नारी डेस्क : एक तरफ जिस समाज में बेटियों को देवी का रूप मानकर पूजा जाता है, वहीं शादी के बाद उसी बेटी से दहेज की मांग कर उसका उत्पीड़न भी किया जाता है। वक्त बदला, तरीके बदले, लेकिन दहेज की सोच आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। पहले दहेज की मांग खुलेआम की जाती थी, आज कई बार इसे यह कहकर जायज ठहराया जाता है कि “जो भी दोगे, अपनी बेटी को ही दोगे।” इसी सोच की कीमत एक मां ने अपनी बेटी को खोकर चुकाई। दिल्ली की सत्य रानी चड्ढा ने दहेज के चलते अपनी बेटी को खोने के बाद हार नहीं मानी, बल्कि न्याय के लिए ऐसी लंबी लड़ाई लड़ी, जिसने उनकी व्यक्तिगत पीड़ा को दहेज प्रथा के खिलाफ एक बड़ी मुहिम में बदल दिया।
दहेज की मांग बनी बेटी की मौत की वजह
सत्य रानी की बेटी कंचन की शादी के बाद कथित तौर पर उसके ससुराल वालों की ओर से दहेज की मांग की जाने लगी। परिवार से टीवी, फ्रिज और स्कूटर जैसी चीजें मांगे जाने का आरोप था। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के बावजूद परिवार ने अपनी क्षमता के अनुसार कुछ सामान दिया, लेकिन स्कूटर की मांग पूरी नहीं हो सकी। कंचन की मौत से कुछ समय पहले उसके पति की ओर से कथित तौर पर मांग पूरी करने का दबाव बनाया गया था। इसके बाद 28 सितंबर को कंचन अपने घर में गंभीर रूप से जली हुई हालत में मिलीं। वह उस समय छह महीने की गर्भवती थीं। उन्हें इलाज के लिए दिल्ली के एम्स ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।

पति ने बताया था हादसा, मां ने नहीं माना
कंचन के पति की ओर से घटना को रसोई में हुआ हादसा बताया गया। लेकिन सत्य रानी को इस कहानी पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने अपनी बेटी की मौत को दहेज उत्पीड़न से जोड़ते हुए न्याय के लिए कानूनी लड़ाई शुरू करने का फैसला किया। उस समय दहेज से जुड़ी मौतों को लेकर मौजूदा कानूनी व्यवस्था आज की तरह स्पष्ट नहीं थी। सत्य रानी ने 1980 में अपनी बेटी की मौत के मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू की और न्याय के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं।
जमानत के बाद शुरू हुआ सड़क पर संघर्ष
मामले में आरोपी को कुछ समय बाद जमानत मिल गई। इसके बाद सत्य रानी ने सिर्फ अदालत का दरवाजा खटखटाने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने दहेज प्रथा के खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन और जागरूकता अभियान शुरू किए। उनका मानना था कि उनकी बेटी की मौत सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है जिसमें दहेज के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है।

महिलाओं के लिए बनाया आश्रय स्थल
सत्य रानी ने सामाजिक कार्यकर्ता शाहजहां अप्पा के साथ मिलकर महिलाओं के लिए शक्ति शालिनी नाम से आश्रय और सहायता केंद्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका उद्देश्य दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का सामना कर रही महिलाओं को सहायता और सुरक्षित जगह उपलब्ध कराना था। इस तरह अपनी बेटी के लिए न्याय की लड़ाई धीरे-धीरे एक बड़े सामाजिक आंदोलन में बदल गई।
कानून में भी आया बदलाव
भारत में दहेज के खिलाफ दहेज निषेध अधिनियम, 1961 पहले से मौजूद था, लेकिन दहेज के कारण होने वाली मौतों को लेकर कानूनी प्रावधानों को बाद में और मजबूत किया गया। 1983 में भारतीय दंड संहिता में धारा 498A जोड़ी गई, जिसके तहत पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता को अपराध बनाया गया। इसके बाद 1986 में धारा 304B के जरिए 'दहेज मृत्यु' को अलग अपराध के रूप में कानून में शामिल किया गया। सत्य रानी चड्ढा जैसे कार्यकर्ताओं और पीड़ित परिवारों के लंबे संघर्ष ने दहेज और घरेलू हिंसा के खिलाफ सामाजिक और कानूनी जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

34 साल तक जारी रही न्याय की लड़ाई
सत्य रानी ने अपनी बेटी की मौत के बाद करीब 34 वर्षों तक न्याय और दहेज विरोधी अभियान जारी रखा। 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले में आरोपी की सजा को बरकरार रखा। हालांकि, सत्य रानी का निधन 2014 में हो गया। वह अपनी बेटी के मामले में अंतिम कानूनी नतीजे के बाद भी उस इंसाफ को पूरी तरह देख नहीं सकीं, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया था।
एक बेटी की मौत से शुरू हुई बड़ी मुहिम
सत्य रानी चड्ढा की कहानी सिर्फ एक मां के व्यक्तिगत संघर्ष की कहानी नहीं है। यह उस दौर की भी याद दिलाती है जब दहेज के खिलाफ आवाज उठाना आसान नहीं था। उन्होंने अपनी बेटी की मौत के बाद चुप रहने के बजाय सवाल उठाए, सड़कों पर उतरीं और दूसरी महिलाओं के लिए भी आवाज बनीं। उनका संघर्ष यह संदेश देता है कि सामाजिक बदलाव केवल कानून बनाने से नहीं आता, बल्कि उन लोगों की लगातार आवाज से आता है जो अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं।