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कभी ढाई लाख थी महीने की कमाई... आज वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर इंजीनियर, 3 बेटों ने छोड़ा साथ

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 09 Sep, 2026 06:46 PM
कभी ढाई लाख थी महीने की कमाई... आज वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर इंजीनियर, 3 बेटों ने छोड़ा साथ

नारी डेस्क: विदेशों में इंजीनियर के तौर पर काम कर चुके 83 वर्षीय सिलविंदर सिंह आज जौनपुर के एक वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। उनका कहना है कि उनके तीनों बेटे अमेरिका के न्यू जर्सी में रहते हैं और आर्थिक रूप से काफी संपन्न हैं, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर वह उनके साथ नहीं हैं। वयोवृद्ध ने बुधवार को 'यूनीवार्ता' को बताया कि उनके तीनों बेटे न्यू जर्सी में रहते हैं। इनमें एक चाटर्डर् अकाउंटेंट, दूसरा मैकेनिकल इंजीनियर और तीसरा होटल एवं शराब कारोबार से जुड़ा है। उन्होंने बताया कि बेटों के पास आर्थिक संपन्नता है और मुंबई में उनके नाम फ्लैट भी हैं। 
 

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खुशियां नहीं ला सकता पैसा

 सिलविंदर सिंह ने बताया कि बेटे उन्हें अमेरिका आने के लिए कहते हैं और आर्थिक मदद की पेशकश भी करते हैं, लेकिन करीब 20 घंटे की हवाई यात्रा अब उनके लिए संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि बेटे पैसे भेजकर उनके लिए खाना बनाने और देखभाल के लिए किसी महिला को रखने की बात कहते हैं, लेकिन इस उम्र में उन्हें धन से अधिक अपनेपन और साथ की जरूरत महसूस होती है। उनका कहना है कि पैसे से भोजन, दवा और अन्य सुविधाएं मिल सकती हैं, लेकिन परिवार के सदस्य का साथ नहीं खरीदा जा सकता।  उन्होंने मुंबई से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और विदेशों में कई बड़ी ऑयलफील्ड कंपनियों में काम किया। एक समय उनकी मासिक आय करीब ढाई लाख रुपये थी। उन्होंने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा बेटों की पढ़ाई, भविष्य और उनकी शादियों पर खर्च किया।


कैंसर से हुई पत्नी की मौत

 वर्ष 1994 में उनकी पत्नी की कैंसर से मृत्यु हो गई। उन्होंने मुंबई के नानावटी अस्पताल में पत्नी का उपचार कराया और दो बड़े ऑपरेशन भी कराए, लेकिन करीब 28 लाख रुपये खर्च होने के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। पत्नी की मृत्यु के बाद परिवार धीरे-धीरे बिखरता चला गया। सेवानिवृत्ति के बाद सिलविंदर सिंह ने सूरत की एक हीरा कंपनी में प्रबंधक के तौर पर भी काम किया। वहीं उनकी मुलाकात जौनपुर के दो लोगों से हुई, जिन्होंने उन्हें यहां एक वृद्धाश्रम के बारे में बताया। इसके बाद वह जौनपुर आ गए। वृद्धाश्रम में मिल रही सुविधाओं और देखभाल के बारे में सिलविंदर सिंह ने संतोष जताया। उनका कहना है कि आश्रम के लोगों ने उन्हें सम्मान और अपनापन दिया तथा उन्हें यहां नया जीवन मिला। उन्होंने आश्रम से जुड़े लोगों के प्रति आभार जताते हुए कहा, 'इन्होंने मुझे दूसरा जन्म दिया है।'
 

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अकेले रहने को मजबूर बुजुर्ग 

सिलविंदर सिंह की कहानी आधुनिक समाज में बुजुर्गों की बदलती स्थिति पर सवाल खड़ा करती है। उनका कहना है कि संतान की सफलता से उन्हें खुशी और गर्व है, लेकिन बुढ़ापे में उन्हें आर्थिक सहायता से अधिक भावनात्मक साथ की आवश्यकता है। उनकी कहानी यह सोचने पर मजबूर करती है कि आधुनिक शिक्षा और आर्थिक सफलता के साथ क्या पारिवारिक जिम्मेदारियों तथा बुजुर्ग माता-पिता के प्रति संवेदनशीलता भी उसी तरह कायम रह पा रही है। 

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