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शरीर में नहीं बची थीं मांसपेशियां! फिर भी नहीं मानी हार, कैंसर को मात देकर बैडमिंटन कोर्ट पर लौटे Gustav Björkler

  • Edited By Monika,
  • Updated: 20 Aug, 2026 01:33 PM
शरीर में नहीं बची थीं मांसपेशियां! फिर भी नहीं मानी हार, कैंसर को मात देकर बैडमिंटन कोर्ट पर लौटे Gustav Björkler

नारी डेस्क : कुछ कहानियां सिर्फ खेल में जीत की नहीं होतीं, बल्कि जिंदगी की सबसे मुश्किल परिस्थितियों को मात देकर दोबारा खड़े होने की होती हैं। स्वीडन के बैडमिंटन खिलाड़ी गुस्ताव ब्योर्कलर की कहानी भी ऐसी ही है। कभी कैंसर से जूझ रहे ब्योर्कलर ने इलाज के दौरान करीब 15 से 17 किलो वजन गंवा दिया था। उनका शरीर इतना कमजोर हो गया था कि उनकी मांसपेशियां लगभग खत्म हो गई थीं और ताकत भी बेहद कम रह गई थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। कीमोथेरेपी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट से गुजरने के बाद उन्होंने न सिर्फ बीमारी को मात दी, बल्कि दोबारा बैडमिंटन कोर्ट पर वापसी की। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर चैंपियन बनने तक का सफर तय किया।

16 साल की उम्र में हुआ कैंसर

गुस्ताव ब्योर्कलर को 2018 में महज 16 साल की उम्र में मायलोडिस्प्लास्टिक सिंड्रोम (MDS) का पता चला था। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें बोन मैरो पर्याप्त स्वस्थ रक्त कोशिकाएं नहीं बना पाता। बीमारी का पता चलने के बाद उनका इलाज शुरू हुआ। उन्हें कीमोथेरेपी से गुजरना पड़ा और बाद में स्टेम सेल ट्रांसप्लांट भी कराया गया। इलाज का उनके शरीर पर काफी असर पड़ा और इस दौरान उन्होंने करीब 15 से 17 किलो वजन खो दिया। उनका वजन लगभग 63 किलो तक पहुंच गया था, जबकि उनकी लंबाई करीब 190 सेंटीमीटर है। ब्योर्कलर के मुताबिक, उस समय उनके शरीर में लगभग कोई मांसपेशी नहीं बची थी और उनके पास सामान्य शारीरिक गतिविधियों के लिए भी पर्याप्त ताकत नहीं थी।

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बीमारी ने बदला जिंदगी को देखने का नजरिया

इतनी कम उम्र में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझने के बाद ब्योर्कलर की जिंदगी को लेकर सोच भी बदल गई। इलाज के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने शरीर को दोबारा मजबूत बनाना और फिटनेस हासिल करना थी। उन्हें अपनी पुरानी शारीरिक क्षमता वापस पाने में काफी समय लगा। लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे ट्रेनिंग शुरू की और बैडमिंटन को दोबारा अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया। उनके लिए अब चुनौती सिर्फ कोर्ट पर जीत हासिल करना नहीं थी, बल्कि अपने खेल को पहले से बेहतर स्तर तक पहुंचाना भी थी।

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बीमारी से उबरने के कुछ महीनों बाद कोर्ट पर वापसी

इलाज पूरा होने के बाद ब्योर्कलर ने ज्यादा समय गंवाए बिना बैडमिंटन में वापसी की कोशिश शुरू कर दी। 2020 की शुरुआत में, बीमारी से उबरने के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने स्वीडिश राष्ट्रीय चैंपियनशिप में पुरुष एकल और मिश्रित युगल दोनों वर्गों के सेमीफाइनल में जगह बनाई। यह उनके लिए बेहद खास वापसी थी, क्योंकि कुछ समय पहले तक वह गंभीर बीमारी और उसके इलाज के प्रभावों से जूझ रहे थे। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी जगह बनानी शुरू की।

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स्वीडन की थॉमस कप टीम का भी रहे हिस्सा

ब्योर्कलर की मेहनत का नतीजा यह रहा कि वह स्वीडन की थॉमस कप टीम का हिस्सा भी बने। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलते हुए उन्होंने दुनिया के कई मजबूत खिलाड़ियों का सामना किया। उन्होंने चोउ तिएन चेन और एंडर्स एंटोनसेन जैसे शीर्ष खिलाड़ियों के खिलाफ भी मुकाबले खेले। इससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना अनुभव और खेल दोनों बेहतर करने का मौका मिला। बता दें की स्वीडन में फुटबॉल और आइस हॉकी की लोकप्रियता काफी ज्यादा है, जबकि बैडमिंटन को उतना बड़ा खेल नहीं माना जाता। ऐसे में अपने खेल को अगले स्तर तक ले जाने के लिए ब्योर्कलर ने डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन को अपना ट्रेनिंग बेस बनाया। कोपेनहेगन में उन्हें बेहतर ट्रेनिंग वातावरण और मजबूत बैडमिंटन संस्कृति का फायदा मिला। उन्होंने अपने खेल और फिटनेस पर लगातार काम जारी रखा।

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2025 में बने स्वीडिश नेशनल चैंपियन

ब्योर्कलर की वापसी की कहानी सिर्फ बीमारी से उबरने तक सीमित नहीं रही। उन्होंने कोर्ट पर भी खुद को लगातार साबित किया। फरवरी 2025 में उन्होंने स्वीडिश नेशनल चैंपियनशिप का पुरुष एकल खिताब अपने नाम किया। फाइनल में उन्होंने किम लिनेल को 21-10, 21-11 से हराकर चैंपियनशिप जीती। राष्ट्रीय चैंपियन बनना उनके लिए इसलिए भी खास था क्योंकि कुछ साल पहले ही वह कैंसर के इलाज से गुजर रहे थे और उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया था। राष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल करने के बाद ब्योर्कलर ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी अपनी पहचान बनाई। वह डच ओपन के फाइनल तक पहुंचने में सफल रहे। यह उपलब्धि दिखाती है कि कैंसर और लंबे इलाज के बाद उनकी वापसी सिर्फ भावनात्मक कहानी नहीं रही, बल्कि उन्होंने अपने खेल में भी शानदार स्तर हासिल किया।

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