
नारी डेस्क : बॉलीवुड अभिनेता कुणाल खेमू और अभिनेत्री सोहा अली खान उन चर्चित कपल्स में शामिल हैं, जिन्होंने अलग-अलग धर्म और संस्कृतियों के बीच अपने रिश्ते को खूबसूरती से निभाया है। दोनों की शादी को एक दशक से अधिक समय हो चुका है और वे अक्सर अपनी बेटी इनाया नौमी खेमू के साथ बिताए खास पलों को फैंस के साथ साझा करते रहते हैं। हाल ही में कुणाल खेमू ने अपनी बेटी की परवरिश को लेकर खुलकर बात की और बताया कि उन्होंने और सोहा ने कभी भी समाज की सोच या लोगों की राय को अपनी पैरेंटिंग पर हावी नहीं होने दिया।
दिल की सुनकर लिए हर फैसले
एक इंटरव्यू में कुणाल ने कहा कि बेटी की परवरिश से जुड़े हर फैसले उन्होंने और सोहा ने अपनी समझ और अनुभव के आधार पर लिए हैं। उनके मुताबिक, माता-पिता बनने के बाद कोई तय नियम या फॉर्मूला नहीं होता और हर परिवार अपने तरीके से सीखता और आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी किसी किताब या समाज द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार अपनी बेटी की परवरिश नहीं की, बल्कि वही किया जो उन्हें सही और बेहतर लगा।

लोगों की राय को नहीं बनाया पैमाना
कुणाल का मानना है कि हर इंसान की पैरेंटिंग का तरीका अलग होता है। उन्होंने स्वीकार किया कि कई लोग उनके फैसलों से सहमत होते हैं, तो कुछ लोग आलोचना भी करते हैं, लेकिन इससे उनके फैसलों पर कोई फर्क नहीं पड़ता। एक्टर ने कहा कि अगर माता-पिता हर कदम सिर्फ समाज को खुश करने के लिए उठाने लगें, तो वे अपनी असली पहचान और अपने मूल्यों को खो सकते हैं। उनके लिए सबसे अहम बात यह है कि उनकी बेटी को प्यार, सम्मान और अच्छे संस्कार मिलें।
पैरेंटिंग में होती हैं छोटी-छोटी नोकझोंक
हर पति-पत्नी की तरह कुणाल और सोहा के बीच भी कई बार बेटी की परवरिश को लेकर मतभेद हो जाते हैं। अभिनेता ने मुस्कुराते हुए बताया कि कई बार सोहा उन्हें इनाया को ज्यादा लाड़-प्यार देने के लिए टोकती हैं। उन्होंने कहा कि कभी-कभी बेटी को आइसक्रीम खिलाने जैसी छोटी-छोटी बातों पर भी दोनों की राय अलग होती है, लेकिन इन सभी चर्चाओं का उद्देश्य सिर्फ एक होता है। अपनी बेटी के लिए बेहतर फैसले लेना।

एक घर में कई त्योहारों की खुशियां
सोहा अली खान मुस्लिम परिवार से आती हैं, जबकि कुणाल खेमू हिंदू परिवार से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में दोनों ने अपनी बेटी को किसी एक धार्मिक पहचान तक सीमित रखने के बजाय दोनों धर्मों और संस्कृतियों से परिचित कराया है। उनके घर में ईद, दिवाली, क्रिसमस और महाशिवरात्रि जैसे त्योहार पूरे उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। कुणाल का मानना है कि अलग-अलग परंपराओं से जुड़ने से बच्चों का नजरिया व्यापक होता है और वे हर संस्कृति और धर्म का सम्मान करना सीखते हैं।
रिश्तों और पैरेंटिंग की सबसे बड़ी सीख
कुणाल खेमू की बातों से साफ है कि उनके लिए पैरेंटिंग का मतलब सिर्फ नियम बनाना नहीं, बल्कि ऐसा माहौल तैयार करना है जहां बच्चा खुलकर सीख सके, सवाल पूछ सके और हर संस्कृति का सम्मान करना जाने। उनका मानना है कि समाज की अपेक्षाओं से ज्यादा जरूरी है कि माता-पिता अपने बच्चों के लिए ईमानदारी, संवेदनशीलता और प्यार के साथ फैसले लें।