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कोर्ट का फैसला- महिला को अपनी "इज्जत की कीमत पर" पति के साथ रहने को मजबूर नहीं कर सकते

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 30 Sep, 2026 12:20 PM
कोर्ट का फैसला- महिला को अपनी

नारी डेस्क: झारखंड हाई कोर्ट ने एक महिला को राहत दी है। फैमिली कोर्ट ने पहले उसे अपने पति के साथ वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने का आदेश दिया था, लेकिन हाई कोर्ट ने माना कि महिला के पास अलग रहने का "उचित कारण" था। सबूतों से साबित हुआ कि गर्भावस्था के दौरान उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और बार-बार 10 लाख रुपये के दहेज की मांग की गई। बेंच ने कहा कि महिला को अपनी "इज्जत की कीमत पर" वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
 

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पत्नी को कोई मजबूर नहीं कर सकता: कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि भारत में यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि वैवाहिक अधिकार  यानी पति या पत्नी का एक-दूसरे के साथ रहने का अधिकार सिर्फ़ "कानून से बनी चीज" नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि जब कोई जीवनसाथी सबूतों से यह साबित कर देता है कि मानसिक प्रताड़ना और सम्मान को ठेस पहुंचाए बिना साथ रहना मुमकिन नहीं है, तो कोर्ट उन्हें साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। कोर्ट ने आगे कहा कि शारीरिक हिंसा या हमले के अलावा, शादी से जुड़ी ऐसी कोई भी स्थिति जो किसी महिला को सम्मान के साथ जीने से रोकती है, उसे अलग रहने और गुज़ारा-भत्ता (मेंटेनेंस) मांगने का अधिकार देती है।
 

क्या है मामला?

इस ईसाई जोड़े की शादी 2018 में हुई थी और शादी के बाद मतभेद शुरू होने से पहले वे लगभग तीन महीने तक साथ रहे। पति के अनुसार, महिला अक्सर झगड़ा करती थी, उसके साथ रहने से इनकार करती थी और अपने मायके में रहने की ज़िद करती थी। हालांकि, महिला ने अलग बात कही। उसने आरोप लगाया कि शादी के तुरंत बाद ही 10 लाख रुपये के दहेज की लगातार मांग की गई और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। 
 

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 2019 से अलग रह रहा था कपल

फैमिली कोर्ट के सितंबर 2022 के आदेश की समीक्षा करते हुए, कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने मुख्य रूप से पति के पक्ष पर भरोसा किया था और यह मानने में गलती की थी कि पत्नी अपने आरोपों को साबित करने में विफल रही। यह देखते हुए कि यह जोड़ा 2019 से अलग रह रहा था, हाई कोर्ट ने कहा कि महिला को वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने के लिए मजबूर करना न तो व्यावहारिक था और न ही कानूनी रूप से सही। 
 

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