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5 साल पहले ही चल जाएगा फेफड़ों के कैंसर का पता! लाखों लोगों की बच सकती है जान

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 06 Jun, 2026 01:15 PM
5 साल पहले ही चल जाएगा फेफड़ों के कैंसर का पता! लाखों लोगों की बच सकती है जान

नारी डेस्क : कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर बैठ जाता है। खासकर फेफड़ों का कैंसर (लंग कैंसर), क्योंकि ज्यादातर मामलों में इसका पता तब चलता है जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। लेकिन अब मेडिकल साइंस ने एक ऐसी खोज की है जो भविष्य में लाखों लोगों की जिंदगी बचा सकती है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा नया ब्लड टेस्ट विकसित किया है, जो फेफड़ों के कैंसर के खतरे का संकेत बीमारी के डायग्नोसिस से करीब 5 साल पहले ही दे सकता है। यह खोज कैंसर की शुरुआती पहचान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

खून में मिले 14 खास प्रोटीन, जो पहले ही दे देते हैं संकेत

मशहूर वैज्ञानिक जर्नल Cell में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने खून में मौजूद 14 विशेष प्रोटीनों की पहचान की है। ये प्रोटीन शरीर में कैंसर विकसित होने से कई साल पहले सक्रिय होने लगते हैं। शोधकर्ताओं ने 48 हजार से अधिक लोगों के ब्लड सैंपल और स्वास्थ्य रिकॉर्ड का गहराई से अध्ययन किया। इस दौरान उन्हें पता चला कि इन 14 प्रोटीनों का एक विशेष पैटर्न भविष्य में फेफड़ों के कैंसर के बढ़ते खतरे की ओर संकेत देता है।

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उम्र, धूम्रपान और प्रदूषण के साथ मिलकर देता है सटीक अनुमान

यह टेस्ट केवल प्रोटीन की मौजूदगी नहीं देखता, बल्कि व्यक्ति की उम्र, धूम्रपान की आदत और वायु प्रदूषण के संपर्क जैसी महत्वपूर्ण जानकारियों को भी शामिल करता है। इन सभी कारकों को जोड़कर वैज्ञानिकों ने पाया कि यह तकनीक कैंसर के विकसित होने से लगभग 5.6 साल पहले ही संभावित खतरे का आकलन कर सकती है। यानी मरीज के शरीर में बीमारी गंभीर रूप लेने से पहले ही डॉक्टर सतर्क हो सकते हैं।

भारत के लिए क्यों है यह खोज बेहद महत्वपूर्ण

भारत में फेफड़ों के कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि लगभग 80 से 85 प्रतिशत मरीजों में बीमारी का पता आखिरी स्टेज पर चलता है। ऐसे समय में इलाज मुश्किल और महंगा दोनों हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह ब्लड टेस्ट भविष्य में बड़े स्तर पर इस्तेमाल होने लगे, तो हाई-रिस्क लोगों की पहचान समय रहते की जा सकेगी। इससे बीमारी को शुरुआती चरण में रोकने और इलाज शुरू करने में काफी मदद मिलेगी।

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सिर्फ स्मोकर्स ही नहीं, प्रदूषण से प्रभावित लोगों के लिए भी फायदेमंद

अब तक फेफड़ों के कैंसर को मुख्य रूप से धूम्रपान से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन आज के समय में बढ़ता वायु प्रदूषण भी बड़ा कारण बन चुका है। यह नया टेस्ट उन लोगों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है जो प्रदूषित वातावरण में रहते हैं और लगातार जहरीले कणों के संपर्क में आते हैं। ऐसे लोगों में भी बीमारी का खतरा पहले से पहचाना जा सकेगा।

क्या यह टेस्ट सीधे कैंसर का पता लगाता है

इस महत्वपूर्ण खोज को लेकर विशेषज्ञों ने एक जरूरी बात स्पष्ट की है। यह टेस्ट सीधे कैंसर या ट्यूमर की पहचान नहीं करता। दरअसल, यह एक "रिस्क असेसमेंट टूल" है, जो यह बताता है कि भविष्य में किन लोगों में फेफड़ों के कैंसर का खतरा अधिक हो सकता है। इसके बाद डॉक्टर ऐसे लोगों की अतिरिक्त जांच और नियमित निगरानी शुरू कर सकते हैं।

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अभी और परीक्षण की है जरूरत

हालांकि इस तकनीक को दुनिया भर में 2,000 से अधिक कैंसर मामलों पर परखा जा चुका है, लेकिन भारत में इसे व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले भारतीय आबादी पर और परीक्षण किए जाएंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग देशों की आबादी, जीवनशैली और पर्यावरणीय परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए स्थानीय स्तर पर इसके परिणामों की पुष्टि जरूरी है।

भविष्य में कैंसर स्क्रीनिंग का अहम हिस्सा बन सकता है यह टेस्ट

यदि आने वाले ट्रायल सफल रहते हैं, तो यह ब्लड टेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग प्रोग्राम का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। इससे उन लोगों की पहचान पहले ही हो सकेगी जिन्हें भविष्य में फेफड़ों के कैंसर का खतरा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर से लड़ाई में सबसे बड़ा हथियार समय पर पहचान है, और यह नई तकनीक उसी दिशा में एक बड़ी उम्मीद बनकर सामने आई है।
 
 
 
 
 

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