होंने यहां पर अनाज मंडी बनाई थी।  इसका मूल नाम 'हीरा सिंह दी मंडी' था, जिसका अर्थ है हीरा सिंह का अनाज बाजार।  इसी के बाद से इसे हीरा दी मंडी कहा जाने लगा और फिर इसका आधुनिक नाम हीरामंडी पड़ गया। तो चलिए आपको हीरामंडी की असल कहानी बताते हैं।

450 साल पुराना इतिहास, हीरामंडी जिसे कहते थे पहले शाही मौहल्ला

कहा जाता है कि हीरामंडी का इतिहास 450 साल पुराना है जो पाकिस्तान के लाहौर शहर में एक इलाका है। अकबर के शासन के दौर में हीरामंडी को 'शाही मोहल्ला' के नाम से भी जाना जाता है। इस इलाके का उदय मुगल काल में हुआ था। 15वीं और 16वीं शताब्दी में मुगल काल के दौरान ये इलाका कला का केंद्र था। हीरामंडी मुगल काल के दौरान तवायफ संस्कृति पर आधारित एक गीत और नृत्य समुदाय था।  उस समय शाही मोहल्ले में उज्बेकिस्तान और अफगानिस्तान से महिलाएं आती थी और वो क्लासिकल डांस करती थी, गाना गाती थीं। उस वक्त इस हीरामंडी को कला से जोड़कर देखा जाता था   लेकिन अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण के बाद ये इलाका रेड लाइट एरिया में तब्दील हो गया और फिर ब्रिटिश राज में  यहां वेश्यालय बनाए गए और धीरे-धीरे ये वेश्यावृति का केंद्र बन गया। यहां पर स्थित कई कोठे मुगल शासन के दौर के हैं।

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अब हीरामंडी को लेकर लोगों के दिमाग में यही बात पहले आती हैं कि यह वेश्याओं का कोठा है जहां सेक्स वर्कर रहती हैं हालांकि इस बारे में  पाकिस्तानी राइटर फौजिया सईद ने भी अपनी किताब 'टेबो: द हेडन कल्चर ऑफ ए रेड लाइट एरिया' में हीरामंडी के बारे में लिखा है। राइटर के मुताबकि,'हम उनके बारे में केवल यही सोचते हैं कि वो सिर्फ सेक्स वर्कर थे। पहले मैंने भी ये ही सोचा था लेकिन जब मैंने वहां जाकर देखा तो मैं चौंक गई थी, क्योंकि ये साहित्य का केंद्र था। हीरामंडी ने जाने-माने लेखकों, शायरों, कलाकारों को जन्म दिया है। '

बीबीसी उर्दू से बातचीत में प्रोफेसर त्रिपुरारी शर्मा ने बताया, 'मुगलकाल में अमीर लोगों के परिवार इन इलाकों में रहते थे। राजमहलों में उनके प्रोग्राम रहते थे। उस समय कोठे को कला का केंद्र कहा जाता था, जहां डांस, गाना आदि चीजें सिखाई जाती थी। यहां की महिलाएं खुद को एक्ट्रेस कहा करती थीं। यहां पर लोग ऊंचे स्तर की बातचीत सीखने भी आया करते थे।'  

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तवायफों को सिखाया जाता था कथक और शिष्टाचार

मुगल काल के दौरान हीरामंडी की तवायफों को भारतीय शास्त्रीय संगीत, कथक और मुजरा नृत्य के साथ-साथ कविता और शिष्टाचार का प्रशिक्षण दिया जाता था। इन तवायफों के पास उनके कौशल में मार्गदर्शन के लिए कला शिक्षक या उस्ताद होते हैं और वह अपनी कला से मेहमानों का मनोरंजन करती रही थी।मुगल शाही परिवार के लिए प्रदर्शन करने के लिए कुछ तवायफों ने भी महल में प्रवेश किया। रईस लोग अपने बेटे को शिष्टाचार और दुनिया के तौर-तरीके सीखने के लिए तवायफ के घर भेजते थे। महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर में विभिन्न मुगल शाही अनुष्ठानों को बहाल किया, जिसमें तवायफ की संस्कृति और उनके दरबारी प्रदर्शन भी शामिल थे, तवायफों को दरबार से शाही संरक्षण मिलता रहा।

लेकिन जब ब्रिटिश उपनिवेशीकरण हुआ तो यह वेश्यावृति का केंद्र बन गया। हालांकि यहां वेश्यालय और वेश्याएं चल रही थी फिर भी इसी के साथ  क्षेत्र में तवायफ़ गतिविधियाँ कर रही थीं, हीरामंडी ने प्रदर्शन कला के केंद्र के रूप में अपनी प्रतिष्ठा बरकरार रखी।

ब्रिटिश सैनिकों ने वेश्यालय घरों किया था विकसित

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ब्रिटिश राज के दौरान ब्रिटिश सैनिकों के मनोरंजन के लिए वेश्यालय घरों को और विकसित किया गया था हालांकि मुहम्मद जिया-उल-हक के शासनकाल के दौरान , संगीत और नृत्य घरों के खिलाफ एक अभियान भी चलाया गया था, जिन पर वेश्यावृत्ति का अड्डा होने का आरोप लगाया गया था। ऑपरेशन ने इस प्रथा को पूरे शहर में फैलाने का काम किया। हीरामंडी में वेश्यावृत्ति को गैरकानूनी घोषित किए जाने के बाद, अधिकांश क्षेत्र को खाद्य सड़कों, रेस्तरां और दुकानों में बदल दिया गया था।

तवायफ़ के संरक्षक अब सम्राट और रईस नहीं थे बल्कि शहर के धनी लोग थे, हीरामंडी ने अपना उपनाम "बाज़ार-ए-हुस्न" अर्जित किया। विभाजन के बाद हीरा मंडी की युवा और आकर्षक तवायफें, पाकिस्तानी फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद बन गईं। हीरामंडी की लड़कियाँ लॉलीवुड उद्योग में भी शामिल हुईं और  कुछ सबसे कुशल तवायफों ने शुरुआती पाकिस्तानी फिल्मों में बैकअप नर्तक के रूप में प्रदर्शन किया। हीरामंडी और आसपास के इलाकों में कई नृत्य और संगीत कक्षाएँ थीं, जो तवायफों और संगीतकारों के चले जाने के कारण बंद हो गईं और बाद में कुछ हीरामंडी में  वेश्यावृत्ति में शामिल होने के लिए आई। वहीं रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल के दिनों में, इस क्षेत्र में वेश्याएं हैं जो गुप्त रूप से देह-व्यापार कर रही हैं हालांकि यह अभी भी अवैध है। 

तो अब तो आप जान गए होंगे कि ये हीरामंडी-डायमंड बाजार हैं क्या क्या आपको भी संजय लीला भंसाली की इस वेब सीरीज का इंतजार है? हमें कमेंट बॉक्स में बताना ना भूलें। 

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