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नवरात्रि के बैग जैसा दिखा फेंडी का लाखों का बैग, हर्ष गोयनका ने उठाया कारीगरों के हक का मुद्दा

  • Edited By Monika,
  • Updated: 29 Sep, 2026 01:01 PM
नवरात्रि के बैग जैसा दिखा फेंडी का लाखों का बैग, हर्ष गोयनका ने उठाया कारीगरों के हक का मुद्दा

नारी डेस्क : इटली के मशहूर फैशन ब्रांड फेंडी का एक रंग-बिरंगा बैग इन दिनों चर्चा में है। इसकी सजावट में छोटे-छोटे शीशों और मोतियों का इस्तेमाल किया गया है। बैग की तस्वीर सामने आने के बाद कई भारतीय लोगों ने इसकी तुलना गुजरात और दूसरे राज्यों में नवरात्रि के दौरान इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक शीशे जड़े बैग से की। इसके बाद सामाजिक माध्यमों पर इस डिजाइन को लेकर बहस छिड़ गई। मामला तब और चर्चा में आ गया, जब उद्योगपति हर्ष गोयनका ने इस बैग की तस्वीर साझा करते हुए इसकी कीमत और भारतीय कारीगरी से समानता पर सवाल उठाए। इसके बाद बायोकॉन की संस्थापक किरण मजूमदार-शॉ ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

हर्ष गोयनका ने भारतीय कारीगरों को श्रेय देने की उठाई मांग

हर्ष गोयनका ने फेंडी के इस बैग की तुलना गुजरात की गलियों और बाजारों में मिलने वाले कम कीमत वाले पारंपरिक बैग से की। उन्होंने कहा कि जिस तरह के डिजाइन वाला बैग भारत में बहुत कम कीमत में उपलब्ध है, उसी तरह के दिखने वाले बैग के लिए लाखों रुपये वसूले जा रहे हैं। उन्होंने इससे पहले सामने आए प्रादा के कोल्हापुरी चप्पल विवाद का भी उल्लेख किया। उनका सवाल था कि बड़े विदेशी फैशन ब्रांड भारतीय पारंपरिक कलाओं और शिल्प का इस्तेमाल करते समय उन कारीगरों को उचित पहचान और श्रेय कब देंगे, जिन्होंने इन कलाओं को पीढ़ियों से संभालकर रखा है।

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किरण मजूमदार-शॉ ने भी जताई नाराजगी

बायोकॉन की संस्थापक किरण मजूमदार-शॉ ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे सांस्कृतिक अपनाने का उदाहरण बताया। उनका कहना था कि भारत की पारंपरिक कारीगरी को महंगे फैशन उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करने से पहले उन कारीगरों को पहचान मिलनी चाहिए, जिन्होंने इस कला को बनाया और पीढ़ियों तक जीवित रखा। उन्होंने कहा कि भारतीय कारीगरी को केवल दोहराने के बजाय उसे उचित सम्मान और पहचान मिलनी चाहिए।

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लाखों की कीमत वाले इस बैग में लगे हैं हजारों मोती और शीशे

रिपोर्ट्स के अनुसार, जिस बैग को लेकर यह विवाद चल रहा है, वह फेंडी की एक विशेष डिजाइन वाली श्रृंखला का हिस्सा है। इसमें करीब 39,500 मोतियों और 475 छोटे शीशों का इस्तेमाल किया गया है। इसे तैयार करने में 138 घंटे से अधिक समय लगा होने की जानकारी भी सामने आई है। बैग की कीमत अलग-अलग रिपोर्ट्स में करीब 8.3 लाख रुपये से 9.6 लाख रुपये तक बताई गई है। हालांकि, सामाजिक माध्यमों पर लोग इसकी तुलना भारत में मिलने वाले पारंपरिक शीशे और मोतियों से सजे बैग से कर रहे हैं।

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क्या सच में भारतीय कारीगरी की नकल है?

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है। सामाजिक माध्यमों पर बैग के डिजाइन की भारतीय पारंपरिक कारीगरी से समानता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन फेंडी ने आधिकारिक तौर पर इस बैग को नवरात्रि से जुड़ा हुआ नहीं बताया है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि यह फेंडी के वर्ष 1995 के पुराने डिजाइन का नया रूप है। वहीं, फेंडी की भारतीय कारीगरों के साथ किए गए कुछ कामों का भी उल्लेख सामने आया है, जिसमें शीशों, मोतियों और सजावटी सामग्री से जुड़ी कारीगरी शामिल है। ऐसे में इसे सीधे तौर पर भारतीय कारीगरी की नकल कहना एक विवादित दावा है। हालांकि, इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह बहस जरूर छेड़ दी है कि पारंपरिक भारतीय कला और कारीगरी को बड़े फैशन ब्रांडों द्वारा अपनाते समय स्थानीय कारीगरों को कितना श्रेय और पहचान मिलनी चाहिए। फिलहाल फेंडी के इस बैग की तस्वीर सामाजिक माध्यमों पर तेजी से चर्चा में है और लोग इसकी कीमत, डिजाइन और भारतीय पारंपरिक कारीगरी से समानता को लेकर अपनी-अपनी राय रख रहे हैं।

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